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दिल्ली मांगे वल्र्ड क्लास सिटी

दिल्ली मांगे वल्र्ड क्लास सिटी

अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को पिछले हफ्ते दिल्ली नगर निगम चुऩावों में बड़ा झटका लगा। बड़ी बात यह है कि पार्टी उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और कई बड़े नेताओं के इलाके में भी हार गई। आप के कई उम्मीदवार तो अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। राष्ट्रीय राजधानी में किस्मत आजमाने वाली दूसरी छोटी पार्टियों नीतीश कुमार की जदयू, मायावती की बसपा, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की राकांपा सभी को अपमानजनक हार का मुंह देखना पड़ा। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अपनी सही जगह तीसरे स्थान पर पहुंच गई। सो, प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। अलबत्ता, इस बार कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ गया, लेकिन उसकी सीटों की संख्या 77 से 30 पर पहुँच गई जबकि भाजपा की सीटें 138 से बढ़कर 181 हो गईं।

एक वक्त वह भी था कि कांग्रेस का नारा हुआ करता था कि ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ लेकिन अब कांग्रेस के लिए वक्त बदल चुका है। प्रमुख विपक्षी दल राहुल गांधी के नेतृत्व में लगातार गर्त में जा रहा है। उसके नेता छोड़कर जा रहे हैं। लिहाजा, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों स्तरों पर उसके नेताओं में भारी कलह दिख रही है। कांग्रेस का प्रथम परिवार पार्टी को संभाल पाने में नाकाम साबित हो रहा है। अब समय आ गया है कि कांग्रेस को खानदानी राजनीति को छोड़कर नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के नेताओं को आगे बढ़ाकर पार्टी में नई जान डालने की कोशिश करनी चाहिए। देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदृष्टि संपन्न सक्षम नेतृत्व पर नजर रखने और सही दिशा की ओर ले जाने के लिए एक मजबूत विपक्ष की बेशक दरकार है। लेकिन अफसोस, राहुल गांधी तो कई बार मोदी के सामने बिना गंभीर राजनैतिक समझ वाले जोकर की तरह लगते हैं। उत्तर प्रदेश में भारी हार के बावजूद लगता है, कांग्रेस ने कोई सबक नहीं सीखा और इसलिए वह कोई राजनैतिक दिशा नहीं खोज पाई। ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं, जब नरेंद्र मोदी का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा भारतीय राजनीति की सच्चाई बन जाएगा। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जहां भी चुनाव हो रहे हैं, कांग्रेस लगातार जमीन खोती जा रही है। उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है। सबसे अहम यह है कि कांग्रेस अपने सामाजिक समीकरणों को पहचानने और कायम रखने में नाकाम रही है। मोदी ने भाजपा की रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन करके उन्हीं सामाजिक समीकरणों को सफलतापूर्वक साध लिया है, जो कभी कांग्रेस का आधार वर्षों से हुआ करता था। आखिर कांग्रेस ने जब क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रही तो बीजद, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, राजद, जदयू और आप जैसे क्षेत्रीय दल उभर आए और विभिन्न राज्यों में स्थानीय लोगों का दिल जीतने लगे। लेकिन अब मोदी और अमित शाह ने अपनी ठोस राजनैतिक रणनीति से भाजपा को कांग्रेस की जगह सफलतापूर्वक दिला दी है। उसके बाद भाजपा ओडिशा में बीजद, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और द्रमुक, पश्चिम बंगाल में तृणमूल और दिल्ली में आप को विस्थापित करती जा रही है। मोदी का राजनैतिक नजरिया, लोकप्रियता, और देश के प्रति प्रतिबद्धता के साथ सुशासन दूसरे राजनैतिक दलों की जमीन खिसकाता जा रहा है। मोदी की लोकप्रियता सभी राजनैतिक दलों के लिए बड़ा सिरदर्द बन गई है। कई कोशिशों के बावजूद बिखरे तीसरे मोर्चे के नेता एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ कोई रणनीति नहीं बना सके हैं।

दिल्ली नगर निगम में हालांकि भाजपा पिछले दस साल से काबिज है और वह मोदी शैली के विकास खासकर स्वच्छ भारत मिशन को पूरा करने में बुरी तरह नाकाम रही है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने खुद दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर से स्वच्छ भारत मिशन की बड़े धूमधड़ाके से शुरुआत की थी और दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने का ऐलान किया था। दिल्ली भाजपा के नेताओं और दिल्ली के लोगों के लिए संदेश एकदम स्पष्ट था लेकिन सच्चाई यही है कि दिल्ली नगर निगम में मोदी के सपने को साकार करने के लिए कुछ नहीं किया गया। हालत यह है कि दिल्ली को एक साफ-सुथरा शहर भी नहीं कहा जा सकता। आज देश में नागपुर, भुवनेश्वर, गांधीनगर, सूरत जैसे कई शहर हैं जो दिल्ली से साफ, हरेभरे और सुरक्षित हैं। दिल्ली में सड़कों पर चेन छिनना, कार चोरी, एसयूवी से भयानक सड़क दुर्घटनाएं, कार और बसों से स्कूली बच्चों को रौंदने और बुजुर्गों की हत्या की वारदातें आम हो गई हैं। पिछले हफ्ते मेरे एक मित्र के 25 साल के बेटे से अपराधियों ने बंदूक की नोंक पर उसके गहने उतारवा लिए। वाकई दिल्ली बेहद असुरक्षित हो गई है और कानून-व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने की दरकार है। अब दिल्लीवासियों ने नरेंद्र मारेदी के नाम पर भाजपा में फिर भरोसा जताया है। इसलिए अब दिल्ली में कोई बहाना नहीं चलेगा। आखिर दिल्ली क्यों नहीं विश्वस्तरीय शहर बन सकती। अगर राजधानी को विदेश अतिथियों और ‘मेक इन इंडिया’ के निवेशकों के बीच विश्वस्तरीय शहर की तरह दिखाया जा सका तो मोदी को एक और श्रेय मिल जाएगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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