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बूचडख़ाना तो है बहाना मोदी-योगी है असली निशाना!

बूचडख़ाना तो है बहाना  मोदी-योगी है असली निशाना!

उत्तर प्रदेश के नतीजे आए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है लेकिन बुद्धिजीवियों के एक तबके ने ‘बहुमतवाद’ यानि Majorititarianism का भूत पैदा करना शुरू कर दिया है। इस वर्ग का तर्क है कि बहुमत पाने का मतलब ये नहीं है कि यूपी की योगी सरकार अपनी मनमर्जी के फैसले लेना शुरू कर दे। ये वर्ग ये भी कह रहा है कि लोकतंत्र में बहुमत पाने वाली पार्टी का उत्तरदायित्व सिर्फ बहुसंख्यकों के प्रति नहीं है बल्कि उसकी जिम्मेदारी सारे समाज की है।  अब समय आा गया हैं कि ‘बहुमतवाद या बहुसंख्यकवाद’ के जिन्न के इस वक्त बाहर निकालने के पीछे की भावना, उसके निहितार्थ, मकसद और टाइमिंग की विवेचना की जाए। ये इसलिए जरूरी है क्योंकि आगे आने वाले समय में बहुत से लोग योगी ही नहीं मोदी सरकार के फैसलों को भी इसी चश्मे से देखने की कोशिश करेंगे।

2014 में आम चुनाव में भाजपा की जीत के बाद से ही देश में लगातार सत्ता भोगने वाले और  उनके मानसिक दत्तक पुत्र बुद्धिजीवी-मीडिया के कई लोग मोदी सरकार पर कई लेवल चिपकाने की कोशिश कर चुके हैं। ‘घर वापसी’ से लेकर ‘असहिष्णुता’ के इन आरोपों की श्रृंखला को देश के आम लोगों  ने सिरे से खारिज किया है। मोदी के उपर अन्य कोई आरोप चिपक नहीं रहा। राष्ट्रवाद की अपील जनता में कितनी बढ़ रही है यह उत्तर प्रदेश के परिणामों से साफ है। सो वामपंथी/उदारवादी खेमे ने अपने बौद्धिक शस्त्रागार से नया लेवल बहुमतवाद यानि Majorititarianism निकाला है। आप देखेंगे कि आने वाले दिनों में अलग-अलग मंचों से इसकी गूंज बार-बार आपको सुनाई देगी। खासकर अब जबकि आम चुनाव में अब तकरीबन दो साल बाकी है।

सवाल ये  उठता है कि बहुमतवाद को इस नकारात्मक रूप में इस्तेमाल करने का अर्थ क्या है? वैसे आप देखें तो वामपंथी विचार में बहुमत को उसके घिनौने रूप में इस्तेमाल करने की परंपरा रही है। जिन देशों में साम्यवादी शासन रहा वहां उन लोगों के खिलाफ अमानुषिक बर्बरता और हिंसा की गयी जो उनके विचार से मेल नहीं खाते थे। पूर्व सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप के देशों और चीन में लाखों लोगों को ‘सर्वहारा क्रांति’ के बाद मौत के घाट उतारा गया। कभी ‘सफाई’ (Purge)  और कभी सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर कितने जुल्म ढाए गए – इतिहास इसका साक्षी है। दिलचस्प बात है कि सैद्धांतिक तौर पर ‘बहुमतवाद’ को मानने वाले और उसका घृणित उपयोग करने वाले वामपंथी विचारक और उनके समर्थक आज गाली के रूप में मोदी की राष्ट्रवादी सरकार पर ये आरोप लगा रहे है! यानि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे!

भारत की संस्कृति से कटे ये लोग न तो भारत की मूल आत्मा को समझते हैं न समझना चाहते है। भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है – बहुलता की पूजा। यह धारणा ही हिन्दू धारणा है। ‘एकम सद विप्रा बहुधा वदन्ति’ यह उसका सूत्र वाक्य है। अपने से अलग विचारों,  आस्थाओं और पद्धतियों को ये संस्कृति सिर्फ स्थान ही नहीं देती बल्कि उसका सम्मान और स्वागत भी करती है। आलोचकों को मालूम होना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र इसलिए जिन्दा है क्योंकि यह हिन्दू बाहुल्य देश है। भारत के जिन टुकड़ों में हिन्दू अल्पसंख्यक हुए वहां लोकतंत्र किस हाल में है ये कहने की आवश्यकता नहीं?

ये सही है कि बहुमत का अर्थ सिर्फ बहुसंख्यकों के हितों की रक्षा नहीं है। लोकतंत्र की ताकत ही सबको साथ लेकर चलने में है।  मगर आलोचकों  को बताना चाहिए कि इस सरकार का कौन सा कदम या नीति है जो इसकी तरफ इशारा भी करता हो? देश के कई हिस्सों में भाजपा की सरकारें अब तो दशकों से है। मोदी स्वयं कोई डेढ़ दशक तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे है। उनपर भी शुरुआत में इन्हीं वर्गों ने ‘हिन्दुत्व की प्रयोगशाला’ चलाने का आरोप लगाया था। देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर भाजपा के लाखों कार्यकत्र्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रहे है। इन पर बगैर किसी आधार या सुबूत के बहुमतवाद चलाने का आरोप लगाना क्या अनुचित नहीं हैं? क्या ये नहीं माना जाए कि मूलत: ये आरोप राजनीतिक है।

