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रक्तपिपासु लाल आतंकी

रक्तपिपासु लाल आतंकी

श्रद्धाँजलि देने का नैतिक दायित्व तो सबका है उन सीआरपीएफ के जवानों को जो सुकमा में नक्सलियों के हाथ शहीद हुए। इनकी संख्या 25 है। इसके पहले 2010 में 76 जवान दांतेवाड़ा में शहीद हुए थे। इस संबंध में मुँह खोलने में भी संकोच होता है। कब तक कर्म काण्ड चलता रहेगा। ये जवान अत्यंत साधारण परिवार से थे। ये पूंजीवाद के औजार नहीं थे न ही पूंजीपति थे। भारत में कम्युनिस्टों का एक वर्ग इसे बड़ी उपलब्धि मानता है। ये कायर नक्सली सब तरह , चरित्र, विचार और मूल्य, से कमजोर है। पर तब भी ये बने हुए है? राज्य को कर्मकांड से बाहर आकर मुस्तैदी से पुलिस, प्रशासन और खुफिया तंत्र को दुरुश्त करना होगा। अपराध की प्रकृति बदल गयी है पर पुलिस सुधार अब तक जमीन पर नहीं उतर पाया है। इसके साथ-साथ वनवासियों की सामाजिक आर्थिक प्रश्नो को यथार्थ के आयने में देखना होगा। राज्य उन्हें 1 रूपये /2 रूपये किलो चावल देकर कृपा पात्र नहीं समझे , उनके अधिकार के तहत उन्हें संसाधनों में हिस्सा मिलना चाहिए। कॉर्पोरेट लूट में राज्य की साझीदारी छिपी हुई नहीं है।

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इस अनहोली एलियंस को सिर्फ नक्सल विरोध की आड़ में पोषने वालो को भी सबक सिखाने की जरूरत है। जो क्षेत्र सबसे सम्पन्न है उसके मूल निवासी सबसे विपन्न हैं। उनकी प्रशंसा करने से उनका पेट नहीं भरता है , उन्हें ‘शोषकों’ और ‘लाल ब्रिगेड’ दोनों से मुक्ति चाहिए। उनके लिए कार्यक्रम तो मरहम पट्टी की तरह है , नीति उनके पक्ष में बनना चाहिए। उन बुद्धिजीवियों को भी नक्सली ही समझना चाहिए जो दांतेवाड़ा और सुकमा को शोषण के खिलाफ आवाज मान रहे हैं।

(लेखक भारत नीति प्रतिष्ठान के निदेशक है।)

राकेश सिन्हा

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