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कश्मीर में जल्दबाजी नहीं धैर्य की जरूरत

कश्मीर में जल्दबाजी नहीं धैर्य की जरूरत

भारत को कश्मीर पर कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। जो समस्या 1948 से शुरू हुई और जिसकी जड़ में आपका पड़ोसी पाकिस्तान है वह कोई सरकार अपने कार्यकाल के तीसरे साल में हल नहीं कर सकती। उसे ऐसा करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। 1948 से लेकर 2017 की गर्मी तक इस देश ने कश्मीर घाटी में आतंकवाद और उन्माद के कई रूप देखे और झेले हैं। आतंक के उन्माद का ये दौर भी उसी तरह निकल जाएगा जिस तरह अलगाववाद की अन्य आगों को देश ने सफलता से बुझाया है।

दरअसल जब-जब भी दिल्ली में बैठी सरकारों ने कश्मीर समस्या के हल की कोशिशें की हैं, पाकिस्तान में बैठे आका और कश्मीर घाटी में बैठे उनके पैरोकार सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने घाटी के नौजवानों के दिलोदिमाग में नफरत के जहर के इंजेक्शन को और अधिक तीव्रता के साथ डाला है। इस समय भी ऐसा ही हो रहा है।

दिल्ली में जब से मोदी की सरकार आई है तभी से उसने कश्मीर की समस्या- जिसकी जड़े पाकिस्तान में हैं- को सुलझाने की कोशिश की है। पाकिस्तान के साथ रिश्ते ठीक करने की कोशिशें और प्रधानमंत्री मोदी का कश्मीर पर लगातार ध्यान देना, इसी का एक अंग है। मगर कश्मीर और दिल्ली में बैठी पाकिस्तान परस्त ताकतों के लिए ये दौर जीवन मरण का है। उनकी कल्पना में भी ये कभी नहीं आया था कि श्रीनगर में जो सरकार होगी उसमें बीजेपी भी कभी हिस्सेदार हो सकती है। इस मायने में इस बार की गर्मियां महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अगर पीडीपी-बीजेपी की सरकार इस बार के आतंक के तूफान को झेल गयी तो फिर पाकिस्तान परस्त नेताओं/जमात की बुनियाद ही हिल जाएगी। इसीलिए आप देख सकते हैं कि फारूक अब्दुल्ला जैसे लोग अपने खोल से बाहर अब अपने असली रूप में आ गए हैं। सांप सीढ़ी का खेल खेलते हुए फारूक और उन जैसे नेता भूल चुके हैं किे कट्टर इस्लाम से पोषित आतंक के जिस सांप को वे पालते आए हैं, वह अब उन्हें ही डसेगा।

पाकिस्तानपरस्त लोग सिर्फ घाटी में नहीं हैं, दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठान, मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग में भी उनके समर्थक और पैरोकार गहरे घुसे हुए हैं। भारत के थल सेनाध्यक्ष को ‘‘गली का गुंडा’’ कहने की हिमाकत रखने वाले इन्हीं तत्वों ने कश्मीर में अलगाव की भावनाओं को लगातार हवा दी है? संदीप दीक्षित जैसे न जाने कितने पाकिस्तानपरस्त लोग हमारे सत्ता प्रतिष्ठान का लंबे समय तक हिस्सा रहे हैं। उन्हीं लोगों की वजह से कश्मीर की समस्या आज इतनी विकराल और गंभीर है। इसलिए सरकार और देश को ध्यान रखना है कि कश्मीर को लेकर भारत के अंदर और भारत के बाहर दोनों तरफ हमलें और बढ़ेंगे।

जब भी आप आतंकवाद का टेटुआ दबाएंगे तो उसकी चीखें जोर से सुनाई पड़ेंगी। शायद ऐसा ही आज घाटी में हो रहा है। भारत को इसी दृढ़ता और मजबूती के साथ कश्मीर में अपनी नीतियों को लागू करना है। मगर साथ ही उसे धीरज भी रखना है। कश्मीर की समस्या का पेड़ उस विषबीज से उत्पन्न हुआ है जो आजादी के समय पाकिस्तान ने बोया था। कांग्रेस की गलत नीतियों ने उस पौधे को बड़ा किया है। कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम कर उन्हें घाटी से निष्कासित करने वाला जेहादी इस्लामिक आतंकवाद उसे आज भी लगातार पोषित कर रहा हैं। इसलिए कश्मीर में दृढ़ता के साथ असीम धैर्य भी चाहिए।

भारत को कश्मीर के हल में जल्दबाजी नहीं करनी। जिस शरीर से 70 साल से रक्त रिस रहा हो उसे आप अगर जल्दबाजी में खड़ा करने की कोशिश करेंगे तो वह लडख़ड़ा कर गिर जाएगा। इसलिए मोदी सरकार को सीमापार से समर्थित आतंक के इस पेड़ की जड़ में धीरे-धीरे मट्ठा डालना है। ये पेड़ धीरे-धीरे ही सूखेगा-मगर सूखेगा जरूर- यह विश्वास भी रखना है।

तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है-

धीरज, धरम, मित्र अरु नारी। आपद काल पीखिये चारी।।

यानी आपद काल में ही आपके धैर्य और धर्म की सही परीक्षा होती है। कश्मीर के संकट का ये दौर हम सबके धीरज और राष्ट्रधर्म के इम्तिहान का ही वक्त है।

 

उमेश उपाध्याय

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