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धौलपुर उपचुनाव में भाजपा की जीत वसुंधरा सरकार पर जनमत संग्रह की तस्दीक

धौलपुर उपचुनाव में भाजपा की जीत  वसुंधरा सरकार पर जनमत संग्रह की तस्दीक

धौलपुर विधानसभा क्षेत्र के इतिहास में प्रथम उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी शोभारानी ने अब तक विजयी हुए उम्मीदवारों को प्राप्त मतो एवं जीत के अंतर का कीर्तिमान स्थापित करने के साथ राजस्थान में वसुंधरा सरकार के नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों पर विराम लगा दिया है वही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट द्वारा इस उपचुनाव को वसुंधरा सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह की चुनौती का जवाब भी जनता ने दे दिया है। प्रमुख प्रतिपक्ष कांग्रेस और सत्तारूढ़ भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने इस उपचुनाव में भाजपा की प्रचण्ड जीत ऐतिहासिक बन गई।

एक तरफ उत्तर प्रदेश तथा दूसरी ओर मध्य प्रदेश की सीमा से सटे धौलपुर जिले के इस उपचुनाव की चर्चा इसलिए भी रही कि जिन आठ राज्यो में विधानसभा की दस सीटों के लिए उपचुनाव हुआ उनमे धौलपुर में भाजपा प्रत्याशी की जीत का अंतर सर्वाधिक रहा है। दूसरी बार शासन सत्ता की बागडोर संभालने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का यह गृह जिला है जहां वह पूर्व धौलपुर रियासत में बहू के रूप में महारानी बनी। तीन दशक पूर्व धौलपुर से ही 1985 में उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़कर अपना चुनावी सफर आरम्भ किया था। पूर्व उपराष्ट्रपति और राज्य के मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत भी विधानसभा में धौलपुर का प्रतिनिधित्व कर चुके है।

इस उपचुनाव की मतगणना के आंकड़ो का विश्लेषण करे तो भाजपा की शोभारानी कुशवाह को 91 हजार 548 मत मिले है जो अब तक कीर्तिमान है। इसी प्रकार जीत का अंतर 38 हजार 673 भी रिकार्ड बन गया है। वर्ष 2013 के चुनाव में शोभारानी के पति बी.एल. कुशवाह ने बसपा उम्मीदवार के रूप में 49 हजार 892 (37.86 प्रतिशत) मत लेकर कांग्रेस के बनवारी लाल शर्मा के 9209 मतों से पराजित किया था। उन्हे 40 हजार 683 (30.87 प्रतिशत) मत मिले थे। भाजपा के पूर्व विधायक अब्दुल सागीर खान 35 हजार 351 (26.62 प्रतिशत) वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे थे।

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इस उपचुनाव में कुल 15 प्रत्याशी मैदान में थे लेकिन सीधा मुकाबला भाजपा व कांग्रेस के बीच था। अन्य सभी की जमानते जब्त हुई और उन्हे 952 नोटा मतों की तुलना में भी कम वोट मिले। कांग्रेस प्रत्याशी बनवारी लाल शर्मा के समान नाम वाले समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार भी 664 वोट हासिल कर सके। मतगणना के पहले से उन्नीसवे राउण्ड तक भाजपा प्रत्याशी की बढ़त बुलंदिया छूती रही। कांग्रेस इस उपचुनाव को कांटे की टक्कर मानकर चल रही थी। ब्राह्मण एवं गुर्जर समुदाय के साथ उसे बसपा के वोट बैंक की भी उम्मीद थी लेकिन चुनाव परिणाम ने यह दर्शा दिया है कि पिछली बार बसपा तथा भाजपा प्रत्याशी को मिले 50 हजार एवं 35 हजार मतों के साथ नये नौ हजार मतदाताओं में से अधिकांश का झुकाव भी भाजपा के साथ रहा और कांग्रेस का गणित फेल हो गया। प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता प्रताप सिंह खाचरियावास ने हार जीत के इस बड़े अंतर के  लिए ई वी एम मशीनों की गड़बड़ी का राग अलापा लेकिन मीडिया ने इसे तबज्जो नही दी।

इस उपचुनाव से कई चुनावी हिसाब किताब भी हुए है। जहां भाजपा ने बसपा से सीट हासिल की है वही बसपा विधायक की पत्नी शोभारानी ने भाजपा का दामन थाम कर अपने पति के मुकाबले कांग्रेस प्रत्याशी को चार गुने से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया है। वर्ष 1985 में वसुंधरा राजे ने कांग्रेस के ही बनवारी लाल शर्मा को 22680 वोटो से पराजित किया था लेकिन अगली बार लगभग 22 हजार मतों से पराजित होकर उन्होने झालावाड़ संसदीय क्षेत्र की ओर रूख कर लिया। बाद में वह झालावाड़ जिले से निर्वाचित होकर मुख्यमंत्री बनी।

