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उदर, त्वचा, वृक्क आदि रोगों में कारगर औषधि ‘दूर्बा’

उदर, त्वचा, वृक्क आदि रोगों में कारगर औषधि ‘दूर्बा’

दूर्बा अर्थात दूब प्राणी मात्र के लिए प्रकृति का बहुमूल्य उपहार है। चिकित्सक इस पर नंगे पांव चलने पर नेत्र ज्योति बढऩे व शरीर के अनेक विकार शांत होने की बात कहते हैं। निघंटुओं में श्वेत, नील एवं गंड दूर्वा का उल्लेख है। हरी दूब जब श्वेत हो जाती है, तो वह श्वेत दूब कहलाती है।

दूब में प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम, आयोनोन, फायटोल, स्टिग्मास्टेराल, सिस्टोरियल, ग्लुकोसाईड, फायटोन, ग्लायकोसाईड, सैपोनिन, टैनिन, फ्लेवोनोयड तथा कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है।

यह बहुवर्षायु, आरोही, चिकना, बहुशाखित तृण है। दूब के कड़े कांड युक्त, प्रसरणशील पौधे होते हैं, जो भूमि पर चारों ओर फैलते हैं। इसका काण्ड अनेक पर्वयुक्त, मूल जमीन पर लगे हुये तथा शाखाएं छोटी जमीन से उठी हुई, तनु, सीधी, लगभग 30 सेंटीमीटर लम्बी होती है। इसके पत्र संकुचित, 2 से 10 सेंटीमीटर लम्बे, 1.2 से 3 मिमी. चौड़े सुदृढ़ आवरण युक्त, स्निग्ध या रोमिल, रेखीय, भालाकार, सूच्यग्र अथवा उदग्र होते हैं। इसके पुष्प हरित-बैंगनी वर्ण के तथा फल छोटे-छोटे दानों के रूप में होते हैं। यह दाने 1 मिमी. लम्बे, दीर्घायत, पाश्र्व में सम्पीडि़त होते हैं तथा बीज सूक्ष्म, आयताकार भूरे वर्ण के होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जुलाई से जनवरी तक होता है। यह अनेक रोगों में काफी प्रभावकारी मानी जाती है।

औषधीय प्रयोग: मात्रा एवं विधि

शिरो रोग

  • शिर:शूल में दूब तथा चूने के समान मात्रा में लेकर पानी में पीसें, इसे ललाट पर लेप करने से शिर:शूल में लाभ होता है।

नेत्र रोग

  • दूर्वा को पीसकर पलको पर बांधने से नेत्र रोगों में लाभ होता है, नेत्र मल का आना भी बंद हो जाता है।

नासा रोग

  • नकसीर- अनार पुष्प स्वरस को दूब के रस के साथ अथवा हरड़ के साथ मिश्रित कर 1-2 बूंद नाक में डालने से नासिका द्वारा प्रवृत त्रिदोषज रक्तपित्त रूक जाता है।
  • दूर्वा पंचांग स्वरस का नस्य लेने से नकसीर में लाभ होता है।
  • रक्तपित्त- दूर्वा स्वरस को 1 से 2 बूंद नाक में डालने से नासागत रक्तस्नाव को स्तंभन होता है।

मुख रोग

  • मुखपाक- दूर्बा क्वाथ से कुल्ले करने से मुंह के छालों में लाभ होता है।

उदर रोग

  • 5 मिली. दूब का रस मिलाने से उलटी में लाभ होता है
  • दूर्वा पंचांग को पीसकर चावल के धेवन के साथ पिलाने से उलटी रूक जाती है।
  • जलोदर- दूब को काली मिर्च के साथ पीसकर दिन में तीन बार भोजन से पहले पिलाने से मूत्रवृद्धि होकर जलोदर और सर्वांग शोथ का शमन होता है।
  • अतिसार- दूब का ताजा रस फराने अतिसार और पतले अतिसारों में उपयोगी होता है।
  • आम अतिसार- दूब को सोंठ और सौंफ के साथ उबालकर पिलाने से आम अतिसार मिटता है।
  • छर्दि- चावल के धेवन के साथ दूर्वा स्वरस का पान करने से त्रिदोषज छर्दि का शमन होता है।
  • जलशोफ- 10 से 30 मिली. दूर्वा क्वाथ को पीने से जलशोफ में लाभ होता है।
  • प्रवाहिका- 10 से 30 मिली. दूर्वा क्वाथ का सेवन करने से प्रवाहिका में लाभ होता है।
  • वमन- दूर्वा को मण्ड के साथ सेवन करने से वमन में लाभ मिलता है।

 

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव


 

