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नवरात्र : आधारभूत एकता का पर्व

नवरात्र : आधारभूत एकता का पर्व

नवरात्र पर्व प्रतिवर्ष में दो बार विक्रमी संवत चैत्र तथा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। वसंत तथा शरद ऋतुओं के बाद मौसम में परिवर्तन हो जाता है और जब ऋतु परिवर्तित होती है तो बीमारियां भी फैल जाती हंै इसीलिए इन ऋतुओं का नाम ‘यमराज के दांत’ भी कहा गया है। इन बीमारियों से बचाव व्रत उपवास नियम आदि का पालन करके किया जा सकता है। इन दिनों व्रत उपवास तथा मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। वैसे तो एक दिन में 365 दिन और रात होते हैं और सभी दिन और रात का समान महत्व है किन्तु चैत्र तथा आश्वियन के इन नवों दिनों का विशिष्ट स्थान है इसीलिए इन्हें नवरात्र की संज्ञा प्राप्त है।

नवरात्र पर्व का धार्मिक तथा सामाजिक दोनों प्रकार का महत्व है। इन दिनों हिन्दू प्रतिदिन अपने घरों में दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं जिसमें भगवती मां को संसार में दुष्टों का नाश करने के लिए बार-बार प्रकट होने की कथाएं वर्णित हैं। देवी दुर्गा ने स्वयं कहा है ‘जो एकाग्रचित हो कर प्रतिदिन मेरा स्मरण करेगा उसकी बाधा मैं निश्चय ही दूर करूंगी।’ किसी कारण से जो प्रतिदिन इसका पाठ नहीं कर पाता है वह वर्ष में दो बार इसका पाठ अवश्य करता है। शहरों के लोग कीर्तन आदि करके रात्रि जागरण के रूप में नवरात्र पर्व मनाते हैं। दुर्गा सप्तशती में तेरह अध्याय है इनमें देवी का चरित्र वर्णित है और देवी चरित्र के पाठ का महत्व बताया गया है। इनमें राजा सुरथ तथा वैश्य समाधि के कष्टों को दूर करने के दृष्टांत आदि से इसके व्यावहारिक पक्ष के महत्व को दिखाया गया है। राजा सुरथ बहुत ही पराक्रमी एवं न्यायप्रिय राजा था परंतु एक बार युद्ध में वह अपने शत्रु से पराजित हो गया और पराजित हो कर जंगल में भटकने लगा। घूमते-घूमते वह मेधा मुनि के आश्रम में जा पहुंचा और सभी सुविधाओं से संपन्न मुनि के आश्रम में रहने लगा परन्तुु उसे वहां भी शांति नहीं मिली। कुछ समय बाद उसकी भेंट समाधि नामक वैश्य से हो गई जिसको उसके पुत्रों एवं उसकी पत्नी ने उसका धन छीन कर घर से बाहर निकाल दिया था। दोनों ने मेधा मुनि से शांति प्राप्ति का उपाय पूछा। मुनि ने देवी के चरित का बखान करते हुए कहा कि उन्हीं की कृपा से विद्या एवं ज्ञान प्राप्त होता है, भगवान विष्णु की माया स्वरूपा मां भगवती की कृपा से लोग भवसागर से पार उतरे हैं, वे ही मनुष्य को भोग, स्वर्ग और मोक्ष को प्रदान करती हैं। इस प्रकार मुनि ने उन दोनों को उस शक्ति को प्राप्त  करने की प्रेरणा दी और उन्हें बताया कि यदि आप प्रयत्न करें तो आप उस शक्ति को प्राप्त कर सकते हैं।

यह सुनकर राजा सुरथ तथा वैश्य समाधि दोनों तपस्या करने लगे। अपनी कठोर तपस्या से दोनों ने देवी दुर्गा को प्रसन्न कर दिया। देवी दुर्गा ने उनको साक्षात दर्शन देकर उनको वरदान मांगने को कहा, राजा सुरथ ने अपना खोया हुआ राज्य पुन: प्राप्त करने का वरदान मांग लिया परन्तु वैश्य समाधि को इस संसार से विरक्ति हो चुकी थी। अत: उसने ममता एवं अहंतारूप आसक्ति का नाश करने वाले ज्ञान प्राप्त करने का वरदान मांगा। इस प्रकार दोनों ने कष्टों से मुक्ति पाई। कहने की आवश्यकता नहीं कि दुर्गा सप्तशती का पाठ ज्ञान भी देता है और साहस भी देता है, प्रेरणा भी देता है। मानव पीढ़ी को बार-बार इसकी आवश्यकता होती है।

