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केरल मुस्लिम-बहुल राज्य बन जाएगा?

केरल मुस्लिम-बहुल राज्य बन जाएगा?

विश्लेषण

अगर यही सवाल एक या दो दशक पहले पूछा गया होता तो इसे एक बयानबाजी, बेतुका सवाल, यहां तक कि निंदनीय भी कह दिया गया होता। लेकिन आज, यह सवाल बिल्कुल भी अवास्तविक, असंभव या दूरगामी नहीं लगता है।

इस दक्षिण भारतीय राज्य में किस्मत से अब भी कई छद्म धर्मनिरपेक्ष बहुमत में हैं, लेकिन उनकी बात छोड़ दीजिए, सच्चे धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी भी अब तक इस बात से इनकार करते आए हैं। दरअसल, उन्हें उदारवादी होने की अपनी छवि की चिंता सताती रही है। लेकिन हाल के दिनों में, समझदारी से अधिक महत्व राजनीतिक रूप से सही बात करने वालों ने भी दबे स्वर में अपनी आशंकाओं पर बात करना शुरु कर दिया है कि आगे चलकर उन्हें मुस्लिम-बहुल राज्य में रहना पड़ेगा। कुछ करेलवासी जो अज्ञानता के कारण अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि का झूठा अभिमान करते हैं, वे जनता के सामने आज भी इसे ‘बेकार का मुद्दा’ कह कर खारिज कर देंगे।

हालांकि, सदियों पुराने आबादी के पैटर्न के उलट-पुलट होने के खतरनाक संकेतों को कोई भी बड़ी आसानी से देख सकता है। केरल में आखिरी पूर्ण जनगणना 2011 में हुई थी। उस समय केरल की आबादी 3.34 करोड़ थी, जिसमें से हिंदुओं की संख्या 1.83 करोड़ थी। दूसरे नंबर पर रहने वाले मुस्लिमों की कुल संख्या 88.7 लाख थी, जबकि इसाइयों की संख्या 61.4 लाख थी। चौथा वर्ग बौद्ध या सिखों का नहीं बल्कि ‘धर्म ना बताने’ वालों का था। उनकी संख्या 2011 में 88,000 थी, जो 2001 में महज 25,000 से बढक़र यहां तक पहुंच गई थी।

सबसे ताजा आंकड़ों के मुताबिक, खुद को ‘ईश्वर का अपना देश’ कहने वाले राज्य में हिंदू 54.72 प्रतिशत के साथ अब भी बहुसंख्यक हैं। 26.56 प्रतिशत के साथ इस्लाम दूसरे नंबर पर है, जिसके बाद 18.38 प्रतिशत के साथ इसाइयों का स्थान आता है। बौद्ध, जैन और यहूदी जैसे अन्य समूहों की संख्या महज 0.34 प्रतिशत है। लेकिन कुछ दशक पहले तक की तस्वीर ऐसी नहीं थी।

पिछली सदी की शुरुआत, यानी वर्ष 1901 में, हिंदुओं की संख्या 43.78 लाख थी, जो राज्य की आबादी में 68.5 प्रतिशत का अच्छा खासा हिस्सा थे। मुस्लिमों की आबादी 11.2 लाख थी, और वे 17.5 प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर थे जबकि तीसरा प्रभावशाली समुदाय इसाइयों का था, जिनकी संख्या 9 लाख यानी 14 प्रतिशत थी। आने वाले दशकों में, हिंदुओं की तुलना में इसाइयों और मुसलमानों की वृद्धि दर कई गुना ज्यादा दर्ज की गई।

वास्तव में, 1961 से पहले तक, इसाइयों की वृद्धि दर ने मुस्लिमों को भी पीछे छोड़ दिया जबकि हिंदुओ की आबादी में लगातार गिरावट देखी गई। साल 1961 तक, केरल में हिंदू आबादी गिरकर 60.9 प्रतिशत पर चली गई। मुस्लिमों की वृद्धि औसत थी, और कुल जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी 17.9 प्रतिशत रही, जबकि छह दशक पहले 17.5 प्रतिशत थी। इस क्रम में, वे राज्य का तीसरा सबसे बड़ा समुदाय बन गए। लेकिन, इसाइयों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी और 1901 में जहां कल आबादी में उनका हिस्सा 14 प्रतिशत का था, वह बढ़ कर 21.2 प्रतिशत पर पहुंच गया। उन्होंने कुल आबादी में मुसलमानों को दूसरे नंबर से बेदखल कर दिया।