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गौरतलब है कि चौदहवीं विधानसभा के चुनाव मे वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा 200 में से 163 सीटों पर सफलता के साथ सत्तारूढ़ हुई थी। यह भी एक कीर्तिमान था और लोकसभा की सभी 25 सीटें भी उसकी झोली में गई। लेकिन चार विधायकों के सांसद चुने जाने पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने धमाका किया जब सूरजगढ़ (झुन्झुनू) वैर (भरतपुर) नसीराबाद विधानसभा क्षेत्र (अजमेर) में कांग्रेस ने जीत दर्ज की और भाजपा को महज कोटा दक्षिण सीट पर संतोष करना पड़ा। इस प्रकार पहले साल के कार्यकाल में ही वसुंधरा सरकार को झटका लगा। और अब जब राज्य सरकार के कार्यकाल का डेढ़ साल बचा है तब हत्या के मामले में धौलपुर के बसपा विधायक की सदस्यता समाप्त होने पर इस उपचुनाव में हार जीत का महत्व बढ़ गया। इसलिए कांग्रेस ने एडी चोटी का जोर लगाया ताकि इस चुनावी जीत से वर्ष 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी में जान फंूकी जा सके। वर्ष 1967 से धौलपुर से चुनावी दौड़ लगाने वाले धावक 77 वर्षीय बनवारी लाल शर्मा पर फिर दांव खेला गया ताकि संख्या में कुशवाह समाज की बराबरी पर ब्राह्मण समाज के वोटों को अपने पक्ष में किया जा सके। पूर्व मंत्री बनवारी लाल शर्मा इससे पहले दस चुनाव लड़ चुके है और पंाच-पांच में हार जीत से बराबरी पर रहे है लेकिन उपचुनाव में मिली पराजय से बराबरी का गणित गड़बड़ा गया। पायलट सहित राज्य भर से कांग्रेस नेताओं को धौलपुर में जुटाया गया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी आखरी दौर मे वहां पहुंचे। स्वयं पायलट ने कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में रोड शो किया। चुनाव प्रचार के दौरान पायलट ने वसुंधरा सरकार के विकास के दावों पर सवालिया निषान लगाते हुए उपचुनाव को सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह का प्रतीक बताया। पायलट सहित कांग्रेस नेताओं ने सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग का आरोप लगाते हुए चुनावी लड़ाई को भाजपा की अपेक्षा सत्ता से मुकाबला माना। चुनाव नतीजों के बाद मीडिया से मुखातिब पायलेट की टिप्पणी थी कि भाजपा की जीत विकास के आधार पर नही अपितु मैनेजमेंट और संसाधनों के बल पर हुई है। चुनावी जीत के लिए भाजपा ने सत्ता का भारी दुरूपयोग किया। गौरतलब है कि चुनाव प्रचार के अंतिम दिन रोड़ शो के दौरान पैर मे मोच आने के कारण मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के धौलपुर स्थित राजनिवास में रूकने को कांग्रेस ने आचार संहिता के खिलाफ बताया और निर्वाचन आयोग से शिकायत कर मेडिकल बोर्ड मुख्यमंत्री की स्वास्थ्य जांच करवाई।

यह सही है कि वसुंधरा राजे ने धौलपुर उपचुनाव को अपने राजनीतिक वर्चस्व की दृष्टि से गंभीरता से लिया। रणनीति के तहत वह लम्बे अर्से तक धौलपुर रही तथा जातीय सभी समीकरण एवं जमीनी हकीकत के मद्देनजर शोभारानी को भाजपा में शामिल किए जाने की कवायद की और बाद में उसे पार्टी का प्रत्याशी घोषित करवाया। प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी सहित मंत्रिमण्डल के प्रमुख सदस्यों को क्षेत्रानुसार जिम्मेदारी सौंपी गई और आखिर में स्वयं वसुंधरा ने मोर्चा संभाला जिसकी परिणति प्रचण्ड जीत के रूप में हुई। जीत के इस जश्न में वसुंधरा राजे का धौलपुर स्थित राज निवास पैलेस पहली बार आम जनता के लिए खोला गया और जनता ने दिल खोल कर वसुंधरा राजे को जीत की बधाई दी।

