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भस्मासुर या राजयोगी?

भस्मासुर या राजयोगी?

जानेमाने विधिवेत्ता फली नरीमन ने आदित्यनाथ योगी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा कि क्या यह हिंदू राष्ट्र बनने की शुरुआत है। नरीमन ने कहा कि संविधान खतरे में है और जो आदित्यनाथ की नियुक्ति के पीछे की मंशा नहीं समझ पा रहे, वे या तो राजनैतिक दलों के प्रवक्ता हैं या उन्हें अपने दिमाग और आंखों की जांच करानी चाहिए।

  • कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर ने चेतावनी दी -उत्तर प्रदेश के मुख्यामंत्री बनाए गए योगी आदित्यनाथ भारतीय जनता पार्टी के तथाकथित विकास का मुखौटा हैं। उनका असली चेहरा उग्र हिंदुत्व फैलाने वाले का ही है। योगी अपना दबदबा फैलाने के लिए हिंदू युवा वाहिनी के नाम से निजी फौज चलाते हैं। इसके सहारे उन्होंने राज्य के कई हिस्सों में दहशत का माहौल बना रखा है। योगी के जरिए भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लक्ष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का है।
  • एक जानेमाने बुद्धिजीवी प्रतापभानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में -योगिक मेडनेस- (योगिक पागलपन)  जैसे भडक़ाऊ शीर्षक के साथ दूसरे ही दिन लिखा – यदि आदित्यनाथ लोकप्रिय चुनाव हैं तो कहना होगा कि भारतीय लोकतंत्र का संकट गहरा रहा है।
  • ‘रोजनामा एक्सप्रेस’ ने अपने संपादकीय की सुर्खी लगाई- एक कट्टर हिंदू यूपी का सीएम बन गया। अखबार लिखता है कि यूपी में भाजपा को मिली भारी जीत से साबित होता है कि वहां हिंदू कट्टरपंथ कम नहीं हो रहा है, बल्कि बढ़ रहा है। और ऊपर से योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने से साफ हो जाता है कि भारत में सेकुलर सोच दम तोड़ रही है।

ये तीखी प्रतिक्रियाएं देश के नेताओं, बुद्धिजीवियों और अखबारों की है। ये प्रतिक्रियाएं इस बात का सबूत है कि योगी के मुख्यमंत्री बनने से उनके दिमाग झनझना उठे हैं। उनकी नजर में आदित्यनाथ की एक ही पहचान है कट्टर हिंदू और घोर मुस्लिम विरोधी, जिसके मुख्यमंत्री बनने मात्र से हिंदूराष्ट्र बन जाएगा। वे यकीन नहीं कर पा रहे कि सबका साथ सबका विकास का नारा लगानेवाले नरेंद्र मोदी ने उग्र और विवादित बयानों के लिए मशहूर कट्टरपंथी हिंदुत्व का चेहरा माने जानेवाले संन्यासी आदित्यनाथ को कैसे उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य की कमान सौंप दी। उनकी नजर में तो योगी मुख्यमंत्री बनने के लिए सबसे अयोग्य व्यक्ति हैं। उनके शपथ लेते ही देश का सेकुलर ढांचा चरमरा जाएगा।

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योगी के मुख्यमंत्री बनने पर कुछ बुद्धिजीवी भले दुखी हों मगर दूसरी तरफ हिंदू समाज बल्ले-बल्ले है यह सोचकर कि देर आए दुरुस्त आए। आदित्यनाथ का 18 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेना इस बात की गवाही है कि हिंदू राजनीति की एक और झिझक खत्म हुई। कभी सोचा नहीं था कि दिल्ली के तख्त पर आरएसएस का प्रचारक बैठेगा। न ही यह कल्पना थी कि देश के सबसे बड़े प्रांत में हिंदूओं का एक मठ प्रमुख, हिंदुओं का एक योद्धा संन्यासी मुख्यमंत्री बनेगा। इसलिए कि नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया, सेकुलर विचार-विमर्श और आधुनिकता के चौगे ने भारत में भगवा को वर्जित बना रखा था। दरअसल अपने एसी कमरों में बैठे नेता और पत्रकार देश की हकीकत से अनजान हैं। उनका हाथ लोगों की नब्ज पर नहीं है। तभी सारे पत्रकार, बुद्धिजीवी, जनमत सर्वे करनेवाली एजंसियां बदली हुई हकीकत को नहीं भांप पाईं कि देश की हवा बदल गई है। वे दिन हवा हुए जब हिंदुत्व, संघ परिवार हिन्दुत्व की राजनीति, केसरिया बाना देश की राजनीति में अस्पृश्य हुआ करते थे। लेकिन वक्तने ऐसा पलटा खाया है कि अब अच्छे राजनैतिक पंडित यह मानने लगे हैं कि पत्रकार और बुद्धिजीवी आदित्यनाथ को चाहे जितना कोसें, लानते भेंजें मगर आदित्यनाथ का प्रखर हिंदुत्व नए जमाने की हकीकत है। इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक शेखर गुप्ता ने अपने लेख- हिंदू राष्ट्रवाद बना भारतीय राजनीति का नया मुहावरा- में कहा है कि मोदी भाजपा की बहुसंख्यकों की असुरक्षा की राजनीति को हिंदुओं के उभार की राजनीति में बदलकर उसे नरम धर्मनिरपेक्षता से कट्टर राष्ट्रवाद तक ले आए हैं। यही उनकी जीत का राज है। कहना न होगा कि यह प्रक्रिया पिछले पच्चीस साल से भारतीय राजनीति की पहचान बन गई है।

