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उनकी हिम्मत कैसे हुई बड़ों पर उंगली उठाने की?

उनकी हिम्मत कैसे हुई बड़ों पर उंगली उठाने की?

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा।

बेटा:  खुशखबरी। अब तो समझो आपका बेटा चोरी के अपराध से बरी हो गया।

पिता:  तू तो बेटा रंगे हाथों पकड़ा गया था। यह कैसे सम्भव है?

बेटा:  पिताजी, सारी दुनिया विश्वास कर ले पर आप कभी अपने बेटे पर विश्वास नहीं करेंगे।

पिता:  बेटा, बात ही ऐसी है। जो मुझे साफ दिखाई दे रहा है, मैं उसे कैसे झुठला दूं?

बेटा: पिताजी, विजय माल्या, ललित मोदी, कार्ति चिदंबरम, पी चिदंबरम, ऐनडीटीवी जैसे महानुभाव अपने आप को निर्दोष होने का दावा कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?

पिता:  तू कब से महानुभाव बन गया?

बेटा: पिताजी, मैं चाहे महानुभाव न होऊं पर भारत के संविधान के अनुसार भारत के सब नागरिक कानून के आगे बराबर हैं।

पिता:  बेटा, तू तो बड़ी-बड़ी शेखियां मार रहा है। पर यह याद रखना कि कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली।

बेटा: पिताजी, यह ठीक है कि मैं छोटा आदमी हूं पर उनके मुकाबले मेरा जुर्म भी तो बहुत छोटा है-केवल दो हजार रुपये की चोरी।

पिता:  बेटा, चोरी तो चोरी है, वह चाहे एक रुपये की हो या एक करोड़ रुपये की।

बेटा: आपकी बात ठीक है। पर जब बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपये हड़प कर माल्या अपने आपको बेकसूर बता सकता है, तो मैं क्यों नहीं?

पिता:  बेटा, वह तो इंग्लैंड भाग गया, तू तो दूसरे गांव भी नहीं छुप सकेगा। तुझे तो कान से पकड़ कर लोग पुलिस के हवाले कर देंगे।

बेटा: पर पिताजी, आपने भी तो मुझसे कोई बड़ा घोटाला करने नहीं दिया। कदम-कदम पर टोकते रहे। वरन मैं भी आज कहीं विदेश में होता। आपको भी ले जाता, माताजी को भी और सारे परिवार को ही। सब मौज करते माल्या की तरह और उसकी तरह सरकार को ठेंगा दिखाते और चिढ़ाते।

पिता:  हमें नहीं करनी ऐश उसकी तरह। हमें तो इज्जत की रूखी-सूखी रोटी में ही संतोष है।

बेटा: पिताजी, यही फर्क है हम में और उनमें।

पिता:  बेटा, तुझे पता है कि जब माल्या इंग्लैंड में भारतीय क्रिकेट टीम के एक स्वागत समारोह में पहुंचा तो लोगों ने चोर-चोर कह कर उसका अपमान भी तो किया।

बेटा: उसे तो कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने तो उलटे भारत पर चुटकी ली कि करोड़ो पौंड के सपने लेते रहो।

पिता:  बेटा, जब तक अदालत फैसला नहीं कर देता, ऐसी चुटकियां तो सब ले सकते हैं। यदि वह निर्दोष ही थे, तो वह भारत छोड़ भागे क्यों?

बेटा: वह कहते हैं कि उन्हें भारत में न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है।

पिता:  हां, उसी भारत में जिसने उसे ऐश करने के लिए हजारों करोड़ दे दिया। तब तो भारत ने उसके साथ न्याय किया और उधार वापस मांगा तो अन्याय।

बेटा: पिताजी, मैं भी उसकी तरह यही कहूंगा कि मुझे भी इस देश में न्याय की उम्मीद नहीं है।

पिता:  बेटा, इंग्लैंड मैं डींगें जितनी मर्जी मारे, अन्त में उसे भारत ही आना पड़ेगा और उसे न्याय भी यहीं मिलेगा। न्याय यही नहीं होता कि अपराधी को बरी कर दिया जाये। जब अपराधी को सजा मिलती है और निर्दोष को ससम्मान रिहाई होती है, तो वह होता है न्याय।

बेटा: मैं भी तो पिताजी यही कह रहा हूं कि मुझे बरी कर दीजिये, मेरे साथ न्याय हो जायेगा।

पिता:  अच्छा, रंगे हाथों पकड़ा गया और तुझे बरी कर दिया जाये।

बेटा: पिताजी, आपको तो अपने बेटे के लिये कतई कोई सहानुभूति नहीं है। आपका बेटा ससम्मान बरी हो जायेगा तो आपको क्या बुरा लगेगा?

