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एक नर्तकी की बौद्धित्व-प्राप्ति

एक नर्तकी की बौद्धित्व-प्राप्ति

By सुधीर गहलोत

एक सात साल की बालिका अपनी सहेलियों के साथ एक विशाल किले के विशाल महल को एकटक निहार रही थी। पूरी घाटी में अभिमान के साथ खड़े इस महल पर वह मुग्ध थी। महल के प्रासाद के आकाश पटल पर अंकित स्वर्णिम कलाचित्र को देखकर उसकी सहेलियां आश्चर्यचकित थीं, लेकिन उस बालिका का मन सुनहरे सपनों में डूबा हु़आ था। अपनी सहेलियों से वह बोली – ”क्या पता यह प्रासाद एक दिन मेरा ही हो जाए।’’ और आगे चलकर उसने अपने इस स्वप्र को साकार भी कर दिखाया था। इस बालिका का नाम एमा काल्वे था।

एमा कल्वे उस फ्रांसिसी नर्तकी का नाम है, जिसने अपनी जिंदगी में उन तमाम बुलंदियों को छुआ, जिसे पाने की आकांक्षा हर कलाकार को होती है। अपने कठोर परिश्रम, लग्र और समर्पण से न सिर्फ विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, बल्कि अपार संपत्ति भी कमाई और बेहिसाब खर्च भी किया। धन के प्रवाह को एमा ने नदी की धारा की तरह निश्चल रहने दिया।

दक्षिणी फ्रांस के क्याभेन पर्वत श्रृंखला के ऊंचे टीलों पर बसे गांव में एमा का परिवार सदियों से रहते आ रहा था, जो रूथेनियन उपजाति का निवास-स्थल है। रोमनों के आक्रमण के दौरान इस जाति के बारे में कभी जुलियस सीजर ने कहा था – ”यह बहादुर जाति है, दुर्भेद्य घने जंगलों में रहती है और अवसर की खोज में भेडिय़े की तरह घात लगाए रहती है।’’ एमा इसी बहादुर जाति से संबंध रखती थी, जिसने स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आने के बाद बहादुरी के साथ जीवन से संघर्ष किया।

बाल्यावस्था में कॉन्वेंट में शिक्षा के दौरान अपने स्वर से मुग्ध कर देने वाली एमा को उसकी चाची, शिक्षक और चर्च के पादरी कैथोलिक संन्यासिनी (नन) बनाना चाहते थे, लेकिन संन्यासिनी बनने की चाह और कला के शीर्ष पर पहुंचने की उत्कंठा के द्वंद्व के बीच उसने कला को चुना। एमा ने वासनमयी गीत गाए, लेकिन उसमें उदात्त प्रार्थना का कंपन था। इस अद्वितीय समागम ने एमा को सफलता भी दिलाई, लेकिन शिकागो के नृत्य प्रेक्षागृह में नृत्य के दौरान अपनी इकलौती पुत्री के जलकर मरने की घटना ने उसे तोड़ दिया। उसने आत्महत्या करने का असफल प्रयास किया। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद ने अपराध-बोध से ग्रस्त एमा को आध्यात्मिक संबल दिया और अपने कर्मपथ पर आगे, अनवरत बढऩे की प्रेरणा दी। स्वामीजी ने कहा – ”जिस मंच पर तुम स्वयं को विदीर्ण कर आद्र्र स्वर से गाती हो, वही है परम मुक्ति के लिए तुम्हारी अचेतन चेष्टा।’’

स्वामीजी की बात ने एमा के वैचारिक नजरिया को बदल दिया और वह उनकी भक्त बन गई और नृत्य-गायन क्षेत्र में वापस लौट आई। एमा पादरियों की धमकी के बाद स्वामीजी पर कोई किताब नहीं लिख पाई, लेकिन उनसे मिलने के लिए जब वह कोलकाता आई, तब तक स्वामी विवेकानंद इस नश्वर संसार से मुक्त हो चुके थे।

डॉ. शंकरी प्रसाद बसु ने अपनी पुस्तक ‘एक संन्यासी और एक नर्तकी’ में स्वामी विवेकानंद के प्रति विश्वप्रसिद्ध नर्तकी एमा काल्वे की भक्ति को ढूंढने का प्रयास किया है, जिनके मार्गदर्शन ने उसके जीवन को नवसृजित कर दिया। लक्ष्मीनिवास झुंझुनवाला ने हिंदी में अनुवाद कर भाषा, शैली और अलंकारों का अनोखा और अद्वितीय समागम किया है। आम्रपाली का बुद्ध से मिलन का अनोखा संसार है ‘एक संन्यासी और एक नर्तकी’।

17-01-2015

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