ब्रेकिंग न्यूज़ 

वनवासी-उत्थान के अग्रदूत

वनवासी-उत्थान के अग्रदूत

By सुधीर गहलोत

स्वयंसेवी समूहों द्वारा ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में नि:स्वार्थ भाव से जागरूकता लाने के लिए किए जा रहे प्रयास बेहद सराहनीय है। इससे ग्रामीण इलाकों के बच्चों और अभिभावकों को न सिर्फ शिक्षा के महत्व का पता चला है, बल्कि स्वास्थ्य और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन का भी ज्ञान हुआ है।

आजादी के 67 साल बाद आज भी भारत के दूर-दराज के गांवों में अशिक्षित लोगों की बड़ी संख्या निवास करती है। इसका मुख्य कारण सरकारी कार्य-योजनाओं को जमीनी स्तर तक उतारने की कमी है। शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार से समाज का एक बड़ा तबका वंचित है। आज गांवों की बात तो दूर शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे लोगों की एक बड़ी आबादी है। समाज की मुख्यधारा से जोडऩे में शिक्षा एक सशक्त माध्यम है।

2011 की जनजगणना के अनुसार, भारत की साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है, जो विश्व की औसत साक्षरता दर से अभी भी 10 प्रतिशत नीचे है। इसके लिए भारत सरकार ने 35 से 75 आयु वर्ग के लोगों के लिए सन 1988 में ‘राष्ट्रीय साक्षरता अभियान’ की शुरूआत की थी। वर्ष 1991 में की गई जनगणना में भारत की तत्कालिक साक्षरता दर महज 52.21 प्रतिशत थी। अगले दस साल बाद 2001 में की गई जनगणना में महज 12.63 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह शिक्षा जैसे आवश्यक और किसी भी राष्ट्र को विकास के पथ पर तेजी से बढ़ाने के लिए आवश्यक संसाधन और गुण का क्रमिक विकास था।

03-01-2015

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के शासनकाल में साक्षरता दर में वृद्धि करने के लिए सरकार ने 2001 में ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की शुरूआत की। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया। इस अभियान में न सिर्फ उन्हें साक्षर करने, बल्कि स्कूलों में उनकी भागीदारी को स्थायित्व देकर उच्च शिक्षा के लिए कॉलेजों तक पहुंचाने का उद्देश्य शामिल था। हालांकि 1994 में केन्द्र सरकार ने एक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्कूलों को स्थापित करने के लिए जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम को प्रायोजित किया, स्कूल खुलने और साक्षरता के साथ-साथ बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक बनाने के लिए कार्यक्रम चलते रहे और इसके उत्साहजनक परिणाम भी सामने आए।

इस उत्साहजनक परिणाम में सरकारी कार्यक्रमों के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्रों में  कार्य करने वाले गैर-सरकारी समूहों का महत्वपूर्ण योदान रहा है। ‘एकल अभियान’ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ इस क्षेत्र में नि:स्वार्थ भाव से दशकों से लगातार कार्य करते आ रहे हैं। महत्वपूर्ण योगदान कहना इसलिए सर्वोचित है, क्योंकि बिना किसी सरकारी मदद के दानदाताओं के सहयोग से  बिना किसी स्वार्थ के निष्ठा और लगन से शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक धरोहर को बचाए रखने के लिए कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं।

