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भारत में गोहत्या को लेकर कुतथ्य

भारत में गोहत्या को लेकर कुतथ्य

एक बड़ा प्रश्न है कि भारतवर्ष में आर्यों द्वारा आदिकाल में गौमांस खाया जाता था। बहुत से प्रश्न खड़े किये जाते हैं जैसे वेदों में गौभक्षण लिखा है। कुछ ग्रंथों में गौभक्षण शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसे आधुनिक इतिहास शोधकर्ता पुरातन भारत में गौमांस भक्षण से जोड़ते हैं। जिसे अपभ्रंश के रूप में ही स्वीकार किया जा सकता है। वास्तव में गौ का एक अर्थ इन्द्रियां भी है और गौभक्षण अर्थात काम, क्रोध, स्वाद, वासना, आलस्य आदि इन्द्रियों के दमन के लिए लिखा गया लगता है। भारतीय संस्कृति में तो गौवंश पालन, सुरक्षा, दान, आदि के आख्यान भरे पड़े हैं। समुद्र मंथन में रत्न के रूप में कामधेनु गौ प्रागट्य, रघुवंश के राजा दिलीप, द्वापर युग में गोपालकृष्ण आदि कितने ही उदहारण हैं। रामायण का प्रारम्भ ही गौमांस भोजन में होने की आकाशवाणी से हुआ था जिसमें केवल गीेमांस की सुचना से राजा प्रतापभानु को रावण बनना पड़ा था।

कहा जाता है कि महाभारत में गोहत्या की इजाजत दी गई है जबकि महाभारत के अश्वमेघिकपर्व वैष्णव धर्मपर्व के 12वें अध्याय में गाय की महिमा के बारे में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा–राजन, जिस समय अग्निहोत्री ब्राम्हण को कपिला गोदान में दी जाती है, उस समय उसके सींगों के अग्रभाग में विाष्णु तथा इंद्र वास करते हैं। सींगों के जड़ में चन्द्रमा तथा वज्रधारी इंद्र रहते हैं। सींगों के बीच में ब्रम्हा तथा ललाट में शिव का निवास होता हैं। इसी तरह गाय के प्रत्येक अंगों में विभिन्न देवी-देवताओं के वास के बारे में बताया गया है।

गाय और गोवंश तो शुरू से हमारे यहां अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी गयी है, तब उसके वध की इजाजत कैसी दी जा सकती है? महर्षि च्यवन ने अपने शरीर का मूल्य राजा नहुष के साम्राज्य को नहीं वरन एक गाय को माना था। नंदिनी गाय की रक्षा में प्रभु श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप अपने प्राण देने को तैयार हो गए थे। महर्षि जमदग्नि तथा ऋषि वशिष्ठ ने गोरक्षा के लिये प्राणों की बाजी लगा दी थी। श्री कृष्ण को तो गाय पालने के कारण ही गोपाल कहा गया है।

उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि हिन्दू धर्मग्रंथों में गोहत्या जैसे घृणित कर्म की इजाजत नहीं दी गयी है। जिन लोगों ने भी हिन्दू ग्रंथों में गोहत्या तथा गोमांस का वर्णन आना बतया है वो इन ग्रंथों के श्लोकों की गलत व्याख्या करते हैं।

गोरक्षा की राह में सबसे बड़ी बाधा ऐसी मानसिकता के लोग हैं। वेदों के प्रख्यात विद्वान् ‘‘अति प्रसिद्ध व्याख्याकार महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ‘गोमेध’ शब्द की व्याख्या करते हुए अपने ग्रन्थ ‘सत्य प्रकाश’ में लिखा है,’’ जो कोई भी ब्राम्हण ग्रंथों में प्रयुक्त अश्वमेघ, गोमेध, नरमेध आदि शब्दों का अर्थ घोड़ें, गाय आदि को मारकर होम करना बताते हैं, उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। वेदों में कहीं भी गोहत्या की इजाजत नहीं है। केवल वाममार्गी ग्रंथों में ऐसा लिखा है। अग्नि में घी आदि का होम करना, अश्वमेघ, इंद्रियां, किरण, पृथ्वी आदि को पवित्र करना गोमेध तथा जब मनुष्य मर जाये तो विधिपूर्वक उसका शरीर दाह करना नरमेध है।

ये भी है कि वैदिक काल में मनुष्य पशुओं पर अधिक निर्भर रहा करते थे। यही कारण है कि वेदों में बहुत सारे पशुओं का उल्लेख हुआ है। वैदिक यज्ञों को संपन्न करने में भी कई प्रकार के पशुओं की आवश्यकता होती थी। घोड़े का उपयोग अश्वमेघ यज्ञ में तथा रथों को खींचने आदि के कामों में किया जाता था। सूअर का उपयोग सफाई कार्यों में होता था वहीं बैल हल-गाड़ी को खींचने के काम आते थे। कुत्ता रखवाली का काम करता था। इसी तरह विभिन्न पशुओं का याज्ञिक कार्यों में कई तरह का उपयोग था। और इन सारे पशुओं में गाय का स्थान सर्वोपरि था क्योंकि गाय का घी, गोदुग्ध, दही, गोबर इत्यादि का व्यापक प्रयोग यज्ञादि कार्यों में, हिन्दू धार्मिक संस्कारों में होता रहा है।