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यहां दो उदाहरण देना ठीक होगा। देश के ख्यातिप्राप्त वकील फली नरीमन ने एक इंटरव्यू में कहा कि मोदी से पूछना चाहिए कि देश में अब क्या एक हिन्दू राज्य होगा? उन्होंने ये भी कहा कि योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया जाना संविधान के अनुरूप नहीं है। अब ये थोड़ा समझ नहीं आया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा? यह देश तो संविधान से चलता है। संविधान में वर्णित व्यवस्था इस देश की बहुलवादी सोच से ही उत्पन्न हुई है। यह सोच और संस्कार यहां के बहुसंख्य समाज की देन है जो हिन्दू है। तो फिर कौन सा नया हिन्दू राष्ट्र बनाना है? यह देश तो पहले से ही हिंदू राष्ट्र है। बल्कि इसका उल्टा ही सच है वो है कि वोट बैंक की राजनीति के कारण आजादी के बाद से  देश में अल्पसंख्यकों को भरमाने के लिए तुष्टीकरण की नीतियां बनाईं गईं  जिनसे समाज में कई परेशानियां पैदा हुई है।

अब उत्तर प्रदेश में गैरकानूनी बूचडख़ाने  बंद करने के आदेश के उदाहरण को ही लिया जाए। योगी सरकार के इस फैसले को मीडिया का एक तबका इस तरह से प्रचारित कर रहा है मानो कोई कहर बरपा दिया गया। यही नहीं, शुरू में तो इस तरह की झूठी खबर भी फैलाई गयी कि उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले के कारण लखनऊ का मशहूर ‘टुंडे कबाब’ बंद हो गया है। कोई इसे शाकाहारी बनाम मांसाहारी बहस का रूप दे  रहा है। जबकि हकीकत है कि अवैध बूचडख़ाने बंद करना भाजपा के घोषणा पत्र का हिस्सा था। अगर पहले की सरकारों ने गैरकानूनी बूचडख़ानों को बढ़ावा दिया तो क्या इस सरकार को भी इन्हें ऐसे चलते रहने देना चाहिए? इन अवैध बूचडख़ानों से कई मसले जुड़े है – मसलन राज्य सरकार को इनसे राजस्व नहिं मिलता। अवैध होने के कारण इनसे पैदा होने वाला अवशिष्ट और कूड़ा यूं हीं को दिया जाता है। क्या इन बूचडख़ानों से जुड़े  सरकार के राजस्व, पर्यावरण, स्वास्थ्य और पशु रक्षा के बड़े सवालों पर बहस नहीं होनी चाहिए। सोचिए जलीकट्टू और जीवरक्षा के नाम पर कोहराम मचाने वाली संस्थाएं जैसे पेटा आदि अभी लापता है? सबने जैसे मौन धारण कर लिया है।

दरअसल सवाल बूचडखानों का है ही नहीं। सवाल नजरिये का है। बूचडख़ाना या टुंडे कबाब तो बस बहाना है।  असली निशाना तो यूपी में योगी और केंद्र में मोदी सरकार है।  जब भी कोई ‘बहुमतवाद’ का उपयोग उसकी नकारात्मक प्रतिध्वनि में करता है तो इसका एक अर्थ तो स्पष्ट है कि वह जनता की अदालत में वोटों की लड़ाई हार चुका है। अब उसका मकसद जनता के इस समर्थन को नकारने का है। सवाल लोकतांत्रिक मूल्यों,  व्यवस्था और परम्पराओं में विश्वास का भी है। ‘बहुमतवाद’ की बात करने वालो का लोकतंत्र में भरोसा संभवत: अवसरवादी और सुविधा परस्त है। उनका मकसद जनादेश को भी एक नया रंग देने का है। यानि जनादेश अगर उनके मुताबिक नहीं है तो वह जनादेश भी सही नहीं। पूछना होगा इन्हें  अब तक की सरकारों में ‘बहुमतवाद’ कभी पहले क्यों नजर नहीं आया?

फली नरीमन को तो पता होना चाहिए कि उनके पारसी समुदाय को जब दुनिया भर में प्रताडि़त किया जा रहा था तो भारत ने उन्हें सुरक्षा ही नहीं दी, बल्कि सर माथे पर बिठाया। दूसरे के विचारों,  विश्वासों, आस्था और पद्धतियों से असहमत होते हुए भी उनका स्वागत करना – इस भारतभूमि की ही देन है। यह सोच सदियों से चली आई उस भारतीय परंपरा से आई है जिसका उल्लेख  वेद,  पुराण, उपनिषद आदि बार-बार करते है। आप इसे हिन्दू कहें या भारतीय, पर असलियत तो ये है कि ये इस माटी के संस्कार से पैदा हुई है। ‘बहुमतवाद’ का जिन्न खड़ा करके आप इस देश की विरासत और परंपरा तथा यहां के लोगों की सोच का अपमान कर रहे हैं। ऐसा भय पैदा करके सिर्फ आप एक नया राजनैतिक नैरेटिव देने की कोशिश कर रहे हैं जो मूलत: प्रतिगामी और नकारात्मक है। आप भाजपा से राजनीतिक लड़ाई लड़ें मगर लोगों की  सोच को और जनादेश को ‘बहुमतवाद’ कहके गाली तो न दें।

उमेश उपाध्याय

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