  • दूब मधुर, रुचिकारक, कषाय, कड़वी तथा शीतल गुण वाली होती है। यह वमन, विसर्प, तृष्णा, कफ, पित्त दाह, आमातिसार, रक्त पित्त तथा खांसी को दूर करती है। गंड दूब अर्थात (गाडर दूब) शीतल, लोहे को गलाने वाली, मल को रोकने वाली, हल्की, कसैली, मधुर, वातकारक, पचने में चरपरी तथा तृषा-दाह-कफ-रुधिर विकार, कुष्ठ, पित्त और ज्वर को दूर करने वाली है।
  • दूर्वा स्वरस रक्तस्तंभक होता है।
  • इसका पत्र सार अनॉक्सीकारक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।
  • इसका मेथेनॉल सार नर चूहों में शक्तिशाली वाजीकारक एवं जननक्षमता वर्धक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।
  • इसका मेथेनॉलिक सार उत्तम अतिसाररोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता हे।
  • यह शक्तिशाली यकृतक्षात्मक क्रियाशीता प्रदर्शित करता है।
  • श्वेत दूर्वा-कषाय, मधुर, तिक्त, शीत तथा कफ-पित्तशामक होती है।
  • यह व्रण के लिये हितकर, जीवनशक्ति-वर्धक, रुचिकारक, आमातिसार, कास, दाह, तृष्णा, छर्दि, रक्तपित्त तथा विसर्प शामक होती है।

गुदा रोग

  • अर्श- दूर्वा पंचांग को पीसकर दही में मिलाकर लें और इसके पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लें और इसके पत्तों को पीसकर बवासीर पर लेप करें, लाभ होगा।
  • रक्तार्श- घृत को दूब स्वरस में भली-भांति मिला कर अर्श के अंकुरों पर लेप करें साथ ही शीतल चिकित्सा करें, रक्तस्नाव शीघ्र रूकेगा।
  • रक्तार्श तथा मूत्रकृच्छता- दूर्वा का फाण्ट बनाकर 10 से 30 मिली. मात्रा में पीने से रक्तार्श तथा मूत्रकृच्छ में लाभ होता है।

वृक्कवस्ति रोग

  • पथरी- दूब को 30 मिली. पानी में पीसें तथा इसमें मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पीने से पथरी में लाभ होता है।
  • मूत्रविकार- दूब की मूल का क्वाथ बनाकर 10 से 30 मिली. मात्रा में पीने से वस्तिशोथ, सूजाक और मूत्रादाह का शमन होता है।
  • दूब को मिश्री के साथ घोट छान कर पिलाने से पेशाब के साथ खून आना बंद हो जाता है।
  • 1 से 2 ग्राम दूर्वा को दुग्ध में पीस-छानकर पिलाने से मूत्रदाह मिटती है।

प्रजननसंस्थान रोग

  • रक्तप्रदर- दूब के रस में सफेद चंदन का चूर्ण और मिश्री मिलाकर पिलाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।
  • गर्भपात- प्रदर रोग में तथा रक्तस्नाव, गर्भपात आदि योनि व्याधियों में इसका प्रयोग करने से रक्त बहना रुक जाता है। गर्भाशय को शक्ति तथा पोषण मिलता है।
  • श्वेत दूब वीर्य को कम करती है और काम शक्ति को घटाती है।

त्वचा रोग

  • विसर्प- दूर्वा स्वरस से सिद्ध घृत का सेवन करने से विसर्पजन्य व्रण में लाभ होता है।
  • कण्डू- चार गुना दूर्वा स्वरस से सिद्ध तैल का अभ्यांग करने से कण्डू, पामा, विचर्चिका आदि में लाभ होता है।
  • शीतपित्त- दूर्वा एवं हल्दी के कल्क का लेप करने से कण्डू, पामा, कृमि, दद्रु, शीतपित्त आदि में लाभ होता है।
  • व्रण- दूर्वा कल्क एवं स्वरस से सिद्ध तिल तैल को व्रण पर लगाने से व्रणरोपण होता है।
  • कण्डू- दूब, हरीतकी, सैन्धव, चक्रमर्द बीज और वनतुलसी के पत्तों को समान मात्रा में लेकर तक्र में पीसकर लेप करने से कण्डू तथा दद्रु में लाभ होता है।

दूर्वा तथा दारुहरिद्रा को समान मात्रा में लें, इसे तक्र के साथ पीसकर लेप करने से कण्डू, पामा, कृमि, दद्रु तथा शीतपित्त रोगों में लाभ होता है।

वस्तुत: दूर्बा प्रत्येक भारतीय के निकट रहने वाली दिव्य वनौषधि है, जो किसी भी परिस्थिति में हरी-भरी रहने की सामथ्र्य रखती है और प्रत्येक रोगी को भी पुनर्जागृत बनाती है।

साभार: योग संदेश

आचार्य बालकृष्ण

 

 гора моисеявоздухосборник Львов

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