यज्ञ के दौरान यज्ञकुंड के आसपास गायें बांध दी जाती थी ताकि आवश्यकता पडऩे पर तुरंत ही ताजा दूध निकाला जा सके या गोबर प्राप्त किया जा सके। बांधने का दूसरा प्रयोजन ये भी था कि यजमान यज्ञ के पश्चात याज्ञिकों को दक्षिणा में गायें दिया करते थे क्योंकि उस समय लोग पशु को भी धन ही मानते थे। अत: दक्षिणा प्रसंगों में गौदान, अश्वदान, अजादान आदि शब्द सामान्य रूप से प्रचलन में थे। इसी को आश्वलंभ, गवालंभ आदि भी कहा जाता था। इसी प्रसंग में गोमेधयज्ञ आता है।

फारसी ग्रन्थ जांदावेस्ता, अथर्ववेद से काफी हद तक मिलता जुलता है और इसे एक तरह से अथर्ववेद का फारसी भाषा में रूपांतरण ही समझा जाता है। इसके कई श्लोकों और अथर्ववेद के मन्त्रों में कई समानताएं हंै। इस ग्रन्थ के अध्ययन के आधार पर वेदों के ऊपर शोध करने वाले विद्वान् डॉ. मार्टिन हाग कहते हैं कि गोमेध का अर्थ गोवध नहीं वरन इसका अर्थ मिट्टी को उर्वरा बनाकर वनस्पति उगने योग्य कर देना है। जंद भाषा में गोमेध का अपभ्रंश गोमेज है जिसका यही अर्थ है। हाग लिखते हैं कि फारसी मत में खेती करना धर्म समझा जाता है। इस कारण कृषिधर्म से संबंध रखनेवाले प्रत्येक क्रियाकलाप को धर्मकार्य ही समझा जाता है।

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अत: कृषिधर्म से संम्बंध रखनेवाले समस्त क्रियाकलाप का नाम गोमेज है। महर्षि दयानन्द के अनुसार शतपथ ब्राम्हण में कहा गया है अन्नं हि गो अर्थात अन्न का नाम गो है वहीं मेध शब्द मेधा व मेधावी अर्थ में आता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद कल्चर है। कल्चर शब्द कृषि शब्द से ही आता है। अत: भूमि को अन्न उगाने योग्य करने को ही गोमेघ कहा गया।

अव्वल तो ये कि हिन्दू धर्मग्रंथों में कहीं भी ऐसा वर्णन नहीं है कि हिन्दुओं में गोमांस का चलन था और एक क्षण के लिए मान भी लिया जाये कि ऐसा था भी तो भी क्या यह हिन्दुओं के बौद्धिक विकास का धोतक नहीं है कि आज वह इस कृत्य को पापकर्म मानता है और हर तरह से बहुउपयोगी गाय के प्रति श्रद्धा भाव रखता है?

अगर हमारे पूर्वजों के समय कुछ सामाजिक कुरीतियां थी भी तो उसका निवारण करना क्या हमारी बुद्धि की उत्कृष्टता का परिणाम नहीं माना जाना चाहिए? महज इसलिए काट खाया जाए कि ऐसा किसी धर्मग्रन्थ में लिखा है तो यह दलील भी स्वीकार्य नहीं है।

हम अपनी मां के साथ गाय का दूध भी पीकर पलते है। अपनी सगी मां का दूध तो दो-ढाई साल की उम्र में छूट जाता है पर गौमाता का दूध सारी उम्र नहीं छूटता। गाय जैसा बहुउपयोगी जीव तो कोई नहीं है। गाय धरती पर ही अकेला जीव है जिससे प्राप्त होनेवाली कोई भी चीज बेकार नहीं है।

उपरोक्त विवरण के अनुसार यह भी स्पष्ट है कि इस्लाम परम्परा में भी गौमांस का वर्णन कदाचित नहीं पाया जाता था क्योंकि भारत में पहली बार 1000 ई. के आसपास जब विभिन्न इस्लामी परम्पराओं के (फारस), अरब और अफगानिस्तान से आये और वे इस्लामी परम्पराओं के अनुसार विशेष अवसरों पर वे ऊंट, बकरी और भेड़  बलिदान करते थे। हालांकि, मध्य और पश्चिम एशिया के इस्लामी शासक, गोमांस खाने के आदि नहीं थे, उन्होंने भारत में आने के पश्चात गाय के वध को और गायों की कुर्बानी, विशेष रूप से बकरी ईद के अवसर पर शुरू किया लगता है। भारतवर्ष में गौहत्या का प्रारम्भ अंग्रेजों के पदार्पण के के साथ हुआ। वे ठन्डे क्षेत्र से आते थे जहां गौमांस और सुअर मांस उनका आहार था। यहां आने पर उन्हें कसाई प्रारम्भ में इंग्लैंड से ही लाने पड़ते थे।               

  साभार: गाय और इंसान

डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल

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