हालांकि, 1961 के बाद, यह पैटर्न एक बार फिर बदला, जिसमें इस्लाम राज्य का सबसे तेजी से फैलने वाला धर्म बन गया। संयोग से, उस दौरान खाड़ी में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हो रही थी। आने वाले वर्षों में, लाखों मलयाली युवाओं ने अच्छी नौकरी की तलाश में खाड़ी के देशों का रुख किया। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि अधिकांश प्रवासी मुस्लिम थे।

यह स्पष्ट नहीं है कि क्या खाड़ी में तरक्की और उसके कारण बढ़ी दौलत का राज्य में मुस्लिमों की आबादी में विस्फोट से कोई संबंध है। हालांकि, मुस्लिमों की अमीरी में बढ़ोतरी ज्यादा दिखी थी। 1961 के बाद के दशकों में केरल में मुस्लिमों के लिए माहौल अच्छा रहा, और इस तटीय राज्य में वे सबसे तेजी से बढऩे वाले धार्मिक समुदाय बन गए।

वर्ष 1961-71 के बीच, जहां हिंदू आबादी 23.35 प्रतिशत और इसाई 25.28 प्रतिशत की दर से बढ़ी, वहीं मुस्लिमों की आबादी में 37.49 प्रतिशत की दर से तेज वृद्धि हुई। 1971-81 के दौरान, हिंदू आबादी 16.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी जबकि मुस्लिमों की आबादी में 29.96 प्रतिशत का इजाफा हुआ, और इस तरह रफ्तार की दर का फासला 14 प्रतिशत तक बढ़ गया।

हिंदुओं की वृद्धि दर लगातार गिरती गई और 2001-11 की अवधि में महज 2.29 प्रतिशत पर चली आई, जबकि 1991-2001 में यह 7.28 प्रतिशत थी। इसके साथ ही, 2001-11 के दौरान, मुस्लिमों ने 12.84 प्रतिशत की दर से अपनी आबादी की रफ्तार को बढ़ाना जारी रखा। हिंदू वृद्धि दर 2.29 प्रतिशत है, जो किसी आबादी को बचाए रखने के लिए 2.3 प्रतिशत की अपेक्षित दर से थोड़ा ही अधिक है।

इस प्रकार, केरल की जनसांख्यिकी में निश्चित रूप से परिवर्तन हुआ है। भारतीय धर्मों (हिंदुओं, बौद्ध, जैन आदि) की हिस्सेदारी 1901 में 68.91 प्रतिशत थी जबकि मुस्लिम 17.28 प्रतिशत थे। 2001 में भारतीय धर्मों के लोग जहां 56.28 प्रतिशत थे, वही 2011 में कम होकर 55.05 प्रतिशत पर चले आए। इसके साथ ही, 1901 में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 17.28 प्रतिशत थी, वह 2001 में बढक़र 24.7 प्रतिशत पर और 2011 में 26.56 प्रतिशत पर चली आई। ताजा ट्रेंड उसी तरह साफ दिख रहे हैं जैसे कि दिन और रात का फर्क नजर आता है।

1901 के बाद के 11 दशकों में, केरल में भारतीय धर्मों के लोग, जिनमें से अधिकांश हिंदू हैं, उन्होंने इस्लाम और इसाई धर्म की तुलना में अपनी आबादी का 14 प्रतिशत गंवा दिया है। इस 14 प्रतिशत में से 9.6 प्रतिशत इस्लाम के हिस्से में चला गया। वृद्धि का अंतर हर दशक के साथ बढ़ता जा रहा है। 2001-11 के दशक के दौरान, इस्लाम तेजी से बढ़ते हुए 12.8 प्रतिशत पर चला गया जबकि हिंदू आबादी 2.2 प्रतिशत और इसाइयों की आबादी 1.4 प्रतिशत बढ़ी।

