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”दुनिया में आया हूं तो कुछ देकर जाने की तमन्ना है’’ – डॉ. अच्युत सामंत

”दुनिया में आया हूं तो कुछ देकर जाने की तमन्ना है’’ – डॉ. अच्युत सामंत

डॉ. अच्युत सामंत के व्यक्तित्व को देखकर उनके प्रति बरबस आकर्षण पैदा हो जाता है। उनकी सादगी और बेहद सरल व्यावहारिक हाव-भाव के कारण उनके प्रशंसकों की लंबी सूची है। अपने दृढ़ इरादों से सपनों को साकार करने वाले डॉ. सामंत आदिवासी बच्चों के लिए एक स्कूल, कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (केआइएसएस) की स्थापना की और उसे ऐसे मुकाम पर पहंचा दिया कि प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने भी अपने 7 नवंबर 2011 के अंक में उन पर ”चिल्ड्रेन ऑफ ए लेसर गॉड’’ नामक रिपोर्ट छापी। आस्था, उम्मीद और सादगी के इर्द-गिर्द बुनी गई यह रिपोर्ट इंस्टीट्यूट के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत के इस दशक के अंत तक दो लाख आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने के संकल्प पर आधारित थी। टाइम पत्रिका ने माना कि केआइएसएस दुनिया भर में आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने की सबसे बड़ी संस्था है। डॉ. सामंत अनेक उच्चस्तरीय शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिष्ठित पदों पर रहे हैं। उदय इंडिया के डिप्यूटी जनरल मैनेजर सौरभ अग्रवाल से बातचीत में डॉ. अच्युत सामंत ने केआइएसएस और केआइआइटी के बारे में विस्तार से बताया। प्रस्तुत है उसके कुछ खास अंश :

आपने ओडीशा जैसे पिछड़े राज्य को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का अनोखा कारनामा कर दिखाया है। आप अपने मिशन के साथ इस सफलता को कैसे आंकते हैं?
आप सही कह रहे हैं। इसके पीछे कोई शक्ति है जिसे हम ईश्वर कहते हैं, उनका अशीर्वाद मेरे साथ हमेशा बना रहा है। मैं तो एक जरिया मात्र हूं। मैं अपने दोस्तों का अभारी हूं जो मेरे साथ कठिन दिनों में हमेशा खड़े रहे। हमने छोटे स्तर पर शुरुआत की थी। एक गरीब राज्य में ऐसी छोटी शुरुआत से इस मुकाम पर पहुंचना वाकई बड़ी सफलता है। लेकिन सफलता की कोई सीमा नहीं होती और निश्चित रूप से हम अपनी लगन से और आगे जाएंगे। अभी तक जो कुछ हासिल हुआ है, वह अच्छा है।

03-01-2015

इस संस्थान के लिए आपकी योजनाएं क्या हैं?
केआइआइटी के बारे में हमारी योजनाएं देश के किसी भी हिस्से या राज्य में विस्तार की है। मैं तो एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हूं और शिक्षा के जरिए गरीबी उन्मूलन ही मेरे जीवन का लक्ष्य है। मेरी इच्छा इस दिशा में और कुछ करने की है। मैं केआइएसएस के 15-20 संस्करण ओडीशा ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों में बनते देखना चाहता हूं। करीब दो लाख छात्रों को दाखिला होना चाहिए और केआइआइटी की 20 शाखाएं होनी चाहिए। मेरी उम्र बढ़ रही है इसलिए यह सब जल्दी करना चाहता हूं। हम पांच साल में काफी आगे बढ़ेंगे।

आप सामाजिक काम बढ़ाना चाहते हैं या केआइआइटी को? ओडिशा के बाहर किन जगहों पर विस्तार की संभावना देखते हैं?
मैं सामाजिक कार्य को विस्तार देना चाहता हूं। फिलहाल छत्तीसगढ़, झारखंड और दिल्ली में काम चल रहा है। कई दूसरे राज्यों में भी केआइएसएस का संस्करण शुरू करने की बात चल रही है, सिर्फ आदिवासी बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि दूसरे गरीब तबकों के लिए भी। अगले 5-10 साल में ओडीशा से बाहर 10-15 शाखाएं खुल जाएंगी। अपने राज्य में भी आदिवसी बहुल जिलों में शाखाएं खुलेंगी। इसलिए केआइएसएस के कई संस्करण दिखेंगे।

