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आतंक के आका

आतंक के आका

जम्मू-कश्मीर में पिछले दिनों से चल रही हलचल पर हर भारतीय दुखी हुआ होगा। आखिर कौन चाहता है कि उसके अपने ही भाई, उसके अपने हमकदम भारतीय लगातार कई महीनों तक कफर््यू से परेशान रहें, दुखी होते रहें! लोगो को यह कहना बड़ा आसान लगता है कि इन समस्याओं के लिए भारत की सरकार या जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार जिम्मेदार है, लेकिन फौरी तौर पर ही नजर डाली जाये तो यह समझते देर न लगेगी की आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली पाकिस्तान सरकार और वहां की सेना भी इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं है, बल्कि कश्मीरी अलगाववादी नेताओं की जवाबदेही कहीं ज्यादा है। पाकिस्तान तो कश्मीर की आजादी का नारा लगा कर अपने देश की अखंडता को बरकरार रखना  चाहता है लेकिन कश्मीर के अलगाववादियों की आखिर कौन सी मजबूरी है कि वह अपने ही लोगों का खून बहाने पर आमादा रहते हैं। और तो और कश्मीरी युवाओं को ‘शिक्षा और रोजगार’ की राह से हटाकर आतंक की राह पर धकेल रहे हैं। इतिहास में यह बात साफ व सुनहरे अक्षरों में दर्ज है कि कश्मीर का विलय भारत में हो चुका है। इसमें कोई संदेह नहीं की तमाम शोर-शराबे के बावजूद कश्मीर भारत का हिस्सा बन चुका है और पिछले लगभग 70 सालों से वहां लोकतंत्र कायम है। वहां के तमाम नागरिक जो सरकार चलाना चाहते हैं वह चुनाव में भाग लेते हैं और अपनी सरकार गठित करके जम्मू कश्मीर को लोकतंत्र की राह पर लेकर चलते भी हैं। पर यहीं बीच में आ जाते हैं अलगाववादी, जो युवाओं के हाथ में पत्थर थमा कर उन्हें तथाकथित ‘आजादी -आजादी’ चिल्लाने की ट्रेनिंग देते हैं! उन्हें शिक्षा से हटाकर अपने ही देश के सैनिकों पर पत्थरबाजी करने को उकसाते हैं और नतीजा होता है कि पूरी व्यवस्था ठप्प हो जाती है।

जब भी कश्मीर के अमन की बात होती है, उसमें हुर्रियत की चालबाजियों का जिक्र जरूर होता है। जानिए, कश्मीर की बातचीत में रोड़ा अटका रहे हुर्रियत नेता या अलगाववादी कौन हैं।

ये कश्मीर में क्या कर रहे हैं…?

कश्मीर में अलगाववादियों ने अपना एक संगठन बना रखा है, जिसका नाम ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (एपीएचसी) है। इसका गठन 9 मार्च 1993 को हुआ था। इसमें 26 राजनीतिक, धार्मिक व सामाजिक संगठन शामिल हैं। हालांकि किसी समय इसमें 28 दल थे।

इसमें जमात-ए-इस्लामी, मुस्लिम कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स लीग, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, इत्तेहाद-ए-मुस्लिमीन, अवामी कॉन्फ्रेंस और जेकेएलएफ इत्यादि प्रमुख दल थे। इस संगठन से जुड़े लोग हमेशा कश्मीर के भारत से अलगाव की वकालत करते हैं। एक तरह से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना का मकसद ही राजनीति के जरिए कश्मीर का अलगाव कराना था।

भारतीय अधिकारियों का मानना है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर में सक्रिय चरमपंथी संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है। इसे बनाने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंसक गतिविधियों को मान्यता नहीं दी जाती है। इसलिए कोशिश थी कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के जरिए कश्मीर समस्या के अंतरराष्ट्रीकरण और राजनीतिक समाधान के रास्ते ढूंढ़े जाएं, लेकिन ऐसा न हो सका।

जम्मू-कश्मीर में चरमपंथी संगठनों से संघर्ष कर रही भारतीय सेना की भूमिका पर सवाल उठाना। मानवाधिकार की बात करना ही काम है हुर्रियत का।

यह भारतीय सेना की कार्रवाई को सरकारी आतंकवाद का नाम देती है और कश्मीर पर भारत के शासन के खिलाफ हड़ताल और प्रदर्शन करती है। यह भारत के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोहों का बहिष्कार भी करती आई है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने अब तक एक भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है। हालांकि यह खुद को कश्मीरी जनता का असली प्रतिनिधि बताती है।

