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समान नागरिक संहिता आवश्यकता और व्यावहारिकता

समान नागरिक संहिता आवश्यकता और व्यावहारिकता

आज भारतीय राजनीति के सामने सबसे विवादित मुद्दों में से एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का है। वैसे संविधान में शामिल राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत का अनुच्छेद 44 नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता की बात करता है, लेकिन यूसीसी अब तक एक सुहाना सपना ही रहा है क्योंकि किसी भी सरकार ने अब तक इस विषय को उस गंभीरता से नहीं लिया है जैसा इसे लिया जाना चाहिए। संभवत: इसका कारण चुनावों में सांप्रदायिक वोट बैंक के पलटवार का डर रहा है। इसके अलावा, 2014 से पहले की जितनी भी गैर-एनडीए सरकारों ने देश पर शासन किया है वे अपनी छद्म-धर्मनिरपेक्ष नीति की लीक पर चलते हुए तुष्टिकरण के फैसले लेने के लिए जानी जाती रही हैं ताकि अल्पसंख्यक समुदाय को खुश किया जा सके, वह भी तब जबकि अपने अधिकांश कार्यकाल में उन पर पॉलिसी पैरालिसिस का दुष्प्रभाव था।

वर्तमान सरकार की ओर से यूसीसी को सभी समुदायों पर लागू करने के गंभीर प्रयास किए गए हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, लेकिन मौलवियों और उनके साथियों के नेतृत्व में मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग इसका पुरजोर विरोध कर रहा है। सभी पक्षों के बीच अनगिनत तौर की बातचीत और बहस के बावजूद इस विषय पर किसी अंतिम नतीजे तक पहुंचने में सफलता नहीं मिल सकी है। सही सोच रखने वाले देश के सभी पुरुषों और स्त्रियों की आकांक्षाओं पर अब तक धार्मिक भावनाएं हावी रही हैं, जबकि वे चाहते हैं कि धार्मिक पहचान और मान्यताओं के बावजूद न्याय के हित में कानून सभी के लिए बराबर हो।

सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता देश की धर्मनिरपेक्ष लोकाचार के भी अनुरूप है। पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता महज सरकार की ओर से खुद को चर्च से दूर करने का एक कार्य है। लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में सभी धर्मों के लोगों के साथ समान व्यवहार, सरकार की ओर से अपनाया गया एक सकारात्मक रुख है। इसके लिए यह आवश्यक है कि सरकार बिना किसी भेदभाव या पक्षपात के, विभिन्न धर्मों के लोगों की भावनाओं का सम्मान करे। कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समान मानने का प्रयास जहां राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के संबंधित अनुच्छेद के अनुरूप ही है, वहीं देश के लिए इसे लागू करना तब तक संभव नहीं है जब तक कि अल्पसंख्यक समुदायों की ओर से उसकी कार्रवाई को उनकी भावनाओं को कुचलने के प्रयास के रूप में या अपने धार्मिक मतों के अनुसार जीने की उनकी स्वतंत्रता में कटौती के रूप में ना देखा जाए।

समान नागरिक संहिता क्यों?

इसके साथ ही, किसी भी धर्म के लोगों को किसी एक सांचे में ढला हुआ नहीं देखा जा सकता या उनके साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता और यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने समुदाय पर लागू होने वाले पर्सनल लॉ को बेहिचक मान लेंगे। इसका कारण यह है कि इस तरह के पर्सनल लॉ की शुरुआत और रचना धार्मिक सिद्धांतों और सांस्कृतिक रस्म-रिवाजों के आधार पर हुई थी, जो मध्यकाल के समय के हैं। उन्हें ऐसे लोगों के मुताबिक बनाया गया था जो हजारों मील दूर बेहद मुश्किल परिस्थितियों में जी रहे थे और अपने धर्म के कथित वर्चस्व के लिए लड़ रहे थे। भारतीय परिदृष्य में जहां कोई भी समुदाय ऐसे लोगों से बना होता है जिनके जीवन के निजी मामलों और व्यक्तिगत जीवन को लेकर अपने ही विचार, धारणाएं और राय होती हैं जो उस देश की बदली परिस्थितियों और हालातों पर निर्भर हैं। यदि वे अपनी किसी समस्या का समाधान प्राकृतिक न्याय की शर्तों के मुताबिक किसी भी अन्य नागरिक की तरह ही चाहते हैं, जिसमें दूसरों की धार्मिक भावनाओं या धारणाओं को ठेस ना पहुंचे, तो उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता है।

