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श्री हरिचैतन्यपुरी महाराज जीवन एक प्रयोगशाला

श्री हरिचैतन्यपुरी महाराज  जीवन एक प्रयोगशाला

निरंतर प्रवहमान इस कालचक्र में ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं, जिनका नाम इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्हीं महापुरुषों में एक विश्व विश्रुत नाम हैं-पूज्य हरिचैतन्यपुरी महाप्रभु। महापुरुषों के जीवन का हर क्षण अपना असीम महत्व लिए रहता है, क्योंकि उनका जीवन व्यवहार उस शाश्वत सत्य की पृष्ठभूमि पर अवस्थित होता है, जिससे ज्ञात-अज्ञात रूप में अनेक प्रकार से सत्य की ज्योति प्रज्वलित होती रहती है। ऐसे ही काल के भाल पर कुंकुम उकेरने वाले सिद्धपुरुष का नाम है, हरिचैतन्यपुरी महाप्रभु। प्रेम, सौहार्द एवं भाईचारे की अलख जगाने वाले, रामभक्ति में लीन, सामाजिक कुरीतियों एवं आडम्बरों के खिलाफ शंखनाद करने वाले एवं भक्ति चेतना के जागरण हेतु कटिबद्ध, मानवीय मूल्यों के पुनरुत्थान के सजग प्रहरी, अध्यात्म दर्शन और संस्कृति को जीवंतता देने वाली संजीवनी बूटी, विश्वशांति और अहिंसा के प्रखर प्रवक्ता, युगीन समस्याओं के समाधायक, अध्यात्म और विज्ञान के समन्वयक, युगदृष्टा का नाम है हरिचैतन्यपुरीजी। वे अध्यात्म एवं भक्ति की अतल गहराइयों में डुबकी लगाने वाले साधक हैं तो व्यवहार में जीने वाले समाज सुधारक भी हैं। वे प्रज्ञा के पारगामी हैं तो विनम्रता की बेमिशाल नजीर भी हैं। वे करुणा के सागर हैं तो प्रखर प्रेमावतार भी हैं। उनमें वक्तृता है तो शालीनता भी। कृशता है तो तेजस्विता भी।

ब्रजभूमि के काम्यवन में पूज्य हरिचैतन्यपुरी महाप्रभु का जन्म 12 जून 1960 का हुआ। इनके पिता देशराजजी और माता निर्मला भक्ति रस में लीन रहती थी। मां-बाप के संस्कार का प्रभाव उनके बालक योगेन्द्र पर भी पड़ा। यही योगेन्द्र आगे चलकर ‘कामां के कन्हैया’ हरिचैतन्यपुरीजी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

बाल्यावस्था में शिक्षा-दीक्षा के दौरान भक्ति रस में लीन रहना, साधु-संतों के साथ समय व्यतीत करना, रामचरित मानस का गायन करना, इनकी दिनचर्या में शामिल था। दो वर्ष की अवस्था से ही गोधूलिबेला में ध्यान अवस्था करने बैठ जाते थे। उस वक्त इनके शरीर पर वाहन हलचल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। अन्य बच्चों से अलग अपना समय आसन, प्राणायाम, ध्यान, भजन व कीर्तन में व्यतीत करते थे। इनकी वाणी में सरस्वती का वास था। इनका गायन सुन श्रद्धालु भक्ति रस में डूब जाते थे।

साधु संतों की सेवा और भगवान के प्रति इनकी आस्था को देखकर लोग दंग रह जाते थे। पांच वर्ष की अवस्था में ही साधु-संतों ने इनके मां-बाप को कहा कि यह बच्चा आगे चलकर महान संन्यासी बनेगा और सारी दुनिया को ज्ञान का प्रसाद बांटेगा। मां-बाप महात्माओं की बात सुनकर थोड़ा निराश हुए और बेटे को संन्यासी बनने से रोकने के लिए सद्गुरू संत ब्रह्मचारीजी से सलाह ली। संत ने कहा कि होनी को नहीं टाला जा सकता है, लेकिन इसका प्रभाव कम किया जा सकता है। इनकी सलाह पर योगेन्द्र को लंगोटी पहनाकर शहर में घुमाया गया। जब आपने लंगोटी पहनकर ‘हरिबोल’ कहते हुए शहर का भ्रमण किया, तो उनकी मधुर वाणी सुनकर शहर के निवासी उन्हें योगी कहकर पुकारने लगे।

आदरणीय पिताजी के गुरु रामस्नेही सम्प्रदाय के परमहंसजी की बालक पर सदैव कृपा दृष्टि बनी रहती थी। बंगाली संत नित्यानंद महाराज, योगेन्द्र को महाप्रभु चैतन्य का अवतार मानकर सदैव चैतन्य ही कहा करते थे। बचपन में ही हम उम्र के बच्चों को बिठाकर प्रवचन देने का काम करने लगे। बच्चों को प्रेम के सार समझाया करते थे। बड़ों को चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करने में धर्म, जाति, ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं करते थे।

