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भक्ति का रंग

भक्ति का रंग

हमारे पूर्वजों के द्वारा बनाए गए हर रीति-रिवाज को मानते हुए हम अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाते हैं। कभी त्योहारों के माध्यम से तो कभी शादी-विवाह जैसे कार्य के माध्यम से हम अपनी परंपराओं को सुदृढ़ बनाते हैं। देखा जाए तो हमारे हर त्योहार और हमारे हर रीति-रिवाज हमें एक संदेश प्रदान करते हैं। पूरे भारतवर्ष में कहीं पर भी कोई भी त्योहार मनाया जाता है तो उसका हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ता है। होली, दिवाली जैसे त्योहार तो प्रमुख भूमिका निभाते हैं, हमारे बीच आपस में प्यार और भाईचारा बनाकर रखने के लिए सभी त्योहारों का महत्व होता है। जैसे आलोकों का पर्व दिपावली हमारे जीवन को आलोकित करता है, वैसे ही रंगों का पर्व होली हमारे जीवन में रंग भर देता है।

भारत के अनेक प्रदेशों में होली राधा-कृष्ण के साथ मनाते हैं। सभी ग्रामवासी पांच दिन तक राधा-कृष्ण को कंधे पर रखकर ढोल, मृदंग, घंटों के साथ पूरे मग्न भाव के साथ यह त्योहार मनाते हैं। होली को इस प्रकार मनाकर सभी का न केवल वातावरण रंगीन हो जाता है, मन भी रंगीन हो जाता है। होली के इन विभिन्न रंगों से रंगने से हम जीवन के एक महान सच से वाकिफ होते हैं। जैसे हम एक दिन रंगों को एक-दूसरे पर लगाकर कुछ समय पश्चात अपने आप को धोकर रंगो से अलग कर देते हैं उसी प्रकार जीवन में आने वाले हर रंग जैसे सुख, दुख, प्रेम, दया इन समस्त रंगों को अपने जीवन पर लगाना और उसको मिटाकर साफ करना वह भी आवश्यक है। कोई भी रंग को हमेशा के लिए अपने ऊपर लगाकर रखना नहीं चाहिए। जो परमात्मा के साथ भक्ति और प्रेम का रंग लगाता है बस वही हमेशा के लिए आपके साथ रह सकता है। उसी रंग में एक बार खुद को रंग लो तो वह जीवन भी रंगीन हो जाता है।

इन रंगों के खेल से हमें और भी शिक्षा मिलती हैै, जब तक हम रंगों से खुद को अलग नहीं करते है, तब तक हम अपनी पहचान भी खो बैठते है। रंग जितना अधिक गाढ़ा होता है उतनी अधिक हम अपनी पहचान खो बैठते हंै। होली जैसे त्योहारों में हम एक दिन रंग लगाकर अपनी पहचान से कुछ समय तक दूर हो सकते है, लेकिन विभिन्न रंगों में हमेशा अगर हम अपने आप को डुबो कर रखेंगे तो कैसे कोई पहचान कर सकता है? हम स्वयं से भी अपनी पहचान खो बैठते है। अत: रंग लगाना और छुड़ाना अपने आप में ही एक शिक्षा बन जाती है। जो भक्ति और प्रेम-भाव की हम बात करते है वह रंग तो परमात्मा के द्वारा उन्हीं की कृपा से मिलता है। जो सच्चा भक्त होता है उसे यह रंग अपने आप लगता है, वह सैकड़ों लोगों से अलग हो जाता है, जिन्हें परमात्मा के द्वारा रंग लग जाता है।

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