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भारतीय वैभव का चित्रण

भारतीय वैभव का चित्रण

जब से बाहुबली रिलीज हुई है तभी से मीडिया और सोशल मीडिया में  यह फिल्म चर्चा का विषय बनी हुई है। अभी तक की रिर्पोटों के अनुसार इस फिल्म ने पूरे विश्व भर में  एक हजार करोड़ से भी अधिक का व्यापार कर लिया है जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। यदि इस फिल्म की पूरी कमाई पर ध्यान आकर्षित करें तो फिल्म की आमदनी भारत की पांच प्रमुख फिल्मों की कुल कमाई से भी ऊपर होगी। एस एस राजमौली के निर्देशन में बनी यह फिल्म  ‘हॉलीवुड’को खुलेआाम चुनौती देती है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार  ‘बाहुबली-2’ अमेरीका के इतिहास में सबसे अधिक देखे जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी विदेशी फिल्म भी बनी है।

पिछले कुछ  दिनों में ‘बाहुबली-2’ पर इतना लिखा गया है कि हर वह राष्ट्रवादी, जो इसको नहीं देख पाया है या जो फिल्म नहीं देखता है उसको एक अजीब तरह की हीनता का सामना करना पड़ रहा है। लोगों का मानना है कि यह फिल्म भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व के अभिमान की बात करती है। इसने  भारतीय जनमानस की जाग्रत चेतना की अभिव्यक्ति की एक अभूतपूर्व घटना है। ‘बाहुबली-2’  ने भारतीय जनमानस की सुप्त चेतना को जाग्रत किया है। दर्शकों और भारतीयों के अंदर अपनी संस्कृति और धर्म को लेकर पल्लवित हो रही हीनता का  निदान किया है। इस फिल्म  को देखने के बाद यह समझ में आता है कि बाहुबली भारतीय फिल्मों के इतिहास की अनूठी घटना है। इस फिल्म  में वह सब है, जो भारतीय सिनेमा में अभी तक नहीं दिख रहा था। यह फिल्म  तमाम आधुनिक तकनीकी के साथ एक बड़े कैनवस पर, हमको अतीत और फेंटसी के कोहरे में छिपे अपने सांस्कृतिक इतिहास से मिलाती हैं। ‘बाहुबली-2’ ने सामूहिक चेतना को यथार्थ के पंख देने  का काम किया  है।  लोगों  को दक्षिण भारतीय फिल्मकारों का ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने, अपनी तमाम विभिन्नताएं होने  के बावजूद भारतीय संस्कृति और धर्म को फिल्मों में जीवित रखा है।

कुछ वर्ष पहले राजू हिरानी के निर्देशन में ‘पीके’फिल्म बनी, जिसमें आमिर खान ने अभिनय किया था। इस फिल्म में  सुनियोजित तरीके से हिंदुत्व की आलोचना की गई थी। इस फिल्म का उद्श्य हिंदुत्व को गलत प्रकार से सिनेमा के माध्यम से लोगों के समक्ष लाना ही केवल एक मात्रा उद्देश्य था और वह हुआ भी।  यह फिल्म भी खूब चली क्योंकि लोगों का एक मात्र उद्देश्य इस फिल्म में हिन्दुत्व के साथ हुए दुव्र्यवहार को देखना था। हालाकि काफि लोगों ने इस फिल्म के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की लेकिन इसे बैन करने के लिए उतना प्रदर्शन नहीं हुआ जो होना चाहिए था।

एस एस राजमौली के निर्देशन में बनी  बाहुबली-1 और 2 ने जिस प्रकार से आमीर खान की इस फिल्म का मुंहतोड़ जबाब दिया वह अविश्वसनीय है। राजमौली ने इस फिल्म के माध्यम से पुरे विश्व को बता दिया है कि असल हिंदुत्व का प्रचार-प्रसार बाहुबली जैसी  फिल्मे करती है न कि ‘पीके’। बाहुबली की इतनी बड़ी सफलता के पीछे कहीं ना कहीं हिंदुत्व की विचारधारा की अवहेलना करने के लिए बनाई गई फिल्में भी हैं।