स्कूली शिक्षा के बाद बी.काम. की पढ़ाई के लिए राजर्षि कालेज अलवर गये वहां उन्होंने अपनी मधुर वाणी और तर्कों से कुसंगति प्राप्त दोस्तों को सच्ची राह दिखाई शिक्षा के दौरान भी भगवान की भक्ति और समाजसेवा में कमी नहीं आई। महान क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस के परम सहयोगी गोपालदासजी, योगेन्द्र के नाना थे। इनके प्रभाव से योगेन्द्र के मन में देशभक्ति और देश सेवा की भावना सुदृढ़ हुई थी। साढ़े उन्नीस वर्ष की आयु में योगेन्द्र ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर ली। एम.काम. में पढ़ाई के दौरान उन पर वैराग्य हावी होने लगा। कॉलेज पर्यटन के दौरान हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा की, ऋषिकेश में उन्हें सद्गुरु की प्राप्ति हुई। सद्गुरु आशीर्वाद को पाकर इन्होंने वैराग्य धारण किया। सद्गुरु रामानंदपुरी ने इन्हें चैतन्य नाम प्रदान किया। बाद में हरिचैतन्य के नाम से इन्होंने प्रसिद्धि पाई।

पूज्य हरिचैतन्यपुरी महाप्रभु ने अनेक क्षेत्रों की पदयात्रा की, उनकी इन पदयात्राओं का उद्देश्य समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं आडम्बरों को दूर करना था, उन्होंने पदयात्रा के दौरान बीमार प्रथाओं, अंधविश्वासों, बाल विवाह, दहेज प्रथा, मृत्यु भोज, बलि प्रथा, मांसाहार और मदिरा सेवन जैसी बुराइयों के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों ने इन सामाजिक कुरीतियों से तौबा कर ली। उन्होंने अपने भक्तों एवं अनुयायियों को को परमात्मा की सेवा में लीन रहने का संदेश दिया।

पूज्य हरिचैतन्यपुरी का सम्पूर्ण जीवन मानव उत्थान के लिये समर्पित है। एक महान् उद्देश्य और दृष्टि को लेकर आपने कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्रों की स्थापना की। श्री हरिकृपा आश्रम, कामवन, श्री हरिकृपा धाम, उत्तराखंड और श्री हरिकृपा आश्रम, चित्रकूट (रामनगर), की स्थापना करके आप अनेक रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्य कर रहे हैं। उनके दरवाजे सभी के लिये खुले हैं। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी जाति, वर्ग एवं वर्ग के लोग बिना किसी भेदभाव के आपके यहां अपने जीवन को निर्मित कर रहे हैं। यही कारण है कि श्री हरेश्वर महादेव मंदिर की  नींव का पत्थर हिंदू, मुस्लिम और सिख  समुदाय के लोगों ने एक साथ रखा, अब एक जीवित प्रतीक और सांप्रदायिक शांति-सौहार्द और एकता का अनूठा एवं अनुकरणीय उदाहरण है। आपने लाखों लोगों की जीवन दिशा को बदला है। उनको नशामुक्त बनाया है। जीवन की उन्नत दिशाओं की ओर अग्रसर किया है। उनकी इन्हीं उल्लेखनीय मानवतावादी सेवाओं के लिये अनेक पुरस्कार एवं सम्मान भी आपको प्राप्त हुए हैं।

पूज्य हरिचैतन्यपुरीजी ने लोगों को प्रकृति से प्रेम करना सिखाया। आपका मानना है कि वृक्ष में परमात्मा का निवास होता है। वृक्षों को वह भगवान शंकर का अवतार मानते हैं। अपने भक्तों को वृक्षों के प्रति प्रेमभाव रखने की सलाह देते हैं। भक्तों को परोपकारी बनने को कहते हैं। उनका मानना है कि दान से मान बढ़ता है। अशांति फैलाने वाले को शांति का दान कर रास्ते पर लाया जा सकता है।

श्री हरिकृपा पीठाधीश्वर, युगद्रष्टा, प्रेमावतार, श्री श्री 1008 स्वामी हरिचैतन्यपुरीजी महाराज का जीवन कमल के पत्ते पर पड़े ओस के बूंद की तरह स्वच्छ और निर्मल है। कामा के कन्हैया, लाठी वाले भैया के नाम से सुविख्यात हरिचैतन्यपुरी महाप्रभु ने अनेक पुस्तकें व कई हजार पद व रचनायें लिखी है। आपने पूरे राष्ट्र में राष्ट्रीयता व अमर शहीदों की याद में व उनके परिजनों के सम्मान व सहयोग हेतु ‘एक शाम शहीदों के नाम’ कार्यक्रम के माध्यम से एक अभियान चला रखा है। युवाओं के लिए संदेश में कहते हैं कि ईश्वर से मिली जिंदगी और जवानी का सदुपयोग करो, वतन और समाज के लिए कार्य करो। भोग-उपभोग नहीं करो। सफलता की प्राप्ति के लिए ईश्वर, गुरु एवं स्वयं के प्रति विश्वास तथा समुचित प्रयास जरूरी है।

वे संपूर्ण मानव जाति के मार्गदर्शक हैं। स्वस्थ समाज संरचना के संदेशवाहक हैं। हिंसा के वातावरण में अहिंसा का शंखनाद करने वाले हैं। वे कालजयी महर्षि के रूप में प्रतिष्ठित हैं, विश्व क्षितिज पर आपके अवदान कालजयी अभिलेख बनकर प्रतिष्ठित हैं।

 

ललित गर्ग

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