6 दिसंबर 1992 को जब राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद के ढांचे को ढहाया था तो उसके साथ ही ढहा था देश की छद्म सेकुलर राजनीति का ढांचा भी। तब अक्सर यह नारा गूंजता था -हिंदू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा। तब यह कोरा नारा ही लगता था। लगता नहीं था कि यह नारा कभी देश हकीकत भी बन पाएगा। खासकर उत्तर प्रदेश में जहां एक के बाद एक हुए चुनावों में सपा और बसपा जैसी सूडो सेकुलर पार्टियों की भारी बहुमत से सरकारें बनी। मगर वक्त ने पलटा खाया। 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी के नेतृत्व में भाजपा को उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीटें मिलीं। तो लोगों ने कहा कि यह विकास को मिला वोट है। विधानसभा चुनाव तक विकास का नशा उतर जायगा तो लहर ठंडी पड़ जाएगी मगर हुआ उल्टा ही। फिर वैसी ही लहर दिखाई दी तब सभी को यह स्वीकारना पड़ा हिंदू आंधी है। मगर उस आंधी को थामें रखने के लिए किसी ऐसे नेता कि जरूरत थी जो उसका प्रतिनिधि हो जो उसका चेहरा बन सके तो भाजपा को आखिरकार एक ही नाम सूझा वह था योगी आदित्यनाथ। मोदी के इस फैसले से यह तो तय है कि भारतीय जनता पार्टी को कम से कम हिंदुत्व के एजेंडे के लिए मोदी का राजनैतिक उत्तराधिकारी मिल गया है।

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कहने का तात्पर्य यह है कि आदित्यनाथ इस नए और जुझारू  हिंदुत्व के सबसे सशक्त और सबसे लोकप्रिय प्रतिनिधि हैं। क्या आपने कभी सोचा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व के सबसे मुखर नेता कौन है? आपके दिमाग में कौन सा नाम आया? जाहिर है वह नाम आदित्यनाथ का ही रहा होगा। भाजपा के उत्तर प्रदेश के नेताओं में भी वही एकमात्र ऐसे नेता रहे जो तमाम आलोचना और गालियां खानें के बावजूद दो दशकों से लगातार हिंदुओं के मुद्दे उठाते रहे। और ऐसी तीखी  भाषा में उठाते रहे जो सारे समाज को झकझोरकर रख दे। जिन्हें उनके विवादित बयान कहा जाता है असल में वह कड़वी सच्चाई है जिसे कभी न कभी किसी को उजागर करना ही था। उसके बगैर सोया हुआ हिंदू समाज जाग नहीं पाता। यूं भी देश की सूडो सेकुलर राजनीतिक व्यवस्था को बेनकाब करने के लिए इस तरह के बयान जरूरी थे। उसमें से कोई बयान किसी अन्य धर्म के पैगंबर या मसीहा पर कीचड़ उछालने का  सस्ता शिगूफा नहीं था मगर वह मुस्लिम क्ट्टरतावाद और उसकी सांप्रदायिक राजनीति को बेनकाब करनेवाले जरूर हैं। जैसे अक्टूबर 2016 को उन्होंने कहा और जिसे काफी विवादित माना गया ‘मूर्ति विसर्जन से होने वाला प्रदूषण दिखता है लेकिन बकरीद के दिन हजारों निरीह पशु काटे गए काशी में, उनका खून सीधे गंगा जी में बहा है क्या वो प्रदूषण नहीं था?’ आखिर क्या गलत था इस बयान में? क्या सुधार केवल हिन्दू त्यौहारों में होने चाहिए मुस्लिम त्यौहारों में नही? उनके कुछ और बयान मैंने देखे ‘मुस्लिमों की जनसंख्या तेजी से बढऩा खतरनाक रुझान है, यह एक चिंता का विषय है, इस पर केंद्र सरकार को कदम उठाते हुए मुसलमानों की आबादी को कम करने की कोशिश करनी चाहिए।’ या ‘लव जेहाद’ को लेकर योगी का एक वीडियो सामने आया था। इसमें वे अपने समर्थकों से कहते सुनाई दे रहे थे कि हमने फैसला किया है कि अगर वे एक हिंदू लडक़ी का धर्म परिवर्तन करवाते हैं तो हम 100 मुस्लिम लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाएंगे। बाद में योगी ने वीडियो के बारे में कहा कि मैं इस मुद्दे पर कोई सफाई नहीं देना चाहता। कुछ छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी भले ही इसे भडक़ाऊ बयान मानें मगर यह आम हिन्दू की अपनी सुरक्षा की चिंता का इजहार है। जब कश्मीर में हिन्दुओं को पलायन करना पड़ा उसके बाद किसी भी हिन्दू का देश में बढ़ती मुस्लिम आबादी को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। उन्हें सेकुलर जमात ने भडक़ाऊ बयान देनेवाला नेता कहकर बदनाम करने की कोशिश की। मगर हिन्दुओं के लिए वे ऐसे नेता है जो उनके मुखर हितैषी भी हैं।