इस संबंध में कई प्रकार के अन्य आख्यान भी प्रसिद्ध हैं। एक कथानक के अनुसार राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए सिंहवाहिनी मां दुर्गा अवतरित हुईं। एक अन्य कथानक के अनुसार शुंभ तथा निशुंभ राक्षसों का वध करने के लिए शक्ति की देवी का प्रकट हुईं।

नवरात्र पर्व शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है। भारत में शक्ति की उपासना कब से प्रारंभ हुई इस बारे में इतिहास मौन है परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि शक्ति की आराधना प्राचीन काल से की जा रही है। जब-जब पशुता ने मनुजत्व को, अधर्म ने धर्म को, घृणा ने प्रेम को, असत्य ने सत्य को, दानव ने मानव को पराभूत करने के लिए प्रयत्न किया तब तब देवत्व की संगठित शक्तियों ने आसुरी शक्तियों का सामना किया तथा उन पर विजय पाई। व्यक्ति के शरीर में जब रोग प्रविष्ट होता है जब उसके शरीर में कोई खराबी आ जाती है और दवाई लेने से वह स्वस्थ हो जाता है उसी प्रकार जब समाज या राष्ट्र में कोई बुराई व्याप्त हो जाती है तो उसे दूर करने का प्रयत्न  किया जाता है और तब मां भगवती दुर्गा शक्ति के रूप में प्रकट हो कर उस आसुरी प्रवृत्ति को नष्ट करती हैं। इस प्रकार समाज एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए तथा अत्याचारियों एवं आततायियों को मार भगाने के लिए शक्ति का सहारा लेना ही पड़ता है।

नवरात्र का सामाजिक महत्व भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि प्रधान देश भारत में चैत्र तथा आश्विन दो मास किसानों के लिए महत्वपूर्ण हैं जब फसलें पक कर तैयार हो कर अनाज के रूप में घर आ जाती हैं, खेत खलिहान धन-धान्य से पूर्ण हो जाता है तब किसान का सारा परिवार प्रफुल्लित एवं उल्लास से विभार हो जाता है। कृषि की दृष्टि से हमारा देश दो भागों में विभक्त है–चैत्र-बैशाख में रबी की फसल गेहूं, चना, जौ, मटर आदि की फसल तैयार होती है और यह अन्न पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य  प्रदेश में पैदा होता है और आश्विन मास में खरीफ की फसल मक्का, बाजरा, ज्वार, धान आदि असम, बंगाल, बिहार तथा दक्षिण भारत के क्षेत्र में पैदा होते हैं। इस प्रकार चैत्र नवरात्र तथा शारदीय नवरात्र दोनों का विशेष महत्व  है जो कि अनादि काल से चला आ रहा है। इसलिए किसान इसे अपनी सुख-समृद्धि का प्रतीक मान कर प्रफुल्लित हो कर नवरात्र का पर्व मनाते हैं।

इस पर्व की यह विशेषता है कि यह सामाजिक समारोह है, नर-नारी सभी वर्ण एवं जातियों के लोग बिना किसी भेदभाव के इन समारोहों में भाग लेते हैं, नवरात्र का व्रत एवं पूजन करते हैं। यह पर्व हमारी जाति प्रथा के भेदभाव को समाप्त करता है। देवी पूजा पर शाक्त प्रभाव पडऩे के कारण जातिगत भेदभाव इसमें प्रविष्ट न हो सका इसीलिए इस पर्व को सभी जाति के लोग मिलकर हर्षोल्लास के साथा मनाते हैं। इसीलिए यह पर्व सर्वव्यापक एवं सर्वसमर्पित है।

नवरात्रि पर्व रात को जागरण करके मनाया जाता है। आश्विन मास में रामलीला का भी आयोजन किया जाता है। घर-घर राम की कथा सुनने तथा समझने को मिलती है । इनके माध्यम से पुरुषोत्तम राम की त्याग भावना एवं जीवन में उनके द्वारा स्थापित किए गए आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा दी जाती है। नवरात्र शक्ति की प्रतीक दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है परन्तु शक्ति तभी प्राप्त होती है जब हम सदाचारी जीवन जिएं, परिश्रम करके अधिकाधिक उत्पादन बढ़ाएं जिसमें सभी ओर समृद्धि दिखाई दे, इससे देश आत्मनिर्भर होगा तथा हमारे मन की अशांति दूर होगी। जन-जन में यह विचार पैदा करना होगा कि नवरात्र प्रतिवर्ष शक्ति अर्जन करने के लिए आता है और हमें शक्ति  अर्जित करनी चाहिए, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय बुराइयों को दूर करने के लिए।

 श्रीकृष्ण मुदगिल

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