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पूर्णता का मार्ग

पूर्णता का मार्ग

मन-बुद्धि ही मानव व्यक्तित्व का सार है। भौतिक शरीर उसके द्वारा धारण किया हुआ वस्त्र मात्र है। हमारे मन-बुद्धि की गुणवत्ता और संरचना क्रमागत, जन्मजात, अन्तर्निहित और स्वाभाविक प्रवृतियों पर निर्भर होती है, जिन्हें हम वासना कहते हैं। दर्शन और धर्म मनुष्य की वासनाओं को ढालने और नया रुप देने में शिल्पकार का काम करते हैं और इसके परिणामस्वरूप उसके व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण होता है।

मनुष्य के शरीर-भवन में पांच ज्ञानेन्द्रियरूपी खिड़कियां हैं जिनसे होकर ब्राह संसार की वस्तुओं से आने वाले उत्प्रेरक हम तक पहुंचते हैं। नेत्र रूप और रंग ग्रहण करते हैं, कान ध्वनि सुनते हैं और नासिका घ्राण, आदि। इन उत्प्रेरकों के प्रति मन-बुद्धि प्रतिक्रिया करते हैं और कर्मों के रूप में उनका उत्तर देते हैं। कर्म भौतिक शरीर में स्थित पांच कर्मेन्द्रियों द्वारा होते हैं। उत्प्रेरकों का ग्रहण और मानव शरीर से व्यक्त होने वाली तदनुकूल प्रतिक्रियाओं का सतत् आदान-प्रदान ही ‘जीवन व्यापार’है। यह यातायात जब और जहां ठप हुआ, जीवन समाप्त हो जाता है।

धर्म एक मित्र-जैसा सिपाही है जो पूर्णत: सुखद और सफल जीवन प्राप्त करने के लिए मनुष्य के जीवन की गाड़ी को मार्ग-निर्देश करता है। बाह संसार की वस्तुयें प्रकृति-परिवत्र्तन के साथ निरंतर बदलती रहती हैं। सभी जीवधारी वातावरण और परिस्थितियों में होने वाले इन परिवर्तनों से प्रभावित होकर उनके शिकार बनते हैं। किन्तु केवल मनुष्य को ही ऐसी अद्वितीय क्षमता है जिससे वह विपरीत उत्प्रेरकों का शमन कर अपने से ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकता है जिससे समरसता और मधुरता स्थापित हो सके। यह लक्ष्य मन-बुद्धि के विचित्र उपकरण द्वारा ही प्राप्त होता है। संसार से स्वस्थ संबंध बनाये रखने और जीवन में आने वाले संकटों के चंगुल में न फंसने के लिए मन-बुद्धि को स्वस्थ और सशक्त रखना आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह है कि हमारा भावनायें पवित्र और हमारी विवेक बुद्धि सूक्ष्म और स्वच्छ होना चाहिए।

                साभार: जीवन ज्योति

स्वामी चिन्मयानन्द


 


 क्रोध


 

दो बातों का ध्यान रखें। एक, टी.वी. देखते हुए भोजन न करें। दो, अखबार पढ़ते हुए चाय न पिएं। आज के जीवन में ये दो जबर्दस्त बुराइयां हैं। आप इन्हे अविलम्ब सुधार लें क्योंकि जब आप टी.वी. देखते हुए  खाना खाते हैं। और अखबार पढ़ते हुए चाय पीते हैं तो आप सिर्फ खाना और चाय नहीं खाते-पीते बल्कि उस टी.वी. और अखबार में हिंसा, अश्लीलता और भ्रष्टाचार की खबरें होती हैं, उन्हें भी खा-पी जाते हैं। और फिर वे खबरें आपको अपने से बे-खबर कर देती हैं। अगर आम आदमी अपनी ये दो आदतें सुधार लें तो पूरे समाज व देश की आबो-हवा बदल सकती है।

क्रांतिकारी राष्ट्रसंत

मुनिश्री तरूणसागरजी महाराज


 

 

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