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आदिवासी उद्धारक महापुरुष जिसने आदिवासियों को गरीबी और अभाव से निकालने के लिए शिक्षा को बनाया औजार

आदिवासी उद्धारक महापुरुष जिसने आदिवासियों को गरीबी और अभाव से निकालने के लिए शिक्षा को बनाया औजार

By अशोक कुमार

गरीबी से निजात दिलाने में शिक्षा और हुनर का शायद ही कोई विकल्प रहा है। आज की तकनीकीपरस्त दुनिया में तो यह अकाट्य सच है। लेकिन, पीढिय़ों से उपेक्षित और वंचित ओडीशा के करोड़ों आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल जाना कोई सपना देखने जैसा ही रहा है। ये भूमिहीन लोग घोर गरीबी और अभाव में जीने को अभिशप्त हैं। शिक्षा ही इनके जीवन में कोई उजाला ला सकती है। लेकिन सरकार के ऊंचे-ऊंचे दावों और मोटी-मोटी रकमों के खर्च करने के बावजूद सामाजिक-आर्थिक स्तर के सबसे निचले पायदान पर स्थित इन तबकों तक सरकारी मदद बमुश्किल ही पहुंच पाती है। ओडीशा में करीब 62 भिन्न-भिन्न जाति-कबीलों के तकरीबन 70 लाख आदिवासी हैं, जो राज्य की कुल आबादी का 22.2 फीसदी हैं। अगर इन्हें शिक्षा और हुनर मिल जाए तो बेशक इनकी जिंदगियां भी विकास की पटरी पर सरपट दौडऩे लग सकती हैं, लेकिन निरक्षरता इन्हें रोजगार सक्षम बनाने की राह में रोड़ा बनकर खड़ी है।

इस गहरे एहसास से डॉ. अच्युत सामंत ने वह संभव कर दिखाया, जो सदियों से हासिल नहीं किया जा सका था। भुवनेश्वर में उनके कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (केआइएसएस) ने संसाधनों से वंचित आदिवासी बच्चों को शिक्षा देकर उनका भविष्य सुरक्षित करने का अनोखा कारनामा कर दिखाया है। ओडीशा ही क्यों, देश भर में कहीं भी आदिवासियों के विकास के उपायों को देखकर घोर निराशा होती है, लेकिन केआइएसएस (कीस) के कैंपस में पहुंचकर अलग तरह का अनुभव होता है। आदिवासी युवकों को शिक्षा और हुनर की राह पर अग्रसर देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

शायद इसी अनुभव ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को भी प्रभावित किया और जब उन्होंने केआइएसएस के कैंपस का दौरा किया तो उनकी प्रतिक्रिया देख अखबारों में सुर्खियां बनीं ‘कलाम प्रभावित हुए’, वरना वे जहां भी जाते हैं, अमूमन सुर्खियां होती हैं कि ‘कलाम से मिली प्रेरणा।’ कलाम केआइएसएस से इस कदर प्रभावित हुए कि वे वहां दोबारा पहुंचे। केआइएसएस की वेबसाइट इस संस्थान को दूसरा शांतिनिकेतन बताती है। वहां जाने पर वाकई यह एहसास होता है कि अगर कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर भी उसे देखते तो जरूर उसे दूसरा शांतिनिकेतन की उपाधि से नवाजते।

ओडीशा की राजधानी के एक कोने में स्थित केआइआइटी यूनिवर्सिटी और केआइआइएस के करीब 350 एकड़ में फैले विशाल परिसर में दर्जनों सुंदर इमारतें अनोखे वास्तुशिल्प का नमूना हैं। यह कैंपस दुनिया के आला विश्वविद्यालयों के कैंपस से होड़ लेता है। इस परिसर में आधुनिक एअरकंडीशंड इमारतें, वायरलेस इंटरनेट, मल्टीमीडिया क्लासरूम, लेबोरेटरी, कॉन्फ्रेंस और कन्वेंशन हॉल, वृक्षों से सजे हरे-भरे मैदान, जगह-जगह लगीं कलाकृतियां सब कुछ है। हवादार इमारतों को एक-दूसरे से जोड़ते रास्तों, तालाब, पोखर और खुले मैदान से यह परिसर किसी आश्रम जैसा लगता है। यहां देश भर से और दुनिया के अलग-अलग कोनों से आए छात्र आंखों में चमक लिए स्वतंत्र होकर टहलते दिखते हैं। यहां करीब 75 प्रतिशत छात्र ओडीशा से बाहर के हैं। ज्यादातर पड़ोसी राज्यों से हैं, लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों और सार्क देशों के छात्र भी यहां हैं। कुछ छात्र तुर्की, नाइजीरिया और चीन के भी हैं। संयुक्त प्रवेश परीक्षा (केआइआइटी-ईई) में देश भर के 120 केंद्रों में हर साल करीब 2,00,000 छात्र बैठते हैं और अव्वल 3,500 छात्र ही प्रवेश की योग्यता हासिल कर पाते हैं।