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इस फिल्म के बारे में उदय इंडिया ने कुछ दर्शकों से बातचीत की। दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाले प्रशांत दीक्षित जो पेशे से बैंकर है उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में कहा –‘‘मुझे लगता है कि बाहुबली ने भारतीय जनमानस की सुप्त चेतना को जाग्रत किया है। दशकों से भारतीयों के अंदर अपनी संस्कृति और धर्म को लेकर पल्लवित हो रही हीनता को एक मरहम दिया है और निदान किया है। वैसे तो मैं फिल्मों का न सिर्फ शौकीन हूं बल्कि उसकी अच्छी समझ भी रखता हूँ लेकिन 80 के दशक से मेरा भारतीय फिल्मों और उसमें से खास तौर से मुंबई की मसाला हिंदी फिल्मों से पूरी तरह मोह भंग हो चुका था इसलिए जब बाहुबली का प्रथम भाग आया था, तब तमाम तारीफों के बाद भी मैंने उसे नही देखा था। फिर करीब एक वर्ष पहले जब उसको टीवी पर पहली बार देखा तो पहली बार कोफ्त हुई कि क्यों नहीं मैने इस फिल्म को हाल के पर्दे पर देखा! इस फिल्म को देख कर यह समझ में आ गया की बाहुबली भारतीय फिल्मों के इतिहास की अनूठी घटना है। इस फिल्म में वह सब था, जो भारतीय सिनेमा में अभी तक नहीं दिख रहा था। इन फिल्मकारों को अति समझ कर कोई भी हिंदी फिल्मों का प्रगतिशील और बाजारू आलोचक या फिर कोई भी बुद्धजीवी, एक सिनेमा के तौर पर, बाहुबली की निर्मम आलोचना के लिए स्वतंत्र है। लेकिन आलोचना करते वक्त वह यही नहीं समझ पाता है कि बाहुबली न ‘टेन कमंडमेन्ट’ है न ‘बेन हूर’ है न ‘ग्लैडिएटर’ है और न ही वह मुंबइया हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की तरह पाश्चात्य विषयों का भारतीयकरण है। दरअसल बाहुबली, हमारे वातावरण से इन्हीं आलोचकों और इनको पोषित करने वाले वर्ग द्वारा विलुप्त की गई मूल भारतीय संस्कृति और धर्म की पुर्नखोज है।’’

दिल्ली से सटे नोएडा के पंकज भाटी (छात्र) ने भी इस फिल्म पर अपने  विचार  प्रकट करते हुए कहा- ‘‘बाहुबली के विजयघोष के बीच मैंने बाहुबली- 2 भी देख डाली है और इस बार फिल्म के साथ मैं हॉउसफुल थिएटर में बैठे दर्शकों को भी देख रहा था। बहुत वर्षो बाद मैंने लोगो को अपने छोटे बच्चों के साथ फिल्म हाल में आते हुए देखा। सबसे विचित्र अनुभव यह रहा कि इस पूरी फिल्म के अंतराल के बीच मुझे बच्चों के रोने और उससे परेशान मां-बाप को थिएटर से अंदर बाहर जाते हुए नहीं दिखे। मैंने, वाल्ट डिज्नी के कार्टून और हॉलीवुड की एनिमेशन फिल्मों की चकाचौंध से बंधे वर्ग को अमर चित्र कथा से सम्मोहित हुए देखा। संस्कृत और शिव के नाद में लोगो को आल्हादित होते देखा। भव्यता के आवरण से शिल्पित, भारतीय चरित्रों के माध्यम से प्रदर्शित भारतीय संस्कृति और धर्म की अत्यंतता पर तटस्थों को विस्मृत देखा।’’

यही नहीं, महिलाओं में भी इस फिल्म के प्रति एक अलग उत्साह दिखा। लक्ष्मीनगर की सुष्मिता त्रिपाठी (गृहिणी) ने भी इस फिल्म को देखने के बाद अपनी राय प्रकट की। उन्होंने कहा -‘‘यह फिल्म आधुनिकता  के साथ हमें अतीत कोहरे में छिपी अपनी सांस्कृतिक इतिहास से मिला रही थी। बाहुबली-1 ने हमारी सामूहिक चेतना को यथार्थ के पंख दे दिए हैं। जब मैंने बाहुबली के अंतिम दृश्य को देख कर अपना टीवी बन्द किया था तब मेरे लिए, ‘कट्टप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?’ कोई प्रश्न नही था, मेरे लिए यह प्रश्न ज्यादा बड़ा था कि ‘मुंबई फिल्म इंडस्ट्री ने मेरी संस्कृति और मेरे धर्म को क्यों मारा?’ लेकिन बाहुबली-2 देखने के बाद मेरा यह मानना है कि  हम लोगों को दक्षिण भारतीय फिल्मकारों का ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने अपनी तमाम अतिरेकता के बावजूद भारतीय संस्कृति और धर्म को फिल्मों में जीवित रखा है।’’

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मुंबई नगरी की  फिल्मों में मुस्लिम  सभ्यता को महान दिखाना और मुस्लिम पात्र को वीरत्व भरा ही दिखाना पड़ता था क्योंकि बॉलीवुड मुस्लिम साम्राज्य पर ही खड़ा था। परन्तु अब उनके पाप का घड़ा भर चुका है क्योंकि अब उनके सामने बाहुबली खड़ा है। इस पुण्यभूमि की  गौरव की गाथा को वही भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया जो उस समय होगा। इसे काल्पनिक मानकर नहीं, अपितु इस पुण्यभूमि भारत का गौरव और वैभव को सजीव मान,  बाहुबली फिल्म में अपने पुरखों का स्वाभिमान एवं  मान को गर्वित किया है।

                                 (उदय इंडिया ब्यूरो)top online advertising agenciesкак взломать яндекс

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