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आदित्यनाथ की खूबी यह भी है कि वे केवल विवादित बयान देकर भावनाएं भडक़ाने वाले नेता नहीं है। जमीनी स्तर पर काम करनेवाले नेता भी हैं। अक्सर हिन्दू धर्म में दो तरह के धर्माचार्य होते हैं। एक वो जो पूजा पाठ, साधना और अध्यात्म में लीन होते हैं। उन्हें दीन-दुनिया और समाज से ज्यादा वास्ता नहीं होता। दूसरे तरह के संन्यासी दयानंद, विवेकानंद और श्रद्धानंद की तरह के होते हैं जो परलोक को साधने के चक्कर में इहलोक को नहीं भूल जाते। वे आध्यात्मिक साधना भी करते हैं तो समाज की चिंता भी। आदित्यनाथ जिस नाथपंथियों के गोरखपीठ के मठाधीश हैं वह दूसरे तरह का साधु समाज रहा है, समाज के हित और कल्याण की चिंता करने वाला। वह हमेशा से हिन्दुत्व आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ा रहा है। उसके महंत दिग्विजयनाथ हिन्दू महासभा के सासंद थे तो उनके बाद मठाधीश रहे अवैद्यनाथ भाजपा के। इस दृष्टि से वह हिन्दुत्व की दो प्रमुख धाराओं हिन्दू महासभा और संघ परिवार का संगम है। आदित्यनाथ भी संघ परिवार से जुड़े हुए हैं। उन के मित्र अपने संस्मरणों में बताते है कि संन्यासी होने से पहले वे अजय कुमार विष्ट थे और कॉलेज में पढ़ते थे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में थे। तब उनकी इच्छा कॉलेज में चुनाव लडऩे की थी। मगर विद्यार्थी परिषद ने टिकट नहीं दिया। मठाधिपति बनने के बाद तो उन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी बनाई और सारे पूर्वांचल में हिन्दू जागरण का अलख जगाया।

गोरखनाथ पीठ तो हमेशा अपने सामाजिक समता और समरसता के संदेश के लिए जाना जाता है। उसकी परंपरा के अनुसार योगी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्यापक जनजागरण का अभियान चलाया। सहभोज के माध्यम से छुआछूत (अस्पृश्यता) की भेदभावकारी रूढिय़ों पर जमकर प्रहार किया। इसलिए उनके साथ बड़ी संख्याव में दलित भी जुड़े हुए हैं। गांव-गांव में सहभोज के माध्यम से ‘एक साथ बैठें-एक साथ खाएं’ मंत्र का उन्होंने उद्घोष किया। योगी को बहुत नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि योगी आदित्यीनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ ने दक्षिण भारत के मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर संघर्ष किया। जून 1993 में पटना के महावीर मंदिर में उन्होंंने दलित संत सूर्यवंशी दास का अभिषेक कर पुजारी नियुक्त किया। इस पर विवाद भी हुआ लेकिन वे अड़े रहे। यही नहीं, इसके बाद बनारस के डोम राजा ने उन्हें अपने घर खाने का चैलेंज दिया तो उन्होंने उनके घर पर जाकर संतों के साथ खाना खाया। इसीलिए योगी आदित्यनाथ का भी दलितों के प्रति लगाव रहा है और वे उनके लिए काम करते रहे हैं।