पिता:  चोरी करके तू अपने बरी होने की बात करता है?

बेटा: जब माल्या जैसे लोग कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं?

पिता:  तू किस आधार पर?

बेटा: उसी पर जिस पर और लोग कर रहे हैं।

पिता: और क्या कह रहे हैं?

बेटा: कोई कहता है कि मुझ पर कार्रवाई इसलिये की जा रही है कि मैं पत्रकार हूं और मैं सरकार की आलोचना करता हूं। कोई कहता है कि सरकार और सीबीआई मेरे पीछे इस लिये पड़े हैं क्योंकि मैं विरोधी दल का हूं।

पिता:  तो तू क्या बोलेगा?

बेटा: मैं कह दूंगा कि मैं कांग्रेस का नेता हूं और जिसने मुझे पकड़वाया है वह सत्ताधारी दल भाजपा का व्यक्ति है। उसने राजनीतिक द्वेषभावना से प्रेरित होकर मुझे और मेरी पार्टी को बदनाम करने के लिये यह सारा षडय़न्त्र रचा है।

पिता:  तू कहां से कांग्रेस का नेता बन गया? जलूस में दो नारे क्या लगा लिये कि नेता बन गया। चूहे को दो छुआरे क्या मिल गये वह तो पंसारी ही बन बैठा।

बेटा: पिताजी, आप सदा मेरे ही पीछे पड़े रहते हैं। कभी नहीं कहेंगे कि मैंने भी कभी कुछ किया है।

पिता:  क्या कर लिये है तूने?

बेटा: आपने समाचारपत्रों में मेरी फोटो नहीं देखी। मैं ही तो था जो इतने जोश से नारे लगा रहा था। टीवी पर भी तो मैं ही छाया हुआ था।

पिता:  उससे तू नेता बन गया?

बेटा: पिताजी, आप करते हैं अपने ज़माने की पुरानी बाते जब हर व्यक्ति पहले पार्टी का कर्यकर्ता बनता था। सालों सडक़ों की खाक छानता था। पार्टी के पोस्टर चिपकाता फिरता था। तब कहीं वह नेता बन पाता था। अब तो पिताजी, कार्यकर्ता नहीं, नेता ही पैदा होते हैं।

पिता:  कैसे?

बेटा: आपने हमारी पार्टी में कोई कार्यकर्ता देखा है? सब नेता ही होते हैं। नेता ही पैदा होते हैं। संजय गांधी सीधे कांग्रेस के युवा नेता उभरे और बाद में सर्वेसर्वा बन गए थे। राजीव गांधी अपनी नौकरी छोड़ पार्टी में आये तो राष्ट्रीय महामंत्री बन कर। सोनिया जी तो पार्टी की सदस्यता लेते ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गयी थी।

पिता:  यह तो ठीक है।

बेटा: यही नहीं पिताजी। लालूजी ने उनका चूल्हा-चौंका संभालने वाली अपने पत्नी राबड़ी देवी जी को सीधे मुख्यमंत्री बना दिया था।

पिता:  यह भी ठीक है।

बेटा: पिताजी, लालूजी तो और भी आगे निकल गए। उन्होंने अपने एक बेटे को उपमुख्यमंत्री और दूसरे को कैबनेट मंत्री बना दिया है। अपने परिवार के सभी सदस्यों को कुछ-न-कुछ बना दिया है। सब सीधे नेता ही बने। कोई कार्यकर्ता नहीं था। आप तो गर्व करो कि आपका बेटा देश की सबसे पुरानी पार्टी का नेता है।

पिता:  चल मान लिया तुझे नेता। उससे क्या फर्क पड़ेगा? चोरी का दाग तो नहीं धुल जायेगा?

बेटा: आप भी पता नहीं कौन सी पुरानी दकियानूसी बातें करते हैं? पिताजी, राजनीती में तो जेल जाना गर्व की बात होती है। आपको पता है कि लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाले के कई मुकदमें चल रहे हैं। एक मामले में तो उन्हें पांच साल की सजा भी हो गयी है। लोकसभा की उनकी सदस्यता भी चली गयी। पर उनकी सेहत पर कोई असर हुआ? वह तो आज भी ईमानदार होने का दम भरते हैं। शेर के तरह अपने सब विरोधियों की दहाड़ कर डराते फिरते हैं। अभी भी उनपर भ्रष्टाचार के कई और मामले अदालतों में चल रहे हैं।

पिता:  तेरा मतलब पार्टी में बेशर्म होना ही सबसे बड़ी योग्यता है?

