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‘मैं नौकरी मांगने वाला नहीं देने वाला बनूंगा’

‘मैं नौकरी मांगने वाला नहीं देने वाला बनूंगा’

नाम- नरप्पा टी

उम्र- 23  साल

काम- बेंगलुरू में टैक्सी ड्राइवर

नरप्पा जिन्हे उनके दोस्त नरेश के नाम से बुलाते हैं, से मेरी मुलाकात अक्समात ही पिछले हफ्ते हुई। मैं बेंगलुरू शहर से एयरपोर्ट जा रहा था। रास्ता लम्बा था। सिर्फ समय काटने के लिए शुरू हुआ बातों का सिलसिला जाने कब दिल के एक कोने को छू गया पता ही नहीं चला। आईटीआई से इलेक्ट्रीशियन का डिप्लोमा कर चुके नरप्पा  साल भर पहले तक एक कंपनी में गाड़ी चलाते थे। यहां उन्होंने देखा कि ड्राईवरों में बेरोजगारी बहुत है। सो ठान लिया कि अब नौकरी मांगूगा नहीं बल्कि नौकरी दूंगा। ये संयोग नहीं कि नरप्पा प्रधानमंत्री मोदी के प्रशंसक हैं।

नरप्पा एक गरीब घर से हैं मगर उनके सपने अनन्त हैं और इरादे फौलादी। महज एक साल पहले ही  उन्होंने अपनी पहली टैक्सी खरीदी और अब तीसरी खरीदने की तैयारी में हैं। आज ये सभी कारें अब ‘एप’ से चलने वाली टैक्सी सेवा ऊबर और ओला में चलती हैं। कुछ ही महीने पहले तीस हजार महीने की तनख्वाह पाने वाले नरप्पा आज तीन ड्राईवरों को तनख्वाह देते हैं। मगर वे आज अपने को ड्राईवर कहलाना ही पसंद करते हैं।

बेंगलुरू में ड्राईवरों की बेरोजगारी से आहत और व्यथित हुए नरप्पा ने पहली कार के लिए बैंक को देने वाली राशि अपने कई दोस्तों से मांग कर जुटाई थी। उनकी आंखों में उस समय अब एक अजीब सी चमक आती है जब वो कहते हैं कि ‘आज उनकी टैक्सियों के सहारे तीन परिवार पलते हैं’ 15 हजार मासिक पाने वाले उनके ड्राईवरों के हाथ में वे सिर्फ 3000 रूपये ही देते हैं और बाकी पैसा ड्राईवरों के घरवालों को उनके गांव में पहुंचाते हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने देखा है कि किस तरह पैसा मिलने पर ड्राईवर या तो नशे में या फिर जुए और आईपीएल पर सट्टे में अपना पैसा लुटा देते हैं। किसी भी ड्राईवर को काम पर रखने से पहले यह उनकी शर्त होती है कि तीन टाइम खाने के पैसे और तीन हजार ही वे उसके हाथ में देंगे। यह भी बात देखने की है कि आज तक कोई ड्राईवर उन्हें छोडक़र नहीं गया।

नरप्पा की जो बात मुझे छू गई वो भी अपनी टैक्सियों के जरिये कई घरों की रोटी चलाने की उनकी अदम्य चाह। मैंने जब भी कहा कि तुमने नौकरी छोडक़र ये काम क्यों शुरू किया तो टूटी-फूटी हिंदी में वे कई बार कहते रहे, ‘सर, कितना फैमिली इससे चलता है, आप देखिए न।’

23  साल में एक नौजवान के मुंह से ये बातें मुझे अमृत सरीखी लग रहीं थीं। ये इक्तेफाक ही है कि उसी रोज सुबह मैंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘एप’अपने मोबाइल पर पढक़र उसकी शपथ #IAmNewIndia अपनी फेसबुक पेज पर पोस्ट की थी।  ‘मोदी एप’ की शपथ के एक बिन्दुओं में से एक बिन्दु है कि ‘मैं नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनूंगा।’ मैं नरप्पा से पूछ नहीं पाया कि ये उन्होंने पढ़ा है कि नहीं मगर ये पक्का है कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की इस बात को मजबूती से पकड़ जरूर  लिया है।

कोई दो महीने पहले केरल में कोच्चि से गुरूवायुर जाते हुए केरल के 27 वर्षीय टैक्सी चालक जाकिर की आंखों में भी मुझे ऐसी ही उमंग और चमक दिखाई थी। जाकिर ने नोटबंदी पर बात करते हुए मुझसे कहा था, ‘अब मैं भी अपना मकान खरीद पांऊगा क्योंकि नोटबंदी के बाद मकान सस्ते हो जाएंगे।’ दिलचस्प बात है कि नरप्पा ने भी कहा कि नोटबंदी से गरीबों को बहुत फायदा होगा और प्रधानमन्त्री ने ये सही कदम उठाया है। यहां ये बता देना उचित होगा कि जाकिर भाजपा के कड़े विरोधी हैं। नरप्पा भी कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री जनता दल के कुमारस्वामी के समर्थक हैं।

नोटबंदी पर मैं पहले ही बहुत कह चुका हूं मगर नरप्पा से मिलने के बाद चित्त को अपूर्व सी शांति  मिली और मन में उत्साह का संचार हुआ। टीवी पर चलने वाली नकारात्मक बहसों, नेताओं और पार्टियों की हर वक्त चलने वाली चिक-चिक और मीडिया में व्याप्त निराशा के सुरों के बीच मुझे लगा कि देश का युवा कुछ और ही सोच रहा है। वह सिर्फ सोच ही नहीं रहा, आगे निकल पड़ा है। मानो वह कह रहा है, ‘‘#IAmNewIndia यानि मैं नया भारत हूं। मैं पुराने तरीकों और सोच से बंधा हुआ नहीं हूं। मैं नई उमंग के साथ  एक नये भारत की इबारत लिख रहा हूं। क्या तुम मेरे साथ चलोगे?’’

उमेश उपाध्याय

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