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पेशावर का पैशाचिक कृत्य आतंकियों को अच्छे-बुरे वर्गों में बांटने का परिणाम

पेशावर का पैशाचिक कृत्य आतंकियों को अच्छे-बुरे वर्गों में बांटने का परिणाम

By कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

पाकिस्तान में इतने आतंकी समूह हैं कि वहां की सरकार को भी शायद यह पता लगाने में वक्त लगता है कि यह हमला किस गिरोह ने किया है, लेकिन तहरीके तालिबान पाकिस्तान ने इसकी जिम्मेदारी लेकर सरकार का यह भार भी कम कर दिया। अफगानिस्तान में इस्लामी आतंकियों से लडऩे का दावा करने वाली अमेरिका की सरकार ने पिछले दिनों तालिबान को दो समूहों में बांट लिया था – अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान।

पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर प्रदेश के पेशावर शहर में इस्लामी आतंकवादियों ने वहां के सैनिक स्कूल पर हमला करके अध्यापकों और बच्चों समेत 140 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में 132 उस स्कूल के छात्र ही थे। आतंकवादी जब कक्षाओं में घुसकर छात्रों को गोलियां मार रहे थे तो जिन अध्यापकों ने इसका विरोध किया उनको भी उन्होंने जिंदा  जला दिया। सेना के जवानों ने सातों आतंकवादियों को मार गिराया, नहीं तो स्कूल के लगभग पांच सौ छात्र मारे जाते। मरने वाले 132 छात्रों के अतिरिक्त 120 छात्र ऐसे हैं जो आतंकवादियों की गोलियां से घायल होकर अस्पतालों में पड़े हैं।

वैसे तो अब पाकिस्तान में इतने ज्यादा इस्लामी आतंकवादी गिरोह बने हुये हैं कि इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि इन बच्चों को किस गिरोह ने मारा है, लेकिन रिकॉर्ड के लिये तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने इस स्कूल पर हमला करके यह अमानवीय पैशाचिक नृत्य किया है। पाकिस्तानी सेना के एक प्रवक्ता ने यह भी कहा है कि आतंकवादियों की रणनीति से लगता है कि वे स्कूल में छात्रों को बंधक बना कर, सरकार से अपनी कुछ मांगे मनवाने की नीयत से नहीं आये थे। उनकी रणनीति में स्कूल के छात्रों को सीधे-सीधे मारकर आतंक व्याप्त करना ही था। इस आतंकवादी हमले से आहत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस पैशाचिक हमले पर पाकिस्तान के साथ संवेदना प्रकट की है और हर सम्भव सहायता देने की पेशकश भी की है। भारत के अनेक स्कूलों में छात्रों ने पेशावर में मारे गये छात्रों की याद में मौन रखा। दुनिया भर के देशों ने इस हमले की निन्दा की है, उसमें अमेरिका भी शामिल है। इस कृत्य की निंदा की भी जानी चाहिये।

03-01-2015

पाकिस्तान में इतने आतंकी समूह हैं कि वहां की सरकार को भी शायद यह पता लगाने में वक्त लगता कि यह हमला किस गिरोह ने किया है, लेकिन तहरीके तालिबान ने अपने उपर जिम्मेदारी लेकर सरकार का यह भार जरुर कम कर दिया। शिनाख्त कर पाने में आ रही दिक्कत का एक कारण है। पिछले दिनों अमेरिका की सरकार ने, जो अफगानिस्तान में इस्लामी आतंकियों से लडऩे का दावा कर रही है, तालिबान को दो समूहों में बांट लिया था। अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान। अच्छे तालिबान वे हैं जो सरकार की योजना और इच्छानुसