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नौकरी कैसे मिले?

नौकरी कैसे मिले?

नौकरी एक सुन्दर युवती के समान है। भारत में नौकरी एक अनबूझ पहेली है। उसके चाहने वाले जंगलों और रेगिस्तान में चारों ओर हैं, पर वह उसे चाहने वालों में से किसी एक का वरण करती है। वह जिसको मिलती है, वह भी परेशान और जिसको नहीं मिलती, वह भी परेशान। सभी नौकरियों के पीछे भाग रहे हैं, विशेषत: सरकारी नौकरियों के पीछे, क्योंकि सरकारी नौकरियों में काम कम, पैसा अधिक है। साथ-साथ सरकारी नौकरियों में सामाजिक मान्यता एवं सुविधाएं हैं। सरकारी नौकरियां दिनों-दिन सिमट रही हैं, क्योंकि सरकारी नौकरियों में प्रवेश करने के पश्चात् सरकारी सेवक, काम करना कम कर देते हैं। भारतीय अर्थतंत्र में सरकारी योगदान कम होता जा रहा है। वर्तमान में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सभी सरकारी प्रतिष्ठानों का कुल मिलाकर केवल सत्रह प्रतिशत योगदान है।

यह तो उत्तम हुआ कि भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आगे निकलकर प्रथम स्थान बना लिया, जिस कारण इस क्षेत्र में लाखों नौकरियों का सृजन हुआ एवं हमारे लाखों बेकार इंजीनियर इसमें लग गये। यही हाल कमोबेश वस्त्रोद्योग ने किया, पर इन क्षेत्रों में दूसरे देश भी भारत को टक्कर दे रहे हैं तथा भारत को प्रथम स्थान कायम रखना मुश्किल हो रहा है। अत: भारत में अन्यान्य नौकरियों के क्षेत्र सृजित करने होंगे। घरों में बचपन से ही बच्चों को सिखाया जाता है कि वह अच्छा पढ़े, ताकि अच्छी नौकरी पाये तथा उसके आगे-पीछे लोग दौड़ें। उसके पास नीली या लाल बत्ती की गाड़ी हो, पुलिस सलाम करे तथा उसे सभी जगहों पर प्राथमिकता प्राप्त हो। इस प्रकार प्रत्येक माता-पिता अपने अधूरे सपनों को उस र्निबोध बच्चे पर आरोपित कर देते हैं, जो भले ही उस योग्य न हो।

बालक युवा होकर अपने माता-पिता की आकांक्षा पूर्ति करने का पूर्ण प्रयास करता है। सुनते-सुनते उसकी महत्वाकांक्षा नौकरी प्राप्त करने की हो जाती है, पर यह सुनते-सुनते उसके कान पक जाते हैं कि नौकरियों में भ्रष्टाचार है। केवल राजनीतिज्ञों, उच्चपदस्थ नौकरशाहों तथा बड़े लोगों के लडक़े-लड़कियां नौकरियां पाते हैं। भारत में सब कुछ खराब नहीं है। जो प्रारम्भ से ही तैयारी करते हैं, वे अवश्य सफल होते हैं। आजकल प्रतियोगिता का युग है।

जीवन में कुछ असंभव नहीं है। यदि नौकरियों में एक अंश भ्रष्टाचार भी हो तो प्रतियोगी अपनी विलक्षण बुद्धि, कठिन परिश्रम तथा लगन से भ्रष्टाचार के दंश को काट सकता है। भारत में एक व्यक्ति ने तो अपनी पत्नी के प्रेम में पहाड़ को भी अकेले काटकर रास्ता बना दिया। जिस पर आपका नियंत्रण नहीं है, उसके विषय में सोचना निरर्थक है। गीता में भी कहा गया है कि कर्म करते रहो, फल के विषय में न सोचो। आजकल परिवारों में, स्कूल-कॉलेजों में भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक एवं राजनैतिक परिवेश की इतनी आलोचना होती है, कि विद्यार्थी की मन:स्थिति नौकरी की लड़ाई में पहले से ही कमजोर पड़ जाती है। विश्व में अधिकांश युद्ध अनुप्रेरण एवं तीव्र मनोबल से जीते जाते है। नौकरी के संग्राम में भी प्रतियोगी को यह सोचकर उतरना होगा कि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बनायेगा ताकि उसके पीछे लगे राहु-शनि दृष्टि या विरोधी स्वयमेव तिरोहित हो जायें।

वर्तमान केन्द्रीय सरकार ने चतुर्थ श्रेणी की कुछ नौकरियों में साक्षात्कार पद्धति समाप्त कर दी है ताकि साक्षात्कार में व्याप्त पक्षपात तथा मनमानी को अवसर ही न मिले। यह एक उपयुक्त कदम है, क्योंकि पुलिस/सिपाही आदि की नौकरियों में साक्षात्कार के दौरान काफी धांधलियां होती हैं। इन धांधलियों में संलिप्त अधिकारी एवं अभ्यार्थीगण पकड़े भी गये हैं तथा कइयों को तो नौकरी की कुर्सी पर बैठने के पहले ही जेल की हवा खानी पड़ रही है। नौकरियों में आने के पश्चात लोग पढऩा-लिखना बंद कर देते हैं। वे केवल घिसी-पिटी लकीर पीटते रहते हैं। इसका एक हल यह है कि प्रत्येक स्तर पर सरकारी नौकरियों में खुले बाजार से मेधावियों को लिया जाय।

भारत में आज भी राज्यों के लोक सेवा आयोगों तथा संघ लोक सेवा आयोग द्वारा जो नौकरियां प्रदत्त होती हैं, वे भारतीय मानकों के हिसाब से पक्षपात रहित हैं तथा आरक्षण के अतिरिक्त मेधावी एवं योग्य व्यक्ति का ही नौकरी में चुनाव होता है। संघ लोक सेवा आयोग पूरी प्रचेष्टा कर रहे हैं कि श्रेष्ठ, ईमानदार तथा समाजदर्दी व्यक्ति ही सरकारी नौकरियों में चयनित हों, पर ऐसा हर समय संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि नौकरियों के बाजार में खुली दुकानें अर्थात् कोचिंग सेन्टर उन्हें ऐसा पढ़ाकर, सजाकर, रटाकर भेजते हैं कि साक्षात्कार बोर्ड उसके सामने बैठे अभ्यर्थी की सही-सही जांच-परख नहीं कर पाता है।

निजी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र की तुलना में प्रतियोगिता अधिक हैं। निजी-क्षेत्रों में लाभ कमाना ही एकमात्र उद्देश्य है। अत: निजी क्षेत्रों में प्रतिष्ठान की आवश्यकता के अनुकूल ही अभ्यर्थी का चयन किया जाता है। यदि किसी सूचना प्रौद्योगिकी की कम्पनी को कनाडा या अफ्रीका के लिए लोग चाहिए, तो वे उन देशों की भाषा जानने वाले तथा उन देशों में कम्पनी के कार्य के उपयुक्त तकनीकी विशेषज्ञ को वे लेंगे। वे अधिकांश प्रशिक्षण तथा अन्वेषण में समय एवं धन नहीं लगाना चाहते हैं। अत: निजी क्षेत्रों में नौकरियों के लिये गिद्ध दृष्टि की भांति विद्यार्थी को स्वयं के लिये तैयार करना होगा ताकि उसके कॉलेज या विश्वविद्यालय से निकलते ही कम्पनियां उसे उठा कर ले जायें। इस वैश्वीकरण के युग में भारत की कम्पनियों को विश्व-स्तर पर प्रतियोगिता में ठहरने के लिये इन बिन्दुओं का अभ्यर्थी के चयन में ध्यान रखना पड़ता है।

यह ध्रुव सत्य है कि सरकारी नौकरियों का हाल ‘एक अनार, सौ बीमार’ जैसा है। अत: जिस युवा को नौकरी न भी मिले, उसे पश्चाताप करने की आवश्यकता नहीं। हो सकता है कि भविष्य के गर्भ में उसके लिये और कुछ छुपा हो। युवा का रक्त गर्म हैं, वह पर्वत को भी हिला सकता है। अत: उसे अपनी ऊर्जा एवं उद्यमिता अन्य क्षेत्र में तुरंत झोक देना चाहिए। भारत की शस्य-श्यामला धरती है, इसमें जो पैदा हुआ है, उसके लिये ईश्वर ने पहले से खाने का प्रबंध कर दिया है।

सरकार ने एक उत्तम कदम उठाया है, ताकि नौकरियों के पीछे भटकने वाले युवक निराश न हों। वे विभिन्न कार्यों के लिये कौशल विकास योजना में प्रशिक्षण लें तथा चारों ओर बिखरे धंधों, पेशों तथा सेवा कार्यों में संलग्न हों। देश-विदेशों में प्रत्येक स्तर के तकनीकी प्रशिक्षित व्यक्तियों की आवश्यकता हैं। यदि आप योग्य होंगे, तो कोई भी कम्पनी आपको ले जायेगी अथवा आप अपना स्वयं का धंधा या पेशा आरम्भ सकेंगे। ‘नर हो न निराश करो, मन को’ आगे बढ़ते रहो। असफलता को भूल जाओ, उसे पीछे छोड़ दो। अहर्निश बढ़ते रहो। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी।

प्रमोद कुमार अग्रवाल

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