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महाबली मोदी

महाबली मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने बेहद कामयाब तीन साल पूरे किए तो कुछ विघ्रसंतोषियों को छोड़ दे तो देश के बहुसंक्चयक लोग राहत महसूस कर रहे हैं।  लोगों की यह खुशी हाल के विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों के नतीजों में धड़ल्ले से जाहिर भी हुई। ब्रांड मोदी अब चुनावों में और विपक्ष पर काबू पाने में चमत्कार कर रहा है और विदेश में भारत की छवि को चार चांद लगा रहा है। जरा सोचिए जिस मुख्यमंत्री को कभी ‘‘मौत का सौदोगर’’ कहकर बदनाम किया गया था, अब बतौर प्रधानमंत्री ‘‘गरीबों का मसीहा’’ कहलाने लगे हैं। मोदी फैक्टर के बाद भारतीय राजनीति में एक क्रांतिकारी मोड़ आ गया है, जिसे भाजपा के विरोधी शायद स्वीकार न कर पाएं।

राजनैतिक पंडितों के मुताबिक, सबसे बड़ा और साफ दिखने वाला बदलाव तो यह है कि वामपंथी पार्टियां सिर्फ बुढ़ाते नेताओं तक सीमित हो गई हैं, आजादी के बाद इतने साल तक देश में राज करने वाली कांग्रेस का नेतृत्व हंसी-मजाक का विषय बनकर रह गया है। मोदी फैक्टर के बाद द्रमुक, अन्नाद्रमुक, शिवसेना और बीजद जैसी क्षेत्रीय राजनैतिक दल अप्रासंगिक होने लगे हैं। राजनैतिक पार्टियों में यह डर घर करने लगा है कि मोदी युग में उनकी सारी रणनीतियां बेमानी होती जा रही हैं। दलितों के घरों में खाना खाने, कुर्ता फाड़ कर एंग्री यंग मैन दिखने, या ऐसी बातें कहने कि नोटबंदी मोदी की कब्रगाह बनेगी, स्वच्छ भारत योजना तो भारी क्रलॉप है, या ऐसे ही तमाम जुमले अब काम नहीं कर रहे हैं। असल में कांग्रेस के शाहजादे राहुल गांधी तो मोदी के लिए वरदान साबित हो रहे हैं।

यही नहीं, मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में किसी दूसरे मंत्री या नेता की कोई अहमियत नहीं बची है। अपवाद हैं तो सिर्फ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। मोदी के अलावा यह कोई नहीं जानता कि देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद मोदी ही भारतीय राजनीति के सबसे अहम फैक्टर बन गए हैं। एक बार शिक्षक दिवस पर छात्रों से मुखातिब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ‘‘मैं 2023 तक प्रधानमंत्री हूं, उसके बाद ही कोई कोशिश कर सकता है।‘’ वे एक छात्र के सवाल का जवाब दे रहे थे जिसकी ख्वाहिश प्रधानमंत्री बनने की थी।

केंद्र सरकार के तीन साल पूरे करने की पूर्व संध्या पर हर टीवी चैनल में विपक्षी नेता चीख रहे थे कि मोदी की योजनाएं पद्ब्रिलसिटी के अलावा कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ तथाकथित योद्घा केजरीवाल दिल्ली नगर निगम चुनावों में अपमानजनक हार के बाद मौन हो गए हैं। वरना वे मोदी के खिलाफ हल्ला बोल करते दिखते। अब उन्हें एहसास हो गया है कि मोदी के खिलाफ मुंह खोलने से लोगों के बीच वे अश्विसनीय बन जाएंगे। इसके एक ही मायने हैं कि भाजपा के वैचारिक परिवार और उसके बाहर की राजनैतिक दुनिया में सिर्फ मोदी ही महाबली हैं, जो सब पर भारी हैं। यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि आरएसएस मोदी का दार्शनिक और मार्गदर्शक है। कभी आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक से सक्चत प्रशासक और फिर देश में सभी तबकों में स्वीकार्य नेता के रूप में मोदी को अब किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। संघ सात दशक से ज्यादा समय से समाज के विभिन्न वर्गों में सौहार्द कायम करने में जुटा है। वह एससी, एसटी, दलित और अल्पसंक्चयकों के बीच पैठ बनाने के लिए भी काफी मेहनत करता रहा है। यह कहा जा सकता है कि भाजपा आज उसी वजह से इन मोर्चों पर सफल है। और मोदी और अमित शाह के योगदान के लिए भी धन्यवाद देना चाहिए। भाजपा अब दूसरी विचारधारा के लोगों के लिए अछूत नहीं है। आज विधानसभाओं और संसद में भाजपा के अनेक ऐसे निर्वाचित नेता हैं जो कभी भाजपा की घोर आलोचना किया करते थे। इसलिए अब भारत में नेतृत्व पर बहस नरेंद्र मोदी के आगे आकर खत्म हो जाती है। भारतीय राजनीति में उनकी शक्चिसयत को कोई छू भी नहीं सकता। छद्म धर्मनिरपेक्ष पत्रकारों की तो कोई बात ही नहीं है, जिन्हें मोदी और संघ परिवार के खिलाफ आग उगलने के लिए पैसे मिलते हैं। लेकिन हां, खांटी पत्रकारों को मोदी की कमियों की आलोचना खुले दिमाग से करनी चाहिए। वरना मोदी का कार्यकाल भी शाइनिंग इंडिया की तरह खत्म हो जाएगा और केंद्र सरकार तथा भाजपा नेताओं को हमारे देश के विकास के लिए ईमानदारी से काम करना चाहिए, जिसके लिए देश के लोगों ने मोदी को जनादेश दिया है।

अगर इस सरकार की तीन साल की योजनाओं और कार्यक्रमों पर नजर डाली जाए तो उससे साफ है कि ये नीतियां अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में जान फूंकने के लिए बनाई गई हैं। अब उन पर अमल सबसे अधिक प्राथमिकता होनी चाहिए। अर्थव्यवस्था के बुनियादी मानक, राजकोषीय घाटा, महंगाई और चालू खाते का घाटा सभी स्थिर हैं और काबू में हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में दिनोदिन मजबूत होती जा रही है। जीएसटी की व्यवस्था आम सहमति कायम करेगी और कई मुद्दों का हल निकाल देगी। असल में यह देश में गेम चेंजर साबित हो सकती है। भारत वैश्विक निवेशकों का पसंदीदा ठिकाना बनता जा रहा है। सरकारी क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास, राजमार्गों और बंदरगाहों का विकास की इसमें बड़ी भूमिका है। सस्ते आवास से लोगों को घर सुलभ होगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर में सरकारी-निजी सहयोग भी अहम भूमिका निभाएगा। बहरहाल, सरकार के पास अभी दो साल हैं जिसके दौरान इन सभी कार्यक्रमों पर ढंग से अमल किया जा सकता है। वरना देश के लोग चुनावों में चौंकाने वाले नतीजे दे सकते हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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