03-01-2015

किन सामाजिक गतिविधियों पर आपका जोर है?
मैं 1992-93 से आदिवासियों, दलितों या अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों की शिक्षा के जरिए गरीबी दूर करने की कोशिश में लगा हूं। असल में शिक्षा ही इस समस्या का एकमात्र हल है।

दिल्ली में एससी, एसटी या अल्पसंख्यक आबादी ज्यादा नहीं है, फिर आपने दिल्ली में यह काम क्यों शुरू किया?
दिल्ली में हजारों बच्चे सड़कों पर मंडराते हैं। इनमें कई एससी, एसटी, अल्पसंख्यक बिरादरी से हैं। हम सभी छात्रों, सिर्फ आदिवासियों को ही नहीं, का ख्याल रखेंगे। दिल्ली में शिक्षा से वंचित अनेक गरीब तबका है।

तो, आप कह रहे हैं कि आप भोजन आवास और शिक्षा मुहैया कराएंगे?
हां, केआइएसएस संपूर्ण समाधान है। वह भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और वह सब कुछ मुहैया कराता है जो किसी बच्चे को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए जरूरी है। वह उच्च शिक्षा भी मुहैया कराता है। इसी वजह से यह देश में सफल मॉडल बना है। हम सभी जानते हैं कि अधूरी शिक्षा ज्यादा घातक होती है। आप अगर छात्र को आठवीं, नौवीं, दसवीं तक पढ़ा कर छोड़ देते हैं तो वे देश के लिए ज्यादा घातक हो जाते हैं। इसलिए केआइएसएस संपूर्ण समाधान देता है। केआइएसएस में दाखिले के बाद छात्र कॉलेज की पढ़ाई और उच्च शिक्षा के बाद नौकरी के साथ ही निकलता है।

03-01-2015

केआइएसएस के विस्तार के क्या स्रोत हैं?
फिलहाल केआइएसएस वित्तीय रूप से सफल मॉडल है। वेबसाइट पर सारी जानकारियां हैं। मैंने अच्छा वित्तीय मॉडल पेश किया है। अन्य शाखाओं के लिए राज्य सरकार मदद देगी। हम सिर्फ उसे चलाएंगे। ओडीशा के विभिन्न जिलों में हम कारपोरेट और कारोबारी घरानों से भी फंड जुटाएंगे। मैं कोई उद्योगपति तो हूं नहीं कि हमारे पास इतने संसाधन होंगे।

सरकार करोड़ों खर्च करके भी हाशिए पर बैठे लोगों को मदद नहीं कर पा रही है। तो, आप कैसे उनकी मदद कर पाएंगे?
मैं इस पर कुछ नहीं कहूंगा कि सरकार कितना खर्च करती है, लेकिन हम अपने प्रयास में सफल रहे हैं। केआइएसएस की सफलता को हर किसी ने देखा है। बच्चे-उनके मां-बाप सब खुश हैं। वे शिक्षा, खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं और रोजगार पा रहे हैं। इससे पता चलता है कि केआइएसएस कितना सफल है।

क्या आप सामाजिक कार्य के क्षेत्र में अपनी अन्य सफलताओं के बारे में कुछ बताएंगे?
मेरा कोई निजी एजेंडा या स्वार्थ नहीं है। अगर कोई लगन और मेहनत से कुछ करेगा तो जरूर ऊपर तक पहुंचेगा।

03-01-2015

आप अपने प्रोफेशनल और राजनैतिक वातावरण के बीच कैसे संतुलन कायम करते हैं?
मैं किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं जुड़ा हूं। इसी लिए मुझे हर पार्टी चाहती है। सभी मेरी गतिविधियों से काफी खुश हैं। मैं अपने राज्यों या देश के राजनैतिक वातावरण और अपने प्रोफेशनल जिंदगी में संतुलन कायम करने में सक्षम हूं। मुझे किसी राजनैतिक पार्टी से कभी कोई समस्या नहीं हुई। इसके बदले सबका रवैया मददगार रहा है।

केआइएसएस की स्थापना में आपको समाज या राज्य सरकार से कैसी प्रतिक्रिया मिली?
समाज से मुझे नैतिक समर्थन मिला। सरकार से भी सद्भावना मिली। निश्चित रूप से इतने बड़े पैमाने पर काम करने के लिए नैतिक समर्थन और सद्भावना की दरकार पड़ती है। मुझे सभी हलकों से सदभावना मिली।