पर्सनल लॉ के मामले में, उसके प्रावधानों की व्याख्या पूरी तरह से मौलानाओं और अन्य धार्मिक व्यक्तियों और एजेंसियों के पक्ष में है। अन्य समुदायों के सदस्यों को जहां अपरिहार्य रूप से प्राकृतिक न्याय का अधिकार है, वहीं उस समुदाय के स्त्री या पुरुष के लिए शादी, तलाक, गुजारा, गोद लेने, वसीयत आदि के मामले में बाधा खड़ी हो जाती है। तीन तलाक का मुद्दा इसी का एक उदाहरण है। तलाकशुदा महिला को भत्ते का अधिकार होता है लेकिन उसके मौलिक अधिकार पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। एक महिला के लिए आत्म-सम्मान के साथ लिंग की समानता के आधार पर जीने पर सवाल उठ जाते हैं। यह एक प्रकार की ऐसी विवश करने वाली स्थिति है जिसमें भारी तादाद में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग, खास तौर पर महिलाएं अपने आप को घिरा हुआ महसूस करती हैं।

ऐसे स्त्री और पुरुष देश और समाज के विकास में विकसित सामाजिक स्थिति में अपनी पूरी क्षमता के साथ योगदान करें, यह भी बहुसंख्यक समाज के साथ ही उस अल्पसंख्यक समाज के लिए भी विचार करने लायक विषय है जिससे उस व्यक्ति का संबंध है। इसके अलावा, सदियों से गर्द-गुबार से ढके इस प्रकार के कानूनों की वैधता पर सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें चुनौती देने का ही रास्ता बचा है ताकि अल्पसंख्यक समुदाय के प्रभावित लोगों के भय को दूर किया जा सके जो सदियों से उपेक्षा, अधीनता और धर्म के नाम पर ही सही, लेकिन अपने ही साथियों के हाथों भेदभाव का शिकार हुए हैं। इस प्रकार के पीडि़ति लोगों को जब पर्सनल लॉ के प्रावधानों के खिलाफ विरोध में अपनी आवाज उठाने का मौका मिलता है और वे लकीर को लांघ कर आगे बढ़ते हैं और अदालतों में जाकर इंसाफ मांगते हैं, तो देश न तो मूकदर्शक बनकर बैठा रह सकता है ना ही इस स्थिति का निपटारा करने के लिए अकर्मण्य बना रह सकता है।

बाधाएं

इस परिस्थिति का हल निकालने के लिए न्यायपालिका के लिए निर्णय लेना मुश्किल दिख रहा है, जिससे पीडि़त व्यक्ति को एक बार फिर पर्सनल लॉ के गड़बड़झाले में फंस जाता है, जबकि वह उसी के चंगुल से निकलना चाहता है। राजनेताओं पर अपने वोट बैंक का डर इस कदर हावी है कि उनमें या तो इच्छाशक्ति की कमी है या फिर सामाजिक कल्याण के लिए किसी भी कदम को उठाने में उनका अडिय़ल रवैया सामने आ जाता है। ऐसे रवैये के कारण ही उन्हें न्यायपालिका की ओर से निष्पक्ष फैसले सुनाने और सारे नागरिकों के लिए प्राकृतिक न्याय की परवाह नहीं होती। यह बात कांग्रेस शासन के दौरान शाह बानो केस में देखी गई है। इस प्रकार जिस समुदाय के सदस्यों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर्सनल लॉ से शासित होती है वे अपने समुदाय के बुजुर्गों के अडिय़ल रवैये और अपनी निजी नागरिक संहिता की जिद के शिकार हो जाते हैं। सरकार इस कारण किसी दुखी व्यक्ति के दर्द को अनदेखा नहीं कर सकती कि वह पर्सनल लॉ के द्वारा शासित होता है, हालांकि, अब तक की गैर-एनडीए सरकारें बिल्कुल ऐसा ही करती आई हैं।