एकल अभियान         
केन्द्र सरकार ने जब 1988 में राष्ट्रीय साक्षरता अभियान की शुरूआत की थी, उसके 8 साल पहले न्यूक्लियर फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. राकेश पोपली ने 1980 में एक शिक्षक, एक विद्यालय की अवधारणा तैयार की थी। 1986 में आधारिक रूप से एकल अभियान को कोल इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मदनलाल अग्रवाल ने इसे विस्तार दिया। इसकी शुरूआत झारखंड के धनबाद के नजदीक के एक गांव से हुई। एकल अभियान एक शिक्षक, एक विद्यालय की संकल्पना पर आधारित है। देश भर के लगभग एक लाख गांवों में 57,857 एकल विद्यालयों के माध्यम से 16 लाख 30 हजार 705 विद्यार्थियों को शिक्षित किया जा रहा है। इसमें बेसिक शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य शिक्षा, आर्थिक विकास शिक्षा, सशक्तीकरण से संबंधित शिक्षा (जिसमें सूचना का अधिकार भी शामिल है) और नैतिक एवं मूल्यों से संबंधित शिक्षा शामिल है। एकल अभियान का मुख्य उद्देश्य है – शिक्षित गांव, स्वस्थ गांव, स्वावलंबी गांव, जागरूक गांव, नशामुक्त गांव और समरस गांव की स्थापना करना। एकल अभियान से पिछले 28 सालों से जुड़ी और नगर संगठन मंत्री का दायित्व का निर्वहन करने वाली प्रो. मंजूश्री का कहना है – ”एकल अभियान वनवासी और ग्रामीण क्षेत्र में समेकित विकास के लिए छह चरणों को अपनाता है। पहले चरण में हम बच्चों को बेसिक शिक्षा देते हैं। दूसरे चरण में हम बच्चों औपचारिक विद्यालयी शिक्षा से जोड़ते हैं। तीसरे चरण में उन्हें समूह के एजेंट के रूप में प्रशिक्षित करते हैं। चौथे चरण में इन एजेंटों के माध्यम से पारिवारिक साक्षरता को बढ़ाते हैं। पांचवें चरण में फंक्शनल शिक्षा के माध्यम से जागरूकता पैदा करते हैं और अंतिम चरण में सशक्तिकरण के जरिए ग्रामीण विकास को बढ़ावा देते हैं।’’

03-01-2015

एक अध्यापक के जरिए गांवों के बीच से ही कई लोगों को अध्यापक के रूप में  प्रशिक्षित किया जाता है, जिसमें पचास प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की सुनिश्चित की जाती है। 6 से लेकर 14 साल के आयु वर्ग के बच्चों के लिए प्रयोग होने वाली बेसिक शिक्षा में संगीत, खेलकूद, कला, योग, कहानियों के जरिए उन्हें शिक्षित किया जाता है। साथ ही अरोग्य फाउंडेशन के सहयोग से स्वास्थ्य के लिए जरूरी आवश्यकताओं, जैसे कि साफ-सफाई, भोजन का प्रयोग, नीम-तुलसी जैसे औषधीय वनस्पति आदि पर बल दिया जाता है। ग्रामोत्थान योजना के तहत विकास शिक्षा में पौधारोपण, आयुर्वेदिक वनस्पतियों का उत्पादन, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण आदि की जानकारी दी जाती है। सशक्तिकरण के लिए जरूरी सरकारी योजनाओं और उसके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए सूचना के अधिकार के बारे में उन्हें पूरी जानकारी दी जाती है। इसके साथ ही नशा, अनैतिकता जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ लोगों को जागरूक कर इससे उन्हें मुक्ति दिलाई जाती है। इन अभियानों में एकल विद्यालय अभी तक  सफल रहा है।

देश भर में स्कूलों-कॉलेजों में नामांकन लेने वाले छात्रों में ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों के छात्रों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। शिक्षा के प्रति इन दूर-दराज के क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने में एकल विद्यालय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