केआइएसएस शुरू करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
मेरे बचनप के अनुभव ने मुझे प्रेरित किया। मैं गरीब परिवार में पैदा हुआ। चार साल में पिता गुजर गए। हम सात भाई-बहन थे। हमें दो दिनों तक पूरा भोजन भी नहीं मिलता था। उस अनुभव ने मुझे समाज के लिए कुछ करने को प्रेरित किया।

सामाजिक गतिविधियों में आप रोजाना कितना समय लगाते हैं?
मैं पिछले 20 साल से बिना छुट्टी लिए हर दिन 18 घंटे काम करता हूं। मैं शादीशुदा नहीं हूं और ईश्वर का शुक्रगुजार हूं कि कोई बीमारी नहीं हुई। इसलिए इतना काम करना संभव हुआ।

आपने दुखदायी अतीत की बात की। जीवन की कोई यादगार घटना बता सकते हैं?
मेरे जीवन में हजारों यादगार लम्हें हैं। जैसे हम बचपन में संघर्षरत थे, वैसे ही आज भी जूझ रहे हैं। इसलिए अनेक दुखों की कहानियां हैं। उन्हें न कहना ही अच्छा है। आखिर हम उनसे पार तो पा ही गए। अब हम ऐसी स्थिति में हैं कि दूसरों की मदद कर सकें।

आप जिंदगी का कोई खुशनुमा लम्हा याद कर सकते हैं?
खुशी के मौके भी अनेक हैं। हम 6-7 साल में ही जब यूनिवर्सिटी का दर्जा पा गए तो केआइटीटी और हमारे लिए सबसे खुशी का मौका था।

आप यूजीसी जैसे सरकारी संगठन के लिए चुने गए। इतनी बड़ी संस्था भी चलाते हैं। आप कैसे इन आला पदों में तालमेल बैठाते हैं?
कोई चाहे तो जीवन के हर हिस्से को पर्याप्त समय दे सकता है, क्योंकि हम किसी संगठन के कर्मचारी नहीं हैं। हम सिर्फ सदस्य हैं, हर संभव तरीके से मदद करते हैं।

अपने निजी जीवन के बारे में कुछ बताइए…
मेरा काम के अलावा कोई निजी जीवन नहीं है। मेरे लिए बस काम, काम, काम ही है।

अधिकांश समय आप आदिवासी छात्रों से ही बात करते दिखते हैं। आप किसी आदिवासी छात्र से जुड़ी कोई यादगार घटना बताएं…
2007 में 13-14 साल के लगभग 15 आदिवासी छात्र लंदन में रग्बी वल्र्ड कप में हिस्सा लेकर लौटे। मैं उन्हें लेने कोलकाता एयरपोर्ट पर गया था। वह अनोखा मौका था, क्योंकि जिन लड़कों ने कभी जिला मुख्यालय नहीं देखा था, वे लंदन जाकर दस देशों को हराकर लौट रहे थे।

पहले आपने कुलपति के पद से इस्तीफा दिया और उसके बाद सचिव पद से। ऐसा क्यों?
मुझे काम से मतलब है, पद से नहीं। हालांकि मुझे लगा था कि केआइआइटी जब डीम्ड यूनिवर्सिटी बनी तो मुझे संस्थापक के नाते कुलपति बनाना चाहिए। लेकिन साल भर बाद मैंने प्रतिष्ठित शिक्षाविद् प्रोफेसर हरि गौतम को कुलपति बनने के लिए मना लिया। उस समय भी लोग कह रहे थे कि यह कुलपति का पद क्यों छोड़ रहे हैं, लेकिन हमने सोचा कि कुलपति का पद बड़े शिक्षाविद् को ही दिया जाना चाहिए। इसी तरह मैंने सचिव पद से भी इस्तीफा केआइआइटी और केआइएसएस में लोकतांत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए दिया। ऐसा नहीं होना चाहिए कि मैं मरते दम तक सचिव बना रहूं और बाद में मेरा कोई रिश्तेदार सचिव बन जाए। मुझमें वैसा कोई लालच नहीं है। मैं सिर्फ संस्थान का विकास चाहता हूं। मैं संस्थान से उस रूप में आज भी जुड़ा हूं और मरते दम तक जुड़ा रहूंगा।

क्या कोई ऐसी आशंका है कि आपके इस्तीफे से संस्थान पतन की ओर जाने लगेगा?
बिलकुल नहीं। केआइआइटी और केआइएसएस मेरे रक्त-मज्जा के समान है। मेरे पास इस बात का ध्यान रखने के लिए पर्याप्त समय है कि विकास अवरुद्ध न हो।

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