रोचक और चौंकाने वाली बात यह है कि करीब 30 कश्मीरी अलगाववादी नेता ऐसे हैं, जिन्हें राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के आदेशों पर सरकारी सुरक्षा मुहैया करवा रखी है। सर्वदलीय हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज मौलवी उमर फारूक को तो जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी गई है। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने विधानसभा में आंकड़े पेश करते हुए माना था कि अलगाववादी नेताओं को जेड प्लस, जेड तथा वाई श्रेणी की सुरक्षा दी गई है।

सबसे मजेदार बात उनके प्रति यह कही जा सकती है कि वे भारत सरकार की सुरक्षा के बीच रहते हुए भी भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार से बाज नहीं आते और उन्हें कोई नुकसान भी इसलिए नहीं पहुंच सकता, क्योंकि वे भारतीय सुरक्षाबलों की सुरक्षा में हैं। जिन्हें सुरक्षा दी गई है, उनमें मीरवाइज मौलवी उमर फारूक, सईद अली शाह गिलानी, मौलवी अब्बास अंसारी, शब्बीर अहमद शाह, जावेद मीर, अब्दुल गनी बट, सज्जाद लोन, बिलाल लोन तथा यासीन मलिक आदि शामिल हैं।

अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा, इलाज, खाने-पीने और यात्रा पर सालाना 100 करोड़ रुपये का खर्च होता है।


 

हुर्रियत नेता और उनके संगठन


 

हुर्रियत नेताओं के साझा मंच में वैचारिक मतभेद उभरने पर 7 सितंबर 2003 को ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के दो धड़े हो गए। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में शामिल 12 संगठनों ने तत्कालीन चेयरमैन मौलवी मोहम्मद अब्बास अंसारी की जगह मसर्रत आलम को अंतरिम प्रमुख बना दिया। वर्तमान में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से 30 पार्टियां जुड़ी हुई हैं

 

सैयद अली शाह गिलानी


 

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कट्टरपंथी धड़ा

संगठन: जमात-ए-इस्लामी (पाक समर्थक )

जमात-ए-इस्लामी संगठन के प्रमुख कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने तहरीक-ए-हुर्रियत के नाम से 7 अगस्त 2004 को संगठन बनाया था। गिलानी सशस्त्र आतंकवाद के समर्थक है। गिलानी कश्मीर को धार्मिक मुद्दा मानता है। उसे कई आतंकी संगठनों का समर्थन भी हासिल है।

भारत विरोधी गतिविधियों के चलते 1981 में उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया था। 2006 में हज यात्रा के अलावा उसे किसी विदेश दौरे की अनुमति नहीं दी गई थी।



 

यासीन मलिक


 

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कट्टरपंथी धड़ा

संगठन: जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट

कश्मीर को भारत व पाकिस्तान से अलग करने की मांग करने वाला यासीन मलिक जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) का चेयरमैन है। वह कश्मीर की स्वतंत्रता की बात करता है। यासीन ने एक बार माना था कि उसने 1987 में चार भारतीय सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर दी थी। इस दोष में उसे सजा भी काटनी पड़ी थी। यासीन 1999 और 2002 में गिरफ्तार हो चुका है। 2002 में तो उसे पोटा के तहत गिरफ्तार किया गया था। उस पर पाक आतंकियों के साथ संबंध रखने के लगातार आरोप लगते रहे हैं।



 

आसिया अंद्राबी


 

Asiya Andrabi, chief of Kashmiri women's separatist group speaks during news conference in Srinagar

 

कट्टरपंथी धड़ा

संगठन: दुख्तरान ए मिल्लत

आसिया उस समय चर्चा में आई थी जब श्रीनगर में पाकिस्तान दिवस मनाते हुए उसका एक वीडियो सामने आया था। इससे पहले आसिया पर आरोप लगा था कि उन्होंने महिलाओं को पत्थरबाजी के लिए उकसा रही हैं। ऐसी खबरें भी सामने आती रही है कि वे पाकिस्तान का सपोर्ट करती हैं। इसके अलावा आसिया पर पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ काम करने का भी आरोप लगता रहा है। दुख्तरान-ए-मिल्लत संगठन को कश्मीर में इस्लाम कानून लागू करने के साथ-साथ भारत से अलग करने के लिए काम करने वाला संगठन माना जाता है।