केआइआइटी में 1997 में पहला अंडरग्रेजुएट पाठ्यक्रम शुरू हुआ था। उसके बाद इस संस्थान में प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों के खुलने का सिलसिला तेजी से शुरू हुआ। इनमें मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग, बिजनेस मैनेजमेंट, लॉ, फैशन, ग्रामीण प्रबंधन, बॉयोटेक्नोलॉजी, फिल्म तथा मीडिया, योग तथा आध्यात्म जैसे तमाम विभाग अब सुचारू रूप से चल रहे हैं। केआइआइटी ने अपनी फैकल्टी को गुणवत्ता संपन्न और बेहतरीन बनाने के लिए देश भर से ही नहीं, अमेरिका और कनाडा से भी अध्यापकों को अधिक वेतन देकर नियुक्त किया है। इस तरह फैकल्टी में 80 प्रतिशत अध्यापक पी.एच-डी. पूरी कर चुके हैं। यूनिवर्सिटी ने 2010 में बॉयोइंफार्मेटिक्स के अग्रणी विद्वान, पुणे यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉ. अशोक कोलस्कर को नियुक्त किया। डॉ. कोलस्कर ने कैंपस में शिक्षा का स्तर ऊंचा करने में काफी योगदान दिया।

03-01-2015

केआइआइटी ने कई क्षेत्रों में अकादमिक पहल ली है और इंजीनियरिंग कॉलेजों के फैकल्टी के कार्यों के आंकलन के लिए एक सॉफ्टवेयर विकसित किया है। यूनिवर्सिटी आइटी की बड़ी कंपनी विप्रो के साथ मिशन 10 एक्स पहल में सक्रिय भागीदार है। यह मिशन इंजीनियरिंग फैकल्टी को लगातार अंग्रेजी और छात्र-प्रबंधन में अपग्रेड करता रहता है। केआइआइटी का प्लेसमेंट रिकॉर्ड भी अनोखा है। यहां बड़ी विदेशी कंपनियां भी प्रतिभाओं की तलाश में आती हैं।

यहां अंतर्राष्ट्रीय स्कूल भी है, जो दिल्ली के केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई), ब्रिटेन के कैंब्रिज इंटरनेशनल एक्जामिनेशंस (सीआइई) और जेनेवा के इंटरनेशनल बैक्कालाउरेट ऑर्गेनाइजेशन (आइबीओ) से संबद्ध है। स्कूल का 5,00,000 वर्ग फुट का इलाका एक-दूसरे से संबद्ध पांच इमारतों से बना है, जो लंबे-लंबे हवादार कॉरीडोर वाले लुईकॉन स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर से प्रभावित है। स्कूल में देश भर से नियुक्त किए गए 120 अध्यापक और करीब 750 छात्र हैं। छात्र ज्यादातर पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के हैं, लेकिन कुछ विदेशी छात्र भी हैं। इनमें कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, कोरिया, बांग्लादेश और नाइजीरिया के छात्र शामिल हैं। 550 छात्र आधुनिक एयरकंडीशंड छात्रावासों में रहते हैं। छात्रावास के एक सुइट में दो या चार छात्र रहते हैं।

03-01-2015

शिक्षा के इस महाकुंभ के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत का अपना कोई दफ्तर नहीं है। वे यूनिवर्सिटी की एक इमारत के बाहर बगीचे में घने कदंब के वृक्ष के नीचे ही विदेशी राजनयिकों, फिल्मी सितारों, पत्रकारों और अन्य आगंतुकों से मिला करते हैं। उनकी बेहद सादगी भरी और जमीन से जुड़ी जीवन शैली बहुत लोगों को प्रभावित करती है। उनकी जिंदगी की कहानी भी किसी खांटी बॉलीवुड फिल्म जैसी रंक से राजा बनने वाले रॉबिन हुड की तरह है, क्योंकि उन्होंने समाज से जितना पाया, उससे कई गुना अधिक लौटा दिया। वे दो दशकों से बिना रुके-थके लगातार दिन के 18 घंटे काम किया करते हैं।

डॉ. सामंत ने केआइआइटी यूनिवर्सिटी या इंटरनेशनल स्कूल की स्थापना पैसा या प्रसिद्धि के लिए नहीं की, बल्कि उनका मकसद केआइआइएसएस की सहायता के लिए एक विश्वस्तरीय प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी स्थापित करना रहा है। केआइआइएसएस ओडीशा के गरीब और बेसहारा आदिवासियों को मुफ्त शिक्षा और बेहतर जिंदगी मुहैया कराने के लिए धर्मार्थ संस्था है। केआइएसएस और केआइआइटी यूनिवर्सिटी भले अलग-अलग संस्थाएं हैं,

मास्को में सम्मानित हुए सामंत

03-01-2015

कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट्स (सावियत संघ से अलग होकर बने देशों का समूह) की संस्था ‘जेनेन’ ने किट और कीस के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत को हाल ही में दो पुरस्कारों से सम्मानित किया। शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय प्रयास के लिए जेनेन के अध्यक्ष फिल्म मल्तीकोव ने डॉ. अच्युत को रूस की राजधानी मास्को में जेनेन मेडेल और प्रेसिडेंट्स मेडल से सम्मानित किया।

सोवियत संघ के विघटन के बाद कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट्स के हजारों वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों ने इया जेनेन नाम से एक संस्था की स्थापना की थी। जेनेन का अर्थ है, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सौंपा जाने वाला ज्ञान या विज्ञान। सन 1947 में सोवियत संघ के वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित की गई संस्था ऑल-यूनियन सोसाइटी जेनेन की विरासत है जेनेन संस्था।

सदस्य देशों के बाहर के किसी व्यक्ति को इन दो प्रतिष्ठित मेडल के चुना जाना ज्ञान को आगे बढ़ाने की इस संस्था की रूपरेखा को प्रदर्शित करता है। जेनेन द्वारा डॉ. अच्युत को इन पुरस्कारों की तुरंत घोषणा के बाद ही मास्को स्टेट ह्यूमैनिटेरियन यूनिवर्सिटी ने बी.एस-सी. (मानद उपाधि) देने की घोषणा कर दी।

लेकिन दोनों बुनियादी रूप से जुड़ी हुई हैं, क्योंकि दोनों के संस्थापक एक हैं। यूनिवर्सिटी में प्रति छात्र 2-4 लाख रुपए की फीस से होने वाली आमदनी से ही सोशल साइंस इंसटीट्यूट चलता है। यानी केआइआइटी आपनी सालाना आमदनी का एक हिस्सा केआइएसएस को देता है। इसके अलावा फैकल्टी सदस्य भी अपने वेतन का 3 प्रतिशत केआइएसएस को चंदे में देते हैं। जहां तक फकीर की तरह जीने वाले डॉ. सामंत का मामला है, वे अपनी तनख्वाह का ज्यादातर हिस्सा आदिवासी स्कूल को समर्पित कर देते हैं।

केआइएसएस और उसके करिश्माई संस्थापक के लिए यह कामयाबी लंबे और कठिन सफर के बाद हासिल हुई है। इस सफर में संस्था और उसके संस्थापक, दोनों को कई सम्मान से नवाजे जाने का गौरव हासिल हुआ है। उनके तीन रिकॉर्ड तो लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के पन्नों पर भी छा गए।

  • डॉ. सामंत के नाम किसी डीम्ड यूनिवर्सिटी में सबसे कम उम्र के कुलपति होने का रिकॉर्ड दर्ज है।
  • केआइआइटी देश में एकमात्र ऐसा संस्थान है जिसे स्थापना के छठें वर्ष में ही यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला।
  • केआइएसएस और केआइआइटी को एकमात्र ऐसा इंस्टीट्यूट कहलाने का गौरव भी हासिल है, जहां केजी से पीजी का मुहावरा कारगर है। यानी यहां केजी से लेकर एमए तक की पढ़ाई होती है। अलबत्ता कोई यह भी कह सकता है कि केजी से पी.एच-डी. का एकमात्र संस्थान यही है।

डॉ. सामंत की जिंदगी की कहानी किसी उपन्यास के नायक की तरह बेहद नाटकीय घटनाक्रमों से भरी पड़ी है। उनका जन्म एक छोटे-से गांव में बेहद गरीब परिवार में हुआ। महज चार साल की उम्र में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। इस तरह छह साल की उम्र से ही अच्युत को खुद को अपने सात भाई-बहनों को संभालने की जिम्मेदारी आ गई। वे खेत में काम करते और स्कूल भी जाया करते थे, जहां उनकी विलक्षणता के कायल उनके अध्यापक भी थे। उस वक्त उनके लिए दो जून का भरपेट भोजन भी किसी विलासिता से कम नहीं था। उनके गांव से हाईस्कूल करीब 16 किमी. दूर था। कई दिन तो उन्हें पैदल ही दूरी नापनी पड़ती थी। आखिरकार उन्हें छात्रवृत्ति मिल गई और उसके सहारे वे रसायन शास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल कर पाए। उन्होंने एम.ए. भी अच्छे अंकों से पास की और भुवनेश्वर के एक कॉलेज में व्याख्याता की नौकरी पा गए। वे नौकरी से संतुष्ट हो सकते थे, लेकिन उनके अंदर जल रही आग ने और कुछ करने पर मजबूर कर दिया।

उन्होंने छोटी उम्र में ही गरीबी और मजबूरी का दंश झेला था। उनके मन में गरीबों और वंचितों के लिए चाहे छोटा ही सही, बदलाव लाने का विचार खौल रहा था। इस तरह 1992 में महज 5,000 रुपए की छोटी-सी बचत से उन्होंने कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रीयल ट्रेनिंग की स्थापना की। इसकी शुरुआत एक कमरे में 12 छात्रों के साथ हुई थी। तमाम बाधाओं से पार पाते हुए डॉ. सामंत के पक्के इरादों ने महज 20 साल में ही केआइआइटी को विश्वस्तरीय यूनिवर्सिटी में बदल दिया।

03-01-2015

भारतीय शिक्षाविद् को एशियाई नोबेल पुरस्कार

विश्व के प्रख्यात शिक्षाविदों में एक भारतीय का नाम जुड़ गया है। कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रीयल टेक्नोलॉजी (किट) और कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (कीस) के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत को फिलीपींस के मनीला में गुसी पीस प्राइज इंटरनेशनल से नवाजा गया है। एशिया का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले डॉ. सामंत पहले भारतीय हैं। शिक्षा के क्षेत्र में महत्ती योगदान तथा आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र में पिछड़े बच्चों के उत्थान के प्रयास के लिए उन्हें यह पुरस्कार 26 नवंबर 2014 को दिया गया।

शिक्षा, सामाजिक कार्य, विज्ञान एवं अर्थशास्त्र सहित विभिन्न क्षेत्रों में अतुलनीय प्रयासों के लिए गुसी शांति पुरस्कार दिया जाता है। इस पुरस्कार के लिए नाम की घोषणा लगभग साल भर की जांच-परख के बाद की जाती है। विश्व भर के नामांकित महारथियों में से चुनाव समिति के द्वारा अंतिम फैसला लिया जाता है। इस साल के पुरस्कार के लिए डॉ. सामंत के अलावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर, मालदोवा के राष्ट्रपति, बांग्लादेशी रिजर्व बैंक के गवर्नर, मैसिडोनिया के पूर्व राष्ट्रपति और मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ पोलैंड के प्राध्यापक काजीमर्ज को चुना गया।

03-01-2015

उनके इस सफर में एक वक्त ऐसा भी आया जब बढ़ते कर्ज से सब कुछ खत्म होने की कगार पर पहुंच गया था, लेकिन डॉ. सामंत ने कभी हार नहीं मानी। केआइआइटी की स्थापना का मूल उद्देश्य था केआइएसएस को मदद देना, जिसका एकमात्र मकसद अपने राज्य के आविासियों के जीवन में उजाला लाना है। 1993 में महज 125 छात्रों के साथ शुरू हुआ छोटा-सा स्कूल आज कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज जैसी संस्था बन गया है। अब उसमें 22,500 छात्र हैं और प्राथमिक से लेकर सेकेंडरी और स्नातक तक की शिक्षा के अलावा रोजगारपरक शिक्षा दी जाती है। आज ओडीशा में जो राज्य प्रमुख, राजनयिक या बड़ी हस्ती आती है, वह इस इंस्टीट्यूट का दौरा करने जरूर करती है। संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों, विदेशी विश्वविद्यालय, कॉरपोरेट हाउसेज और बड़ी हस्तियों ने इसे खुलकर दान दिए। इस कैंपस में यूएनएफपीए स्वास्थ्य संबंधी कई कार्यक्रम चलाता है। युनिसेफ और केआइआइटी ने मिलकर सेंटर ऑफ चाईल्ड स्टडीज का साझा कार्यक्रम चलाया है। यूनेस्को ने भूजल अध्ययन और प्रबंधन पाठ्यक्रम शुरू किया है। अमेरिकी दूतावास ने 14-16 साल तक के बच्चों के लिए अंग्रेजी सीखाने का कार्यक्रम चलाया है। दक्षिण कोरिया की  हांसिओ यूनिवर्सिटी 100 छात्रों के लिए मेटरशिप कार्यक्रम चलाती है और लड़कियों की रग्बी टीम को अनुदान देती है। यह अनोखा संस्थान कई और एजेंसियों के आकर्षण का केंद्र है। कोई भी यहां आकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

टाटा स्टील, राष्ट्रीय खनिज विकास निगम, वेदांता और नाल्को जैसे कॉरपोरेट संस्थाओं ने कई छात्रों को समूहिक गोद लिया है। ये कंपनियां खनिज संपन्न आदिवासी इलाकों में कारोबार करती हैं और इससे हजारों आदिवासी विस्थापित होते हैं। केआइएसएस में वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के तहत अनुदान देती हैं। इन तमाम अनुदानों के बावजूद केआइआइटी और केआइएसएस पर कई बैंकों की करीब 500 करोड़ की देनदारी है। यहां आदिवासी छात्रों के बनाए हस्तकला उत्पादों की बिक्री से भी कुछ आय होती है, जिसमें 30 प्रतिशत राजस्व केआइएसएस रखने के बाद बाकी रकम उनके गरीब परिवारों को सौंप दी जाती है।

03-01-2015

केआइएसएस की यह गाथा ओडीशा के गरीब इलाकों में दूर-दूर तक फैली हुई है और पिछले तीन साल से यहां हर साल करीब 50,000 आवेदन आते हैं। इसके मुकाबले यहां केंद्र सरकार की करोड़ों रुपए की योजनाओं का असर खास नहीं नहीं दिखता। इसके विपरीत अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों से केआइएसएस विश्वस्तरीय शिक्षा दे रहा है। यहां सफल होने वाले छात्रों की दर सौ फीसदी है, जबकि राज्य में औसत दर 70 फीसदी ही है।

केआइएसएस में पास होकर निकलना आदिवासी छात्रों के लिए उजाले की ओर बढ़ाया गया एक कदम है। इन छात्रों को मेरिट और काबिलियत के हिसाब से केआइआइटी में दाखिला दे दिया जाता है, जहां वे उच्च शिक्षा के विश् वस्तरीय आसमान में पहुंच जाते हैं। डॉ. सामंत की योजनाएं अभी और विस्तृत हैं। वे अब केआइएसएस से निकलने वाले 30-40 छात्रों को हर साल आइआइटी में और करीब 30 छात्रों को प्रशासनिक सेवाओं में भेजने का लक्ष्य बना रहे हैं।

इस अनोखे संस्थान का प्रबंधन भी, जो कथित तौर पर विश्व का सबसे बड़ा आवासीय स्कूल भी है, आसान नहीं है। 30 तरह की अलग-अलग बोलियों वाले आदिवासी छात्रों को संभालना आसान काम नहीं है। 6,00,000 वर्ग फुट के इलाके में फैले केआइएसएस के पास 50 मेगावॉट बिजली का सौर ऊर्जा संयंत्र है। 1,00,000 लीटर रोजाना पेयजल बनाने वाला रिवर्स ओसमोसिस वॉटर फिल्टरेशन प्लांट है और अत्याधुनिक साफ-सुथरा किचन है, जहां हर रोज 45,000 लोगों को भोजन हर रोज डाइनिंग हॉल में परोसा जाता है। डाइनिंग हॉल में एक साथ 10,000 लोग खाना खा सकते हैं।

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यहां 22,500 छात्र रहते हैं और उनके लिए सभी तरह की सुविधाजनक व्यवस्थाओं के अलावा जिम और अस्पताल भी हैं। 105 कक्षाओं (दो पाली में) के साथ दो कंप्यूटर लैब, विशाल लाइब्रेरी, वाई-फाई की बेहतरीन सुविधा है। क्लोज सर्किट टीवी कैमरा एवं अन्य उपकरणों के साथ छात्रों की सुरक्षा के तमाम उपाय किए गए हैं।

छात्रों को पढ़ाई के अलावा संस्थान में मानव मूल्यों और अनुशासन की भी शिक्षा दी जाती है। आदिवासी छात्रों को आत्मविश्वास से भरा देखकर सुखद अनुभव होता है। यह उनके पहाड़ी इलाकों में जंगलों में अभावग्रस्त जीवन से काफी अलग है।

कुछ मिसालें देखिए।

आदिवासी बालिका चौदह वर्षीया नुमाली खेड़ा का जन्म कंधमाल जिले के एक दूर-दराज के गांव में हुआ था। बालपन में ही उसकी मां गुजर गई। पिता को जब काम मिलता तो करते, अन्यथा खाली बैठे रहते। नुमाली ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह एक दिन स्कूल जाएगी। आसपास कोई स्कूल था भी नहीं। स्थानीय विधायक ने नुमाली के दाखिले की सिफारिश की और अब वह आठवीं कक्षा में पढ़ती है। केआइएसएस में आने के पहले वह अपनी बोली ही जानती थी। अब उसे ओडिया ही नहीं आती, बल्कि हिंदी और अंग्रेजी भी जान गई है। नुमाली नर्स बनकर अपने लोगों की सेवा करना चाहती है, लेकिन डॉ. सामंत का सपना है कि वह कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर डॉक्टर बने। ऐसी कहानियां यहां हजारों की तादाद में बिखरी पड़ी हैं। केआइएसएस में यह भी ध्यान में रखा जाता है कि आदिवासी अपनी संस्कृति से दूर न हो जाएं, इसलिए उनके लिए आदिवासी उत्सवों का आयोजन किया जाता है।

बहरहाल, डॉ. सामंत के इस महती कार्य का दुनिया में जोड़ खोजना आसान नहीं है। वे सुर्खियों से दूर रहकर काम करते हैं। जनवरी 2011 में उन्होंने दोनों संस्थानों के बोर्ड को लिखा कि वे अब सचिव के पद से इस्तीफा देना चाहते हैं। इस पद पर वे पिछले 20 साल से हैं।  लेकिन केआइआइटी और केआइएसएस सेसाइटी ने उनसे 99वें इंडियन साइंस कांग्रेस तक बने रहने का आग्रह किया। आखिर कांग्रेस के संपन्न होते ही मार्च 2012 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। 5 अगस्त को जब अखबारों में उनके इस्तीफे की खबरें आईं तो उन्होंने कहा, ”मैंने दूसरों को मौका देने के लिए पद खाली किया है।’’ उनके योगदान से हमेशा इन संस्थानों को जीवन-शक्ति मिलती रहेगी।

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