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खतरनाक चेतावनी

इस परिस्थिति का परिणाम अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के बीच, विशेष रूप से महिलाओं के बीच उबलता असंतोष है, जिन्हें लगता है कि वे एक लचर व्यवस्था के शिकार हैं। भारत का समाज ऐसा है जहां गंभीर उकसावे और भडक़ाए जाने के बावजूद विभिन्न धार्मिक आस्थाओं वाले लोग सौहार्द के साथ रहते हैं। देश के भविष्य के लिए यह शुभ संकेत नहीं है कि वह अपने नागरिकों की एक बहुत बड़ी संख्या को इस तरह की मायूसी में छोड़ दे। इस प्रकार के समूहों न सिर्फ विभिन्न धार्मिक समूह शामिल हैं बल्कि अनजाने व्यक्ति भी हैं, जिन्हें साथ लेकर चलना देश की जिम्मेदारी है। यह न्यायपूर्ण व्यवस्था और स्वयं देश के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरी है। ऐसा न होने पर इस अव्यवस्था के प्रति बढ़ता असंतोष समय के साथ-साथ गर्व की भावना को समाप्त कर देगा। इतने महत्वपूर्ण विषय पर सार्थक पहल करने में सरकार की नाकामी न केवल इसके कारगर होने पर प्रश्नचिन्ह लगा देगी बल्कि देश में लोकतंत्र की बदहाल स्थिति को भी जगजाहिर कर देगी।

इस साल 23 जनवरी को, जयपुर साहित्य महोत्सव में, इस्लाम के महिला विरोधी विचारों की निंदा करने के लिए मशहूर, बाांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ठीक ही कहा कि मुस्लिम महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने के साथ ही कुछ धर्म गुरुओं की ओर से फतवा जारी किए जाने पर लगाम लगाने के लिए भारत को तत्काल समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है। लब्बोलुबाब यह है कि यूसीसी को लागू करने में पहले ही बहुत देर हो चुकी है और उसे अब लागू कर देना चाहिए। इसमें और देरी करना वैसा ही होगा जैसे देश अपने ही लोगों के एक वर्ग को बेसहारा छोड़ दे,चाहे उनकी संख्या कितनी भी कम या ज्यादा क्यों न हो। वह भी सिर्फ इस बहाने कि आम सहमति नहीं और इसकी आड़ में एक सार्थक कल्याणकारी समाज के प्रति बेरुखी और सुस्ती बरती जाए, जबकि, सच्चाई यह है कि इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।

बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा यूसीसी पर विधि आयोग की ओर से तैयार की गई प्रश्नावली को यह कह कर लौटा दिया जाना कि ‘प्रश्नों को इस प्रकार बनाया गया है कि जवाब देने वाला (बिहार सरकार) एक खास तरीके से जवाब दे’, भारतीय राजनीति में हर बात पर ना कह देने वालों का एक जीता-जागता उदाहरण है, जो जिम्मेदारी से बचने का बहाना ढूंढ़ लेते हैं, ठीक उसी तरह जैसे जल्लीकट्टू में शामिल खिलाड़ी अपनी तरफ दौड़ कर आते सांड से बच निकलते हैं। अब देश हाथ पर हाथ धरे बैठकर लिंग की समानता और सभी नागरिकों के लिए निष्पक्षता को ठंडे बस्ते में डाल देती है या नहीं, ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका जवाब सभी सही सोच रखने वालों को देना चाहिए।

रास्ता भले ही बहुत लंबा है, लेकिन देशवासी इसे तय कर सकें, इसके लिए पहले कदम के तौर पर सरकार को इन मुद्दों की बारीकियों की जानकारी लोगों को देनी होगी। इस बात को भी सबके सामने लाने की जरूरत है कि कैसे दुनिया भर के कई देशों ने, जिनमें अनेक इस्लामिक देश शामिल हैं, अपने सामाजिक और संपूर्ण विकास के लिए यूसीसी को चुन लिया है। अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को इस बात का एहसास करने लिए प्रेरित किया जाना चाहिए कि अपने हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण विषयों पर उनके लिए आत्म-मंथन करने और आलस को छोडऩे का समय आ गया है। अपनी अलग सोच और विकास के लिए आवश्यक परिवर्तनों को लाने के उद्देश्य से गैर-पारंपरिक तौर-तरीके अपनाने के लिए मशहूर हो चुकी इस सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों को सहमत करने की है, जिनका हित इस विषय से मुख्य रूप से जुड़ा है। उन्हें उनके सुविधाजनक दायरे से बाहर लाना होगा और संघीय सरकार की ओर से की जा रही साहसिक पहल में उनका मजबूती से समर्थन भी करना होगा।

 सुनील गुप्ता

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