आदित्यनाथ के राजनैतिक जीवन की शुरुआत तब हुई जब अवैद्यनाथ ने 1998 में राजनीति से संन्यास लिया और योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। 1998 में गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर योगी आदित्यनाथ संसद पहुंचे तो वे सबसे कम उम्र के सांसद थे। वे 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने। 1998 से लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। योगी यूपी भाजपा के बड़े चेहरे माने जाते थे। 2014 में पांचवीं बार योगी सांसद बने। राजनीति के मैदान में आते ही योगी आदित्यनाथ ने सियासत की दूसरी डगर भी पकड़ ली। उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी का गठन किया और धर्म परिवर्तन के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलते हुए उन्होंने कई बार विवादित बयान दिए। योगी और विवादों का चोली दामन का साथ रहा, लेकिन उनकी ताकत लगातार बढ़ती गई। 2007 में गोरखपुर में दंगे हुए तो योगी आदित्यनाथ को मुख्य आरोपी बनाया गया, गिरफ्तारी हुई और इस पर कोहराम भी मचा। योगी के खिलाफ कई अपराधिक मुकदमे भी दर्ज हुए।

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धीरे-धीरे योगी आदित्यनाथ की हैसियत ऐसी बन गई कि जहां वो खड़े होते, सभा शुरू हो जाती, वो जो बोल देते हैं, उनके समर्थकों के लिए वो कानून हो जाता है। यही नहीं, होली और दीपावली जैसे त्योहार कब मनाया जाए, इसके लिए भी योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मंदिर से ऐलान करते हैं, इसलिए गोरखपुर में हिंदुओं के त्योहार एक दिन बाद मनाए जाते हैं। गोरखपुर और आसपास के इलाके में योगी आदित्यनाथ और उनकी हिंदू युवा वाहिनी की तूती बोलती है। भाजपा में भी उनकी जबरदस्त धाक है। इसका प्रमाण यह है कि पिछले लोकसभा चुनावों में प्रचार के लिए योगी आदित्यनाथ को भाजपा ने हेलीकॉप्टर मुहैया करवाया था।

योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद कई बुद्धिजीवी कई सवाल खड़े कर रहे हैं। पहला सवाल तो यही कि क्या भाजपा वाकई विकास के एजेंडे को लेकर गंभीर है? दूसरा सवाल प्रधानमंत्री मोदी के ‘न्यू इंडिया’ बनाने की नीयत पर भी खड़ा होता है। लोग अब कहने लगे हैं कि भाजपा ने विकास के नाम पर हिंदुत्व का झुनझुना थमा दिया है, आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर सबका साथ सबका विकास का मजाक बना दिया है। यह सवाल तो पूछा जा रहा है कि आखिर आदित्यनाथ ही क्यों? भाजपा के पास तो मुख्यमंत्री बननेवालों की लंबी कतार थी। राजनाथ सिंह जैसा नाम था जिन्हें प्रशासन का लंबा अनुभव है। दूसरी तरफ नए चेहरे के तौर पर मनोज सिन्हा जैसा चेहरा था जिसकी प्रशासनिक योग्यता मंत्री के तौर पर साबित हो चुकी थी। ऐसे में विवादों में फंसे और प्रशासनिक रूप से नौसिखाये योगी ही क्यों? उनके कई तरह से जवाब दिए जा रहे हैं। एक तो यही कि संघ का दबाव पड़ा आदित्यनाथ को बनाने का। दूसरी तरफ यह भी चर्चा है कि आदित्यनाथ ने खुद ही नेतृत्व पर इतना दबाव डाला कि उन्हें मजबूर होना पड़ा आदित्यनाथ को कमान सौंपने के लिए। लेकिन ये दोनों जवाब अटकलों पर आधारित ज्यादा हैं।