जीत की खुशी से प्रफुल्लित वसुंधरा ने कहा कि लगभग तीन दशक बाद हमे यह जीत का स्वाद चखने को मिला है। हमारे पास समय कम है। अगले बीस माह में धौलपुर में विकास के लिए काफी काम किया जायेगा। धौलपुर की यह जीत राज्य सरकार के तीन वर्षो मे किए विकास कार्यो और सुशासन की जीत है। जनता के विश्वास और पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत का परिणाम है। यह अभूतपूर्व जीत आने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों का संकेत है। भाजपा सुराज के अपने संकल्प पर इसी तरह खरा उतरते हुए 2018 मे होने वाले चुनाव में भी भारी बहुमत से सरकार बनाएगी।

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इस टिप्पणी से वसुंधरा राजे ने पार्टी में अपने विरोध के सुरों पर प्रहार करते हुए कुछ माह पूर्व मीडिया में कही गई अपनी बात को दोहराया है कि विधानसभा का अगला चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। प्रदेश भाजपा के प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने भी प्रदेश कोर कमेटी की बैठक के बाद प्रदेश में नेतृत्व बदलने के कयास को अफवाह बताया और वसुंधरा राजे के नेतृत्व में चुनाव लड़े जाने की बात कही थी। हालांकि इस बैठक में भाग लेने आये उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव ओम माथुर को नेतृत्व सौंपे जाने की सुगबुगाहट हुई थी। दिल्ली से जयपुर तक माथुर की सड़क यात्रा और पार्टी कार्यकर्ताओं के जोश भरे स्वागत सत्कार को शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा गया। गाहे बगाहे माथुर की राजस्थान यात्रा को अनायास ही मीडिया में प्रमुखता मिलती रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्त सहयोगी के रूप में प्रतिष्ठित ओम माथुर राजस्थान में भाजपा के संगठन मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष रहे है। अभी वे प्रदेश से राज्यसभा के भी सदस्य है। अपनी यात्रा में माथुर अपनी बाड़ी लेंग्वेज से नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को हवा दे जाते है। पिछले दिनों की यात्रा में माथुर ने मीडिया के समक्ष मुख्यमंत्री पद की अपनी दावेदारी को सिरे से खारिज कर दिया और इसे मीडिया की कल्पना बताया। लेकिन जयपुर के बाहर सीकर तथा अजमेर में इसी मुद्दे पर उनकी बॉडी लेंग्वेज अलग थी। सालासर बालाजी के दर्शन के लिए जाते समय सीकर में जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि अगला चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जायेगा तो माथुर का यही जवाब था कि अभी तो मुख्यमंत्री का ही नेतृत्व है। अगले चुनाव के नेतृत्व के बारे में पूछने पर भी उन्होने यही जवाब दोहराया लेकिन अपने को घुमक्कड़ बताकर पहले मध्य प्रदेश फिर गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश के दायित्व की याद दिलाकर पार्टी के लिए अपने सुखद पगफेरे की भी चर्चा कर दी। अजमेर में भावी मुख्यमंत्री के सवाल पर माथुर की रहस्यमयी मुस्कान अनुतरित रही।

भाजपा प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना द्वारा अगला विधानसभा चुनाव वसुंधरा राजे के नेतृत्व में लड़े जाने के कथन पर पार्टी के संसदीय बोर्ड के सर्वोपरि होने पर भी सवालिया निशान लगाये जाने लगे है। वही स्वयं वसुंधरा राजे भी पूर्व में अपने नेतृत्व में चुनाव लडऩे की बात कह चुकी है। बहरहाल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के प्रस्तावित राजस्थान दौरे के समय इसका खुलासा हो जाएगा। नौकरशाही पर लगाम नहीं होने, प्रतिपक्ष कांग्रेस नेतृत्व की सक्रियता तथा राज्य विधानसभा के बजट सत्र में अपनों के निषाने पर रही वसुंधरा सरकार के पुन: सत्ता में लौटने पर सवालिया निशान लगे है। अपनी वाकपटुता से विपक्ष पर दबाव बनाये रखने में सक्षम वसुंधरा राजे को भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपो की श्रृंखला ने परेशान किया हुआ है। कांग्रेस दल के उपनेता रमेश मीणा द्वारा जलदाय विभाग और अब उच्च शिक्षा मंत्री श्रीमती किरण माहेश्वरी पर सीधे आरोप लगाये जाने से सरकार कठघरे में है। इस बारे में विधानसभा में हुई चर्चा को आसन ने फ्रीज किया हुआ है। उधर रमेश मीणा द्वारा सदन के बाहर मीडिया के समक्ष की गई टिप्पणी पर विशेषाधिकार हनन का प्रकरण चर्चा में है। अप्रैल माह के आखिरी सप्ताह में विधानसभा की बैठक में इस मुद्दे पर हंगामा क्या गुल खिलाता है-यह देखना होगा।

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