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आतंकवाद से लडऩे के नाम पर अब मुस्लिम ‘नाटो’

आतंकवाद से लडऩे के नाम पर अब मुस्लिम ‘नाटो’

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के क्षितिज पर पहली बार धर्म पर आधारित सैनिक गठबंधन उभरा है जिसे मुस्लिम नाटो या इस्लामिक नाटो भी कहा जा रहा है। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे सभ्यताओं के संघर्ष का एक रूप मानते हैं तो कुछ इस यह कह कर नकार देते हैं कि इससे सभ्यताओं का संघर्ष नहीं  इस्लाम का आतंरिक संघर्ष यानी शिया-सुन्नी वॉर तेज होगा। हालांकि इसमें कई शिया देश भी हैं मगर ज्यादातर देश सुन्नी होने के कारण सुन्नी वर्चस्व कायम करने की कोशिश है।

दूसरे महायुद्ध के बाद दुनिया में नाटो और वारसा पैक्ट  जैसे सैनिक गठबंघन बने। नाटो बना था तो सोवियत विस्तारवाद से यूरोप की रक्षा करने के लिए तो वारसा पैक्ट अमेरिका और नाटो के खिलाफ सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों का सैनिक गठबंधन था। मगर कोई सैनिक गठबंधन धर्म पर आधारित नहीं था। पहली बार धर्म के आधार पर सैनिक गठबंधन बना है – इस्लामिक मिलिट्री एलाएंस टू फाइट टेररिज्म (आईएमएएफटी)। खुद मिंया मुसीबत, औरों को दे नसीहत – कुछ ऐसा ही हुआ आतंकवाद के खिलाफ बने मुस्लिम देशों के संगठन – इस्लामिक मिलिट्री एलाएंस टू फाइट टेररिज्म (आईएमएएफटी) के बारे में। यह सैनिक गठबंधन नाटो की तर्ज पर बनाया गया है। 2015 में सऊदी अरब ने ऐलान किया था कि दुनिया के 41 इस्लामिक देश एक इस्लामिक मिलिट्री तैयार करेंगे। इस सैन्य गठबंधन का मकसद इन देशों के बीच सुरक्षा मामलों पर सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण, हथियारों का लेन-देन करना है।

इसका मकसद नाटो जैसा है। मान लीजिए किसी एक देश पर आतंकी हमला होता है तो उस संगठन को खत्म करने के लिए सभी देशों के संसाधन इस्तेमाल होंगे। इसमें आवश्यक सैनिक सहयोग दिया जाएगा। ये तय होगा कि दहशतगर्दी के खिलाफ उलेमाओं का इस्तेमाल कैसे किया जाए। हालांकि, कहा यही जा रहा है कि इस गठजोड़ का मकसद आईएसआईएस के खिलाफ लड़ाई छेडऩा है। इस तरह,  कहने के लिए आतंकवाद के खिलाफ, लेकिन एक किस्म का सैनिक संगठन है।

