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सरकार आदिवासी कल्याण के लिए प्रतिबद्ध

सरकार आदिवासी कल्याण के लिए प्रतिबद्ध

‘’हमने आदिवासियों के लिए ‘फोरेस्ट एक्ट’ को इन तीन वर्षो में सफलतापूर्वक लागू किया जिससे 17 लाख से ज्यादा लोगों को जंगल की भूमि का पट्टा मिला है। जो अपने आप में एक बहुत बड़ी सफलता है। यही कारण है कि आज इन क्षेत्रों में स्कूल, सडक़ और पानी की अच्छी सुविधा उपलब्ध है,’’ यह कहना है केन्द्रीय आदिवासी एवं जनजातिय कार्यों के मंत्री जुएल ओराम का उदय इंडिया से खास बातचीत में। मुख्य अंश:

 

आप अटल जी के सरकार में भी आदिवासी एवं जनजाति मंत्री रहे हैं और अब नरेन्द्र मोदी के साथ भी इसी मंत्रालय में काम कर रहे हैं। वर्तमान में आदिवासियों के प्रति सरकार के कामों को बताना चाहेंगे?

जहां तक आदिवासियों के लिए तीन साल में सरकार के काम की बात है तो हमने आदिवासी एवं जनजाति के लोगों के लिए ‘फोरेस्ट एक्ट’ को इन वर्षो में सफलतापूर्वक लागू किया जिससे 17 लाख से ज्यादा लोगों को ‘वन भूमि’ का पट्टा मिला है। 55 लाख हेक्टेयर भूमि उनको आवंटित की गई है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी सफलता है। यही कारण है कि आज इन क्षेत्रों में स्कूल, सडक़ और पानी की अच्छी सुविधा उपलब्ध है।

ऐसा माना जाता है कि इस एक्ट के  माध्यम से औद्योगिकीकरण के नाम पर आदिवासियों के साथ दुव्र्यवहार होता है।

यह बिल्कुल ही गलत है। यह पट्टा बिल्कुल प्रमाण के साथ मिला है। इस जमीन पर आदिवासियों का ही अधिकार है। जहां तक वितरण का प्रश्र है तो यह उन्हीं लोगों को मिला है जो इन क्षेत्रों में 75 वर्ष से अधिक समय से रह रहे हैं। इसके साथ ही हमारी सरकार ने 24 वस्तुओं को इन क्षेत्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंदर रखा है जिससे विचौलियों की दुकानें बंद हो चुकी हैं। इसके साथ ही हमने किसानों को फसल के बारे में जानकारी देने के लिए एक वेब पोर्टल भी लांच किया है जिससे उन्हें उनकी फसल और लागत मूल्य के बारे में जानकारी मिल सके। यह वेब पोर्टल किसान कॉल सेंटर के साथ जुड़ा है।

इन क्षेत्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य किस प्रकार से काम कर रहा है?

मै आपको बताना चाहूंगा कि जो आदिवासी पहले महुआ और साल दे कर नमक खरीदते थे वो आज इसे 10 से 25 रुपये तक में खरीद रहे हैं। यही नहीं, पहले ईमली, लाख और गम को जो व्यापारी कम दाम में इन आदिवासियों से खरीदते थे वो आज इस एमएसपी लागू होने के कारण सरकार के मानक के अनुसार ही लेते हैं जो अपने आप में एक बड़ा बदलाव है।

सरकार की कई योजनाओं में निजी क्षेत्र पर जोर बताया जाता है। आदिवासियों के मामले में निजी क्षेत्र की भूमिका पर आपके क्या विचार हैं?

बिल्कुल नहीं, आदिवासियों से जुड़ी योजनाओं में प्राइवेट प्लेयर का हाथ बहुत ही न्यूनतम होता है। प्राइवेट प्लेयर में भी कुछ बड़ी कंपनिया ही होती हैं। वैसे  अस्सी प्रतिशत से ज्यादा काम राज्य सरकार के द्वारा किया जाता है। इन कामों में एनजीओ भी सहायता करते हैं।

आपने कहा है कि आप आदिवासी भाषाओं को बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं। अभी तक इस काम में कितनी प्रगति हुई है?

आदिवासी भाषाओं को हम मान्यता तो नहीं प्रदान कर सकते लेकिन इन भाषाओं के विकास पर अवश्य ही जोर देते हंै। हमने विभिन्न आदिवासी जातियों  को मिलाकर कई सारे आयोजन करवाए हैं जिससे ये लोग अपनी-अपनी पहचान को एक दूसरे में बाट सकें।

आपने दिल्ली सहित अन्य शहरों में ट्राइब्स शॉप्स खोली है। इसका कैसा प्रभाव है?

इसका प्रभाव काफी सफल है। आपको बता दे कि ट्राइब्स शॉप्स की संख्या एक से बढक़र 22 हो चुकी है। इन दुकानों का वार्षिक व्यापार लगभग 14 करोड़ रुपए हो चुका है। इन दुकानों के ही माध्यम से हम आदिवासियों के वस्तुओं को लोगों के समक्ष प्रदर्शित करते हैं। अब तो काफी वस्तुएं एक ब्रांड बन चुकी है और लोग इनकी वस्तुओं को पसंद भी कर रहे हैं।

इन तीन वर्षो में ऐसा कौन-सा निर्णय रहा जिसे आप गेम चेंजर मानते हैं?

मेरा मानना है कि हमारी सरकार का आदिवासियों के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राईस (एमएसपी) का निर्णय ही सबसे अधिक प्रभावशाली रहा है। पहले जो छात्रवृत्ति स्कूलों के माध्यम से मिलती थी, जिसमें काफी समय लगते थे। अब हम छात्रवृत्ति लाभार्थियों को सीधे और तत्काल देने लगे हैं।

आने वाले दो वर्ष में आदिवासियों की भलाई के लिए किस प्रकार का काम करने जा रहे हैं?

हम आदिवासियों का न केवल विकास करना चाहते हैं, बल्कि उनको आत्मनिर्भर भी बनाना चाहते हैं। डिजिटल माध्यम और मोबाइल तकनीक इसमें सबसे अहम भूमिका निभा सकती है।mfxbrokerноутбук как

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