बेटा: यही समझ लो।

पिता:  इसीलिए कहते हैं कि आदमी को बेशर्म होना चाहिए। शर्म तो आने-जाने

वाली चीज है।

बेटा: पिताजी, आप राजनीती की बारीकियां क्या जानें?

पिता:  पर मुझे तो बेशर्म नहीं बनना। जब तुझे सजा हो जाएगी तो मेरा तो सिर झुक जायेगा।

बेटा: मुझे कैसे सजा हो जाएगी पिताजी जब मैं यह साबित कर दूंगा कि मुझ पर केस ही राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है?

पिता:  तेरा मतलब ऐसा कह देने से ही अपराधी अपराधमुक्त हो जाता है?

बेटा: पिताजी, चिदंबरम साहिब ने आरोप लगा दिया है कि मेरे बेटे की खिलाफ साजिश है। क्योंकि मैं सरकार की खिलाफ बोलता रहता हूं। नेताओं को नंगा करता रहता हूं। पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखता रहता हूं, इसलिए मेरी जुबान को बंद करने और यह सब मुझे सरकार के विरुद्ध लिखने से रोके जाने का एक घिनौना प्रयास है।

पिता:  उस से क्या हो जायेगा?

बेटा: आप तो अपने बेटे की लिए कुछ करते नहीं। आप क्या जानें?

पिता:  मैं तो अपने गलत बेटे को सही करार नहीं दे सकता।

बेटा: यही तो पिताजी आप और उनमें फर्क है। वह अपने और अपने परिवार की लिए सब कुछ करने को तैयार हैं पर आप कुछ नहीं क्योंकि आप अपने असूलों की जेल में बंदी हैं।

पिता:  तो मैं क्या करूं?

बेटा: आप भी कहो कि मेरे खिलाफ केस झूठा है और राजनितिक भावना से मुझे प्रताडि़त किया जा रहा है।

पिता:  पर बेटा, मैं तो राजनेता नहीं हूं न।

बेटा: पिताजी, चिदंबरम साहिब ने तो सरकार की छक्के छुड़ा दिए हैं। अब सरकार अपने बचाव में आ गयी है। वह तो सफाई देती फिर रही है कि सब साक्ष्य की आधार पर किया जा रहा है।

पिता:  तो होना भी ऐसे ही चाहिए न। सरकार को बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए। अभी तक तो मुझे कुछ ऐसा नहीं लगता कि सब बदले की भावना से किया जा रहा है।

बेटा: पिताजी, सच को झूठ और झूठ को सच बना देना ही राजनीती है। यह आप नहीं समझ सकते।

पिता:  मुझे समझना भी नहीं है।

बेटा: और तो और, पिताजी, एनडीटीवी ने तो उसके मालिक की कंपनियों पर मारे छापों को प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही कुल्हाड़ी चलाने का आरोप मढ़ दिया है।

पिता:  यह मामला है क्या?

बेटा: किसी व्यक्ति ने आरोप लगाया है कि एनडीटीवी के मालिक की कंपनियों ने धोखाधड़ी की है जिससे उसे और आईसीआईसीआई बैंक को करोड़ों का नुक्सान हुआ है।

पिता:  तो जांच ही हो रही है न। इसमें बुरा क्या है? दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।

बेटा: बात यह नहीं है। बात तो है कि इतनी प्रतिष्ठित इकाई पर कार्रवाई करने की सरकार कि हिम्मत कैसे हो गयी।

पिता:  तो तेरा मतलब कानून सिर्फ आम आदमी के लिए ही है। यदि ऐसे महानुभावों की विरुद्ध कोई शिकायत हो जाये तो सरकार और पुलिस जांच भी नहीं कर सरकती कि शिकायत सच्ची है या झूठी? यदि झूठी निकलेगी तो सरकार झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ भी तो मुकदमा कर सकती है।

बेटा: इतने बड़े आदमियों की इज्जत का भी तो सवाल है।

पिता:  आम आदमी की कोई इज्जत नहीं होती?

बेटा: उन्होंने यह कह भी तो दिया है कि उनकी विरुद्ध आरोप झूठे हैं।

पिता:  जिस पर आरोप लगते हैं सब यही कहते हैं। लालू प्रसाद तथा जिन अन्य मत्रियों या राजनीतिज्ञों को आज तक सजा हुयी है, क्या उन्हों ने माना था कि वह दोषी हैं?

बेटा: नहीं।

पिता:  तो फिर वह अदालत में झूठे पाए गए और उन्हें सजा हुयी।

बेटा: यह तो है, पिताजी।language translatorsсервисный центр hp в москве официальный сайт

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