इस गठबंधन का  असली चेहरा अब सामने आया है। उसे देखने के बाद करेला और नीम चढ़ा कहावत बरबस याद आती है। 2016 में राहिल शरीफ पाकिस्तानी सेना के जनरल पद से रिटायर हो गए । अब वे इस्लामिक सैनिक गठबंधन की कमान संभालेंगे। उनकी पोस्टिंग सऊदी अरब में होगी। हैं न मजेदार बात, आतंकवाद से लडऩे के लिए यह सैनिक संगठन सऊदी अरब ने तैयार किया है जो खुद दुनिया में आतंकवाद की गंगोत्री माना जाता है। जबसे सऊदी अरब के रेगिस्तान में पैट्रोडॉलरों की बाढ आई है, वह दुनियाभर में इस्लाम के सबसे असहिष्णु संस्करण वहाबियत के प्रचार के लिए बेतहाशा पैसा फूंक रहा है। और उस पैसे से दुनियाभर में आतंकवादी संगठन पैदा हो गए है। यहां हम आपको याद दिला दें कि अल कायदा, आईएस, तालिबान, बोको हराम, अल शबाब, लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद, हिजबूल मुजाहीदीन आदि सभी बड़े आतंकी संगठन वहाबी है। कहीं न कहीं इनका कनेक्शन सऊदी पैसे के साथ है। इसके अलावा पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख को कमान सौंपी गई है। आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान सबसे ज्यादा अविश्वसनीय है। वह आतंकवाद का अजायबघर है जहां हर तरह का आतंकवाद मौजूद है। आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान सबसे ज्यादा अविश्वसनीय है। वह आतंकवाद का अजायबघर है जहां हर तरह का आतंकवाद मौजूद है। अंतर्राष्टीय पर्यवेक्षक यह मानते हैं कि आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान बहुरूपी की भूमिका निभा रहा है। एक तरफ वह आतंक के खिलाफ जंग लडऩे के लिए अमेरिका नेतृत्व में चल रहे चल रहे अभियान का हिस्सा होता है। इसके नामपर अरबों की सैनिक सहायता डकार जाता है। दूसरी तरफ अंर्तरराष्ट्रीय आतंकवाद के महानायक ओसामा बिन लादेन को अपने देश में गुप्तरूप से पनाह देकर आतंक के खिलाफ लड़ाई से गद्दारी भी करता है। कुछ लोग तो पाकिस्तान को आतंकवाद की उद्गम स्थली कहते है।  जहां से अफगानिस्तान और भारत में आतंकवाद का निर्यात हुआ। दूसरी तरफ कुछ लोग यह मानते है कि पाकिस्तान तो आतंकवाद का शिकार बन रहा है। अपनी इस दोहरी भूमिका के कारण पाकिस्तान अपनी विश्वसनीयता खो बैठा है। बढ़ते आतंकवाद के कारण उसकी उसकी गिनती नाकाम देशों में होती है। आतंकवाद पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। ऐसा देश आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का कैसे नेतृत्व कर पाएगा।

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आतंकी संगठन अलकायदा का सरगना अयमान अल-जवाहिरी पाकिस्तान में है और वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के संरक्षण में संभवत: कराची में रह रहा है। इस खूंखार आतंकी की मौत से पहले ‘आखिरी इच्छा’ अमेरिका को आतंकी हमले से दहलाने की है। न्यूजवीक ने अपनी एक रिपोर्ट में अलग-अलग कई सूत्रों के हवाले से ये दावा किया है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के एक पूर्व शीर्ष अधिकारी ने न्यूजवीक को बताया कि ओसामा बिन लादेन का बेटा हमजा बिन लादेन भी पाकिस्तान में है और उसे भी आईएसआई ने संरक्षण दे रखा है। न्यूजवीक ने जिन सूत्रों के हवाले से ये दावा किया है उसे बहुत ही विश्वसनीय बताया है। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी अल-जवाहिरी की अमेरिकी बलों से तभी से रक्षा कर रही है जबसे उसने 2001 में अफगानिस्तान में अल-कायदा का सफाया किया था।

अमेरिका को भी शायद अल जवाहिरी के पाकिस्तान में होने और यहां तक कि उसके ठिकाने के बारे में भी पता है क्योंकि पिछले साल जनवरी में बराक ओबामा प्रशासन ने जवाहिरी को टारगेट कर ड्रोन हमला किया था लेकिन वह बाल-बाल बच गया था। एक ‘सीनियर’चरमपंथी ने न्यूजवीक को बताया, ‘जिस कमरे में जवाहिरी ठहरा था उस कमरे के ठीक बगल वाले कमरे पर ड्रोन हमला हुआ था। इससे दोनों कमरों की साझा दीवार ध्वस्त हो गई थी और विस्फोट की वजह से कुछ मलबा भी जवाहिरी पर गिरा था। इससे उसका चश्मा टूट गया था लेकिन वह बच गया।’

अफगान तालिबान के एक नेता ने न्यूजवीक को बताया कि अल जवाहिरी पर 2001 से ही कई ड्रोन हमले हो चुके हैं लेकिन हर हमले में वह बच गया। उसने आगे बताया कि अल कायदा सरगना अपने समूह के नियंत्रण वाले इलाकों में ही लोकप्रिय नहीं रहा क्योंकि वह अफगानिस्तान सरकार के साथ शांति समझौते की कोशिश में था और वह खुद को ‘विश्व शांति के लिए खतरे’के तौर पर नहीं देखना चाहता। यही वजह है कि आईएसआई अल जवाहिरी को कराची लेकर चली गई। ऐसा आतंवादियों को पनाह देनेवाला पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ क्या लड़ेगा।