योगी को सीएम बनाने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह भी दिया जा रहा है कि सबसे शरारती बच्चे को ही क्लास का मॉनिटर बना दिया जाए। बयानबाजी के लिए विवादित रहे योगी पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है। वो भ्रष्टाचार के खिलाफ बेहद सख्त रुख के लिए जाने जाते हैं। उनके सरकार के अगुआ होने से जाति समीकरण भी ठीक बैठ जाते हैं। शायद इसीलिए मोदी ने योगी को सीएम बनाया तो दो उप-मुख्यमंत्री भी बनाए, ताकि योगी विकास के एजेंडे पर कायम रहें।

लेकिन भाजपा से जुड़े कई लोगों का मानना है कि योगी वर्तमान की हकीकत ही नहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए अमित शाह का ब्रह्मास्त्र हैं। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर विरोधियों को विचारने के लिए मजबूर किया कि वे या तो हिंदू राजनीति करें या अखाड़े से बाहर हो जाएं। एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक अमित शाह ही वह वजह हैं जिसने जिद्द की कि उत्तर प्रदेश की उम्मीदवार लिस्ट में एक भी मुसलमान नहीं होगा। अमित शाह की जिद्द थी कि योगी आदित्यनाथ पश्चिम में डेरा डालें और प्रचार कर हिंदू मनोदशा को झिंझोड़े। नतीजों के बाद अमित शाह की जिद्द थी कि उन्हें 2019 की ही नहीं बल्कि आगे के लिए भी उत्तर प्रदेश को हिंदू राजनीति में पकाना है। योगी के भगवा हिंदू और उसमें जात-पात की हकीकत में राजपूत, ब्राह्मण, अतिपिछड़ों की जुगलंबदी को स्थाई बनाना है। देखना यह है कि यह तो 2019 का लोकसभा चुनाव ही बताएगा कि अमित शाह का ब्रह्मास्त्र निशाने को पाने में सफल होगा या नहीं। हिन्दू एकता टिकाऊ रहेगी कि एक चुनाव का अजूबा बन कर रह जाएगी। योगी और मोदी के विरोधी कहते हैं कि मोदी विकास करने में नाकाम रहे हैं इसलिए यूपी की कमान महंत को सौंपकर भाजपा ने जाहिर कर दिया है कि 2019 में भाजपा हिंदू वोटों की गोलबंदी करना चाहती है। भाजपा का गणित यह है कि विरोधी दल अगर उसके खिलाफ एकजुट होंगे तो भाजपा के पक्ष में हिंदू एकजुट होंगे। इससे पार्टी को जीत मिलेगी। इस तरह से भाजपा विकास के रास्ते से भटक गई है।

लेकिन भाजपा के विरोधी यह नहीं जानते  कि हिन्दुत्व और विकास का कोई विरोध नहीं है। जब नरेंद्र मोदी देश के विकास और हिन्दुत्व को साध सकते हैं तो योगी हिन्दुत्व और विकास को क्यों नहीं साध सकते। केवल केसरिया कपड़े पहनने से कोई विकास का दुश्मन नहीं हो जाता। फिर जिस तरह योगी विस्तारवादी मुस्लिम राजनीति का मुखर विरोध करने के बावजूद गोरखपुर में मुसलमानों को साथ लेकर चलते हैं और उन्होंने जनकल्याणकारी कामों का जाल बिछाया हुआ है उससे स्पष्ट है कि उनके पास विकास की बुनियादी दृष्टि है। यह भी कहा जा रहा है कि वे विकास का उत्तर प्रदेश मॉडल विकसित करना चाहते हैं। इससे उनके प्रति उम्मीद जगती है कि  मुख्यमंत्री बनने पर योगी को राजयोगी बनते देर नहीं लगेगी। दूसरी तरफ अखबार ऐसी टिप्पणियों से भरे पड़े हैं जिनमें कहा जा रहा है कि मोदी ने योगी को मुख्यमंत्री बनाकर भस्मासुर पैदा कर लिया है। योगी मोदी के लिए देर-सबेर चुनौती साबित हो सकते हैं। योगी को काबू कर पाना किसी के बस की बात नहीं। अब देखना है कि योगी भस्मासुर बनते हैं कि राजयोगी। अभी हम इतना तो कह सकते हैं कि योगी भारतीय राजनीति का नया यथार्थ हैं जिसकी परतें  आनेवाले दिनों में धीरे-धीरे खुलेंगी। उसमें संभाववनाएं भी है और खतरे भी। उत्तर प्रदेश का नया इतिहास गढऩे का सुनहरा अवसर भी।

 सतीश पेडणेकर

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