यहां, स्वयंभू उदारवादी यह दलील दे सकते हैं कि आबादी में वृद्धि का साक्षरता और अमीरी से व्युत्क्रमानुपाती संबंध होता है। यह अन्य समाजों में सच हो सकता है लेकिन केरल के संदर्भ में तो बिल्कुल भी नहीं। इस दक्षिणी तटीय राज्य में, जिसे भारत का सबसे साक्षर राज्य कहलाने का गर्व है, सारे समुदाय शिक्षा, सामाजिक हैसियत और संपन्नता के लिहाज से लगभग समान स्थिति में हैं।

2011 के आंकड़ों के मुताबिक, हिंदुओं के बीच साक्षरता की दर 93.49 प्रतिशत, जबकि मुस्लिमों के बीच 93.29 प्रतिशत थी। इसाई 96.49 प्रतिशत की दर से इन दोनों से ही आगे थे। इसी प्रकार, संपन्नता का बताने वाले शहरीकरण में भी, हिंदुओं का शहरी अनुपात 48.54 प्रतिशत (प्रति 100 व्यक्तियों पर शहरी लोगों की संख्या) था। मुस्लिम 52.08 प्रतिशत की दर से उनसे आगे थे। इससे साबित हो जाता है कि उच्च साक्षरता, आधुनिकता और संपन्नता ने किसी भी लिहाज से इस राज्य के मुस्लिमों की जनसंख्या वृद्धि पर रोक नहीं लगाई है।

वर्तमान दर से, हिंदुओं की आबादी बढऩा बंद हो जाएगी जबकि मुस्लिम निवासियों की संख्या तेजी से बढ़ती रहेगी। यहां के बाद कैसे हालात पैदा होंगे इसका अंदाजा मलप्पुरम को देख कर लगाया जा सकता है, जो केरल का मुस्लिम बहुल राज्य है। कोझीकोड और पलक्कड़ के साथ ही त्रिशूर के कुछ हिस्सों को काट कर मलप्पुरम को 1969 में अलग जिला बनाया गया था।

1971 की जनगणना ने इस नए जिले में 1911-1961 के बीच धर्म के आधार पर जनसंख्या का आंकड़ा पेश किया। उसके आधार पर कोई भी यह देख सकता है कि आजादी के बाद और खासतौर पर 1961 के बाद, मुस्लिम आबादी कितनी तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के लिए, 1951 में इस इलाके में उनकी हिस्सेदारी 54.3 प्रतिशत थी, जो 1911 में उनके 52.3 प्रतिशत के हिस्से से महज 2 प्रतिशत ज्यादा थी। साल 2011 में, इस जिले में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 70.2 प्रतिशत पर पहुंच गई!

बढ़ती आबादी के साथ ही, इस राज्य में मुस्लिमों की ताकत राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर भी बढ़ रही है। राजनीतिक तौर पर, मुस्लिम लीग इस राज्य में सबसे लंबे समय तक सत्ताधारी गठबंधन में शामिल रहा है। आर्थिक तौर पर भी, मुस्लिम अत्यधिक शक्तिशाली बन गए हैं क्योंकि उन्होंने पूरे राज्य में बड़ी संख्या में सुपर-स्पेश्यलिटी हॉस्पिटल, फाइव-स्टार होटल, स्वपोषित शैक्षणिक संस्थान, मॉल और आधुनिक टाउनशिप बनाए हैं।

मलप्पुरम की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत होने के साथ ही, इस जिले में कई तरह के जबरदस्त बदलाव आए हैं। सबसे अधिक चिंताजनक बात इस जिले का अरबीकरण है। अब, अधिकांश मुस्लिम महिलाएं यहां सिर से पैर तक काला बुर्का पहनती हैं और पुरुष लंबी दाढ़ी रखने के साथ ही टोपी लगाते हैं। कुछ दशक पहले तक केरल में इस तरह की बातें कहीं भी देखने को नहीं मिलती थीं। कई पुरुषों ने धोती और शर्ट के पारंपरिक परिधान को छोड़ एक ही पीस वाले गाउन को अपना लिया है, जैसा कि अरबी लोग पहनते हैं। अब, कई कारोबारी संस्थानों के नाम अरबी हैं और उनमें से कई अपने साइनबोर्ड वैसे ही लिखते हैं जैसा कि अरबी में लिखा जाता है।

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इस्लाम के पाक महीने, रमजान के दौरान जब सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच खाना-पीना पूरी तरह प्रतिबंधित रहता है, तब दिन के दौरान मलप्पुरम की तस्वीर किसी भूतिया शहर जैसी हो जाती है। यह खाड़ी के किसी शहर के जैसा दिखता है जहां खाने-पीने की सारी दुकानें बंद हो जाती हैं और जीवन घुटनों के बल चलता दिखाई पड़ता है। सारे इलाके शाम की नमाज के बाद जी उठते हैं और सुबह तक वैसे ही रहते हैं, जैसा कि दूर के खाड़ी देशों में होता है।

अरबीकरण का प्रभाव मलप्पुरम की सीमाओं के बाहर भी फैल चुका है। जैसा कि अधिकांश मलयाली कहते हैं, भावनात्मक रूप से, दिल्ली या कोलकाता की तुलना में दुबई उनके दिल के ज्यादा करीब है। यही नहीं, अखबार भी भारत के दूसरे हिस्सों की तुलना में खाड़ी के देशों में होने वाली घटनाओं को ज्यादा जगह देते हैं। अरबी व्यंजन इस वक्त राज्य के छोटे-छोटे शहरों के मेन्यू कार्ड में भी मौजूद हैं।

केरल में मुस्लिम आबादी में आया उछाल दुनिया भर में इस समुदाय के बढऩे के मुताबिक ही है। प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन के अनुसार, ऐसा अनुमान है कि वैश्विक मुस्लिम आबादी आने वाले दशकों में 73 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी जबकि दुनिया की कुल आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार 35 प्रतिशत ही रहने वाली है। ऐसा भी अनुमान है कि दुनिया भर में मुसलमानों की आबादी अगले चार दशकों में 160 करोड़ से बढक़र 280 करोड़ हो जाएगी। तब तक, तीन व्यक्तियों में से एक मुस्लिम होगा। इसका प्रमुख कारण इस समुदाय के सदस्यों की अपेक्षाकृत अधिक प्रजनन क्षमता है।

उच्च प्रजनन क्षमता का श्रेय जाकिर नाइक जैसे नफरत फैलाने वालों के धार्मिक उपदेशों को दिया जा सकता है जो अपने अनुयायियों से कहता है कि वे जनसंख्या नियंत्रण के साधनों का इस्तेमाल ना करें। अल-बलाग वेबसाइट में उद्धृत किए गए एक और प्रचारक, मुफ्ती इब्न अदम अल-कथूरी ने कहा है कि ‘इस्लाम में शादी के सबसे प्रमुख उद्देश्यों में से एक संतानोत्पत्ति है। इस्लाम अपने अनुयायियों को प्रोत्साहित करता है कि वे उम्मा के आकार को बढ़ाने के लिए भारी तादाद में बच्चे पैदा करें।’

केरल में मुस्लिमों की तेजी से बढ़ती आबादी के साथ ही, बांग्लादेश, मालदीव और म्यांमार जैसे अन्य देशों से आने वाले प्रवासियों ने भी इनकी संख्या को बढ़ाया है। दरअसल, हाल ही में केंद्र सरकार ने केरल सरकार को म्यांमार से आने वाले रोहिंगया प्रवासियों से सावधान रहने को कहा है, जो पिछले कुछ दिनों में भारत के अलग-अलग राज्यों में घुस आए हैं। केरल में सबसे पहले रोहिंगया मुसलमान अगस्त 2015 में 19 सदस्यों के बैच में आए थे। वर्तमान में, केरल में उनकी संख्या 26 के आसपास है।

यहां रह रहे हिंदुओं और इसाइयों के अमेरिका के साथ ही अन्य विकसित देशों में चले जाने के कारण राज्य का जनसांख्यिकीय संतुलन और भी बिगड़ सकता है। उन देशों में नौकरी की तलाश में जाने वाले लोग वहीं बस जाना पसंद करते हैं। इसके विपरीत, मुसलमान ज्यादातर पश्चिमी एशियाई देशों में जाते हैं, और कई वर्षों बाद लौट कर केरल चले आते हैं। इसलिए, इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले दशकों में केरल में मुसलमान बहुसंख्यक हो जाएंगे।

सुनील गुप्ता

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