सऊदी अरब ने जब यह एलाइंस बनाने कि घोषणा की थी तब पाकिस्तान का नाम बिना मंजूरी के इसमें शामिल कर लिया गया था। लेकिन, मध्यपूर्वी देशों की राजनीतिक रस्साकशी में शामिल होने को लेकर पहले पाकिस्तान पसोपेश में था। पाकिस्तान इसमें शामिल होगा या नहीं, इसे लेकर शुरुआत में चीजें साफ नहीं थीं। फिर बाद में नवाज शरीफ सरकार ने पाकिस्तान की भागीदारी को लेकर अपनी रजामंदी दे दी। लेकिन ये तय नहीं था कि पाकिस्तान सेना के रिटायर्ड जनरल को इस सैन्य संगठन में इतना बड़े ओहदे से नवाजा जाएगा। जाहिर है कि सऊदी अरब के साथ पाकिस्तानी की बड़ी नजदीकी बनने जा रही है। जो भारत की विदेश नीति के लिए झटका माना जा रहा है। भारत ने कूटनीति से मुसलमान देशों के अंदर एक ऐसा महौल बनाया है कि कुछ दिन पहले तक ये मुस्लिम देश भी भारत के साथ थे। इसलिए पाकिस्तान इस अलायंस में शामिल होना चाहता था।

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असल में  ‘मुस्लिम नाटो’ ‘सुन्नी नाटो’ज्यादा लगता है। यही वजह है कि  पाकिस्तान में अंदरखाने यह एक विवाद का मुद्दा बन चुका है। पाकिस्तानी की शिया आबादी इस गठबंधन में सामिल होने का विरोध कर रही है। शिया पाकिस्तान की आबादी में 20 प्रतिशत हैं। इस संगठन की कुछ बातें  बड़ी ही हैरान करने वाली हैं। सबसे पहली यह कि ये संगठन आतंकवाद से लडऩे की बात करता है लेकिन आतंकवाद से सबसे बुरी तरह प्रभावित दो देश इराक और सीरिया को इसमें शामिल नहीं किया गया, तो किस तरह से ये आतंकवाद से लडऩे की बात कर रहा है? ईरान को भी इस संगठन में शामिल नहीं किया गया है, इस वजह से यह एक सुन्नी देशों का संगठन नजर आता है जिसका असली मकसद मुस्लिम देशों को शिया बनाम सुन्नी में बांटना है।

भारत में जनरल राहिल शरीफ की नियुक्ति पर अचरज प्रगट किया जा रहा है। वे पाकिस्तान के प्रतिष्ठित जनरलों में से एक हैं लेकिन भारत के  मामले में वे पाकिस्तान की चुनिंदा आतंकी संगठनों के जरिये छद्म युद्ध की नीति पर चलते रहे। ऐसे में उनसे आतंकवाद से लडऩे के मामले में भरोसा कैसे किया जा सकता है। इस गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसका सारा खर्चा केवल सऊदी अरब उठा रहा है। इसलिए उसमें सऊदी अरब की ही चलेगी बाकी देश नाममात्र के सदस्य होंगे। भारत के लिहाज से यह घटना इस मामले में अशुभ है कि पाकिस्तान का सऊदी अरब के मुख्यालय में प्रवेश भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद के मुद्दों में पाकिस्तान के प्रति सुन्नी मुस्लिम देशों का समर्थन बढऩे का कारण बन सकता है। कुल मिलाकर आतंकवाद से लडऩे के नाम पर इस्लामी देशों का सैनिक संगठन बनाने की कोशिश है। ऐसे में नाटो की तर्ज पर इस्लामी सैनिक गठबंधन बनाने की कोशिश सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश है जो चोर से कहो चोरी करो हवलदार से कहो जागते रहो कहावत की मिसाल है। एक तरफ सऊदी अरब और पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों की मदद करके दुनिया भर में आतंकवाद फैला रहे हैं। दूसरी तरफ उनसे लडऩे की आड़ में मुस्लिम नाटो जैसा सैनिक गठबंधन बना रहे हैं। पाकिस्तान के पड़ोसी और सऊदी अरब के सबसे बड़े प्रतिद्द्धी ईरान ने इस गठबंधन पर कड़ी प्रतिक्रिया प्रगट की है और कहा कि इससे इस्लामिक देशों की एकता प्रभावित होगी। मुस्लिम देशों को शांति का गठबंधन बनाना चाहिए न कि सैनिक गठबंधन।

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