 

मीरवाइज उमर फारूक


 

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नरमपंथी धड़ा

संगठन: अवामी एक्शन कमेटी

इसका चेयरमैन मीरवाइज उमर फारूक बातचीत या शांतिपूर्वक ढंग से कश्मीर मसले को अंतरराष्ट्रीय मंच से सुलझाना चाहता है। अंदरुनी झगड़ों के चलते मीरवाइज का गुट भी टूट गया। मीरवाइज जब 17 साल का था, तब उसके पिता की हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद उसने 23 पाकिस्तानी समर्थक संगठनों को एपीएचसी में एकजुट किया।



 

अब्दुल गनी बट


 

 

नरमपंथी धड़ा

संगठन: मुस्लिम कॉन्फ्रेंस

इसका प्रमुख अब्दुल गनी बट कश्मीर को राजनीतिक मुद्दा बताता

रहा है और इसका हल भी इसी तरह चाहता है।



 

शब्बीर शाह


 

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गिलानी समर्थक

संगठन: जम्मू एंड कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी

इसके अध्यक्ष शब्बीर अहमद शाह ने एक समय भारत को परमाणु युद्ध की धमकी तक दे दी थी। शब्बीर शाह ने भारत और पाकिस्तान के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) वार्ता में अलगाववादी नेताओं को शामिल करने की भी मांग की थी। इनका संगठन गिलानी समर्थक माना जाता है।


बातचीत करने आगे आने पर मिली थी धमकी

मालूम हो, कई आतंकी संगठनों से धमकी मिलने के बाद केंद्र सरकार ने जनवरी 2004 में सभी हुर्रियत नेताओं को जेड श्रेणी की सुरक्षा दी थी। तब सरकार ने बताया था कि बातचीत का न्योता स्वीकार करने के बाद हुर्रियत नेताओं को आतंकी संगठनों ने खुले तौर पर धमकी दी थी। इससे पहले लोन भाइयों (बिलाल और सज्जाद) को वर्ष 2000 में उनके पिता अब्दुल गनी लोन की हत्या के बाद से कड़ी सुरक्षा मिली हुई है।

अप्रैल 2006 में राज्य विधानसभा में बताया गया था कि सरकार हुर्रियत व गैर हुर्रियत नेताओं को सुरक्षा देने में 12 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

छह वर्षों में 700 करोड़ हुए खर्च

बताया जाता है कि पिछले छह वर्षों में अलगाववादियों पर केंद्र और राज्य सरकार के लगभग 700 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 2010 से 2015 तक अलगाववादियों के घर की सुरक्षा के लिए 18 हजार पुलिसकर्मियों को बतौर गार्ड तैनात किया गया था। इनकी सैलरी पर राज्य सरकार ने 309 करोड़ रुपए खर्च किए।

अलगाववादियों के पीएसओ पर भी 150 करोड़ रुपए खर्च किए गए। साथ ही इन पांच वर्षों में इनके होटल बिल भरने के लिए राज्य सरकार को 21 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े। इस दौरान इनके द्वारा इस्तेमाल ईंधन पर 26 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च किया गया।

साफ जाहिर होता है कि हर तरह की स्थितियों को समझने के बावजूद कश्मीर को लोगों को आग में झुलसाना और घाटी में ‘शांति-भंग’ करना ही अलगाववादियों का उद्देश्य बन कर रह गया है। आंकड़े साफ तौर पर कहते हैं कि भारत सरकार हर स्तर पर किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले कश्मीर को ज्यादा तवज्जो देती है, ज्यादा आर्थिक मदद देती है, ज्यादा सहूलियतें प्रदान करती है, लेकिन दो-चार नेता, कुछ पाकिस्तानी दलाल और कुछ आतंकवादी जम्मू-कश्मीर की जनता की नाक में दम किये हुए हैं।  काश कि यह अलगाववादी कश्मीरियों का भला करने को राजी हो जाएं, वहां के युवाओं की शिक्षा और रोजगार के लिए आवाज उठाएं, तो शायद कश्मीरियों के लिए वह समय सर्वश्रेष्ठ होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसे घाटी के तथाकथित शुभचिंतक भी समझेंगे और अगर वह नहीं समझे तो उन्हें समझाने की जिम्मेदारी कश्मीरी जनता की ही होगी।

(उदय इंडिया ब्यूरो)

 

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