वनवासी कल्याण आश्रम
आदिवासियों के बीच शिक्षा के प्रसार में वनवासी कल्याण आश्रम का प्रयास भी उल्लेखनीय और स्वागतयोग्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध वनवासी कल्याण आश्रम आदिवासियों (जिन्हें वनवासी भी कहा जाता है) के शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, उनके अधिकार (जल, जंगल और जमीन)एवं उनकी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए सन 1952 से ही प्रयासरत है। पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपने काम को अंजाम देने वाली यह संस्था  हजारों आदिवासी गांवों में शिक्षा के लिए सतत प्रयत्नशील रही है। 25 हजार या उससे अधिक की आबादी वाले लगभग सभी 375 जनजातीय जिलों में वनवासी कल्याण आश्रम अपनी सेवाएं देती आ रही है। वर्तमान में इन आश्रमों में लगभग 1 लाख आदिवासी छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। आश्रम में शिक्षित कई आदिवासी बच्चे आज सेना के जवान, शिक्षक, ब्यूरोक्रेट, डॉक्टर और इंजिनियर हैं। इसके अलावा वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा 2,104 स्वास्थ्य केन्द्रों का संचालन किया जाता है, जहां आदिवासियों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इन केन्द्रों में हर साल लगभग 12 लाख आदिवासी चिकित्सकीय सुविधा का लाभ उठाते हैं।

पंचमुखी शिक्षा हमारा ध्येय – मंजूश्री

03-01-2015

वनवासियों और दूरस्थ ग्रामीण इलाके के लोगों को शिक्षित करने में ‘एकल अभियान’ का महत्वपूर्ण योगदान योगदान है। एकल अभियान किस अवधारणा पर काम करता है, इसे जानने के लिए उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता सुधीर गहलोत ने एकल अभियान से पिछले 28 सालों से जुड़ीं और नगर संगठनमंत्री का दायित्व संभाल रही प्रो. मंजूश्री से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है कुछ प्रमुख अंश:

एकल अभियान की शुरूआत कैसे हुई?
डॉ. राकेश पोपली और रामा पोपली की अवधारणा वाली एकल विद्यालय को स्व. श्री मदनलाल जी अग्रवाल ने विस्तार दिया। इसके लिए झारखंड में धनबाद के पास रतनपुर टुंडी गांव को चुना गया। यह एक प्रयोग था, जो बेहद सफल रहा। चंूकि मदनलालजी उनके बीच रहते थे, उनके दुख-दर्द को समझते थे, इसलिए उन्होंने इसकी पहल की। इसका पहला कॉन्सेप्ट कोलकाता में तैयार हुआ और वनबंधू परिषद के नाम से शुरू हुआ। इसके लिए हमने एक शिक्षक, एक विद्यालय की अवधारणा को अपनाया। अनौपचारिक शिक्षा के रूप में हमने बच्चों के द्वार तक शिक्षा उपलब्ध कराने का निश्चय किया। हमने उन गांवों को शामिल किया, जहां पैदल पहुंचना भी कठिन होता है।

एकल अभियान किस तरह काम करता है?
अगर करोड़ों बच्चों का उद्धार करना है और बड़े पैमाने पर काम करना है, तो ऐसी स्थिति में दो तरह की चुनौतियां होती हैं, धन की और मानव संसाधन के प्रबंधन की। हमने दोनों का समाधान निकाला। हमने गांव के प्रमुख लोगों को कहा कि हम आपके बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराएंगे और इसके लिए हमें आपका सहयोग चाहिए। उनके सहयोग से गांव में कोई भी छोटा-सा स्थान लेकर उनके ही गांव के किसी शिक्षित बच्चे, महिला या पुरूष को प्रशिक्षित करते हैं। फिर वो महिला या पुरूष गांव के बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रतिदिन तीन घंटे का समय देते हंै। समय का चयन ग्राम समिति करती है। इस तरह हमने जमीनी स्तर पर मानव संसाधन तैयार किए। गांव के उस शिक्षक को हम मानदेय देते हैं। आजकल यह राशि एक हजार रूपए मासिक है। शिक्षक के रूप में हम शादीशुदा महिला को प्राथमिकता देते हैं। इससे उन्हें आर्थिक मदद भी मिल जाती है और शिक्षा का प्रसार भी हो जाता है।

किस तरह की शिक्षा दी जाती है एकल विद्यालयों में?
इसे आप बेसिक एजुकेशन कह सकते हैं। वास्तव में हम इसे फंक्शनल एजुकेशन कहना चाहेंगे। फंक्शनल से हमारा तात्पर्य है कि शिक्षा सिर्फ किताबी न रहकर उसमें जीवन का हर पहलू शामिल हो। यह पंचमुखी शिक्षा-व्यवस्था है। इसमें बाल शिक्षा के साथ-साथ ग्राम शिक्षा को भी उतना ही महत्व दिया जाता है। ग्राम शिक्षा के तहत ग्रामीणों को भी स्वास्थ्य की शिक्षा, ग्राम विकास की शिक्षा, जागरण शिक्षा (खासकर सरकारी योजनाओं के बारे में) और संस्कार शिक्षा दी जाती है। बाल शिक्षा में चारित्रिक शिक्षा, सामाजिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, योग आदि कई तरह की शिक्षा को शामिल करते हैं। बच्चा अपने जमीनी स्तर से कटना नहीं चाहिए, इस बात पर हमारा जोर रहता है। हम उन्हें पौधारोपण से लेकर कंपोस्ट बनाने तक की शिक्षा देते हैं। इसका मूल कंसेप्ट है, ‘लर्न ह्वाइल अर्न’। यानी जीवनोपयोगी शिक्षा हमारा प्रमुख उद्देश्य है, आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ।

इस कार्य के लिए सरकार की तरफ से क्या मदद मिलती है?
कुछ नहीं। सरकार से ना हमने कभी सहायता मांगी और न ही सरकार ने स्वत: कभी ऐसी पेशकश की। हमने नि:स्वार्थ भाव से सामाजिक उत्थान के लिए इस कार्य को शुरू किया था। दानदाताओं द्वारा दिए गए धन से हम अपने कार्य को बहुत अच्छे ढंग से संचालित कर रहे हैं। इसके पीछे हमारा एक मजबूत तर्क है। हम यह मानते हैं कि हमारे देश की युगों-युगों की परंपरा रही है कि जो सक्षम है उनका धर्म (दायित्व) है कि वे समाज के प्रति, देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करें। इसलिए हम अपने इस काम को दान नहीं, दायित्व कहते हैं, जो राष्ट्र-निर्माण के प्रति है। इस राष्ट्र-निर्माण में जो कि अधूरा है, उसके लिए हम काम कर रहे हैं। हमारा मकसद है कि हम पृथ्वी के अंतिम व्यक्ति को सशक्त करें। इस काम में कई देशों के प्रवासी भारतीय भी अपना योगदान दे रहे हैं।

संघ भी राष्ट्रवादी कामों में अग्रदूत की भूमिका निभाते हुए वनवासी कल्याण आश्रम के नाम से जनजातीय क्षेत्रों में इसी तरह के कार्यक्रम चलाता है। एकल अभियान और संघ के बीच में किस तरह के समीकरण हैं?
वैसे तो संघ से हम आधिकारिक संबंध की कोई बात नहीं कहते, लेकिन वैचारिक रूप से हमारा लक्ष्य एक है, वह है सशक्त समाज और राष्ट्र निर्माण करने का। वह हम कर रहे हैं। हां, एक बात और है कि जो निष्ठावान और जमीन से जुड़े कार्यकर्ता हैं, जो असम के खतरनाक जंगलों में जाकर काम करने की हिम्मत करते हैं, वे संघ के कार्यकर्ता ही हैं। अपने ध्येय के बल पर वे मौत के मुंह में जाकर काम करते हैं। यह बात आज पूरी दुनिया जानती है। ऐसे नि:स्वार्थ, निष्ठावान और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की जहां भी हमें जरूरत होती है, बिना मांगे सहयोग मिलता है। यही हमारा रिश्ता है संघ के साथ। इससे ज्यादा कुछ नहीं और इससे कम कुछ नहीं।

क्या ऐसा भी है कि जहां वनवासी कल्याण आश्रम काम करता है, वहां एकल विद्यालय नहीं करता?
हमारी आपसी समझ इतनी बेहतरीन है कि इसके लिए किसी डायलॉग की जरूरत ही नहीं है। एकल अभियान में हमारा प्रवेश ही आश्रम के द्वार से शुरू हुआ। इसके लिए किसी आधिकारिक घोषणा की भी जरूरत नहीं होती।

एकल अभियान से जुडऩे के लिए आप कैसे प्रेरित हुईं?
एक लेक्चरर के रूप में मैंने समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारी निभाई। देश के प्रति कुछ करना है, यह जूनून मुझे बचपन से है।  घर के संस्कार भी मुझे इसके लिए प्रेरित करते रहे हैं। बाद में मैंने निर्णय किया कि अब नौकरी छोड़कर अपना पूरा समय देश और समाज को देना है। इस अभियान में राष्ट्रवादी, समाजसेवी और उद्योगपति संयुक्त रूप से शामिल हुए, जिसमें मैं भी एक थी। गत 25 वर्षों से निरंतर वनवासी क्षेत्रों एवं महानगरों का प्रवास कर राष्ट्रीय चेतना तथा प्रेरणा का संवहन कर रही हूं। 2006 में अमेरीका तथा कनाडा के 16 नगरों का प्रवास कर मैंने प्रवासी भारतीयों को एकल अभियान से जोड़ा है। इसमें माननीय श्यामजी गुप्त का मार्गदर्शन और उनकी प्रेरणा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

इसके अलावा वनवासी कल्याण आश्रम आदिवासियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराता है। उन्हें खेती के आधुनिक तरीकों के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है। सिंचाई प्रबंधन और गांवों में पेयजल की उपलब्धता के तरीकों के बारे में जानकारी दी जाती है। सब्जी और फलों की खेती की जानकारी ने आदिवासियों के जीवन को नई रौशनी दी है। आदिवासियों को स्वावलंबी बनाने के लिए मधुमक्खी पालन, सिलाई, हथकरघा और हस्तशिल्प जैसे लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। जनजातीय समुदाय को आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर बनाने के लिए 161 आर्थिक विकास केन्द्र और 1,165 स्वयं सहायता समूह चलाए जा रहे हैं। इसके लिए 82 कृषि प्रशिक्षण केन्द्रों के अलावा कई तरह के स्वयं सहायता केन्द्रों का संचालन किया जा रहा है।

2001 की जनगणना के अनुसार जनजातीय वर्ग में साक्षरता का दर 47.10 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय दर 64.8 प्रतिशत है। इस अंतर को देखते हुए आश्रम 3,147 शिक्षा केन्द्रों को संचालित कर रहा है, जिसमें 39 माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, 174 प्राथमिक विद्यालय, 157 प्री-प्राथमिक विद्यालय, 1,263 एकल विद्यालय एवं 96 विद्या मंदिर शामिल हैं। इसके अलावा 368 दैनिक बाल संस्कार केन्द्रों, 453 साप्ताहिक बाल संस्कार केन्द्रों, 351 सांध्य स्कूलों एवं कोचिंग सेंटरों द्वारा इन बच्चों को शिक्षित किया जा रहा है। बच्चों के लिए 49 पुस्तकालयों की भी व्यवस्था की गई है। इन विद्यालयों द्वारा 31 मार्च 2013 तक 1 लाख 7 हजार 780 बच्चे लाभान्वित हुए हैं। इसके अलावा आदिवासियों को उनकी संस्कृति, लोकाचार, लोक-परंपरा और रीति-रिवाजों की शिक्षा दी जाती है।

स्वयंसेवी समूहों द्वारा ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में नि:स्वार्थ भाव से जागरूकता लाने के लिए किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं। इससे ग्रामीणों इलाकों के बच्चों और अभिभावकों को न सिर्फ शिक्षा के महत्व का पता चला है, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन का भी ज्ञान हुआ है।

взломcrm управление взаимоотношениями с клиентами

Leave a Reply

Your email address will not be published.