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जपें महामृत्युंजय

जपें महामृत्युंजय

धी श्री स्त्रीयम्
महा मृत्युंजय मंत्र
ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व:
ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमेव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ऊँ स्व: भुव: भू: ऊँ स: जूं हौं ऊँ!!

समस्त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।

महामृत्युंजय मंत्र के वर्णों (अक्षरों) का अर्थ
महामृत्युंजय मंत्र के वर्ण, पद, वाक्य, चरण, आधी ऋचा और सम्पूर्ण ऋचा – इन छ: अंगों के अलग-अलग अभिप्राय हैं। ऊॅँ त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताओं के द्योतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु, 11 रुद्र और 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 षट्कार हैं। इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियां महामृत्युंजय मंत्र से निहित होती हैं, जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं, साथ ही वह नीरोग, ऐश्वर्ययुक्त और धनवान भी होता है। महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम् समृद्धिशाली होता है। भगवान शिव की अमृतमयी कृपा उस पर निरंतर बरसती रहती है।

  • त्रि: ध्रुव वसु प्राण का द्योतक है जो सिर में स्थित है।
  • यम: अध्व वसु प्राण का द्योतक है, जो मुख में स्थित है।
  • ब: सोम वसु शक्ति का द्योतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
  • कम: जल वसु देवता का द्योतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
  • य: वायु वसु का द्योतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
  • जा: अग्नि वसु का द्योतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
  • म: प्रत्युष वसु शक्ति का द्योतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
  • हे: प्रयाग वसु मणिबन्धत में स्थित है।
  • सु: वीरभद्र रुद्र प्राण का द्योतक है। दक्षिण हस्त के अंगुली के मूल में स्थित है।
  • ग: शुम्भ् रुद्र का द्योतक है दक्षिणहस्त अंगुली के अग्र भाग में स्थित है।
  • न्धिम: गिरीश रुद्र शक्ति का मूल द्योतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
  • पु: अजैक पात रुद्र शक्ति का द्योतक है। बाम हस्त के मध्य भाग में स्थित है।
  • ष्टि: अहर्बुध्य्त रुद्र का द्योतक है, बाम हस्त के मणिबन्ध में स्थित है।
  • व: पिनाकी रुद्र प्राण का द्योतक है। बायें हाथ की अंगुली के मूल में स्थित है।
  • र्ध: भवानीश्वर रुद्र का द्योतक है, बाम हस्त अंगुली के अग्र भाग में स्थित है।
  • नम्: कपाली रुद्र का द्योतक है। उरु मूल में स्थित है।
  • उ: दिक्पति रुद्र का द्योतक है। यक्ष जानु में स्थित है।
  • र्वा: स्थाणु रुद्र का द्योतक है जो यक्ष गुल्फ में स्थित है।
  • रु: भर्ग रुद्र का द्योतक है, जो यक्ष पादांगुली मूल में स्थित है।
  • क: धाता आदित्य का द्योतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
  • मि: अर्यमा आदित्य का द्योतक है, जो वाम उरु मूल में स्थित है।
  • व: मित्र आदित्य का द्योतक है, जो वाम जानु में स्थित है।
  • ब: वरुणादित्य का बोधक है, जो वाम गुल्फा में स्थित है।
  • न्धा: अंशु आदित्य का द्योतक है। वाम पादंगुलि के मूल में स्थित है।
  • नात्: भगादित्य का बोधक है। वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
  • मृ: विवस्व्न (सूर्य) का द्योतक है जो दक्ष पाश्र्वि में स्थित है।
  • त्र्यो्: दन्दाददित्य का बोधक है। वाम पाश्र्वि भाग में स्थित है।
  • मु: पूषादित्यं का बोधक है। पृष्ठै भाग में स्थित है।
  • क्षी: पर्जन्य आदित्य का द्योतक है। नाभि स्थिल में स्थित है।
  • य: त्वणष्टान आदित्य का बोधक है। गुह्य भाग में स्थित है।
  • मां: विष्णु आदित्य का द्योतक है। यह शक्ति स्वरुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
  • मृ: प्रजापति का द्योतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
  • तात्: अमित षट्कार का द्योतक है जो हृदय प्रदेश में स्थित है।

पर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु, आदित्य आदि अपनी सम्पूर्ण शक्तियों सहित विराजित हैं। जो प्राणी श्रद्धा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग-अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्य हैं) उनकी रक्षा होती है।

मंत्रगत पदों की शक्तियां
जिस प्रकार मंत्रों में अलग-अलग वर्णों (अक्षरों) की शक्तियां हैं, उसी प्रकार अलग-अलग पदों की भी शक्तियां है।

  • त्र्यम्बकम्: त्रैलोक्य शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।
  • यजा: सुगन्धात शक्ति का द्योतक है जो ललाट में स्थित है।
  • महे: माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
  • सुगन्धिम्: सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
  • पुष्टि: पुरन्दिरी शक्ति का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
  • वर्धनम: वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
  • उर्वा: ऊध्र्देक शक्ति का द्योतक है जो हृदय में स्थित है।
  • रुक: रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
  • मिव: रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
  • बन्धानात्: बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
  • मृत्यो: मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
  • मुक्षीय: मुक्तिकरी शक्ति का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
  • मा: माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोनों जंघाओं में स्थित है।
  • अमृतात्: अमृतवती शक्ति का द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम् ।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रद्धायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत् ।

कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने वाली है। समस्त पाप एवं दु:ख, भय, शोक आदि का हरण करने के लिए महामृत्युंजय की विधि ही श्रेष्ठ है। महामृत्युजंय का पाठ करना लाभकारी एवम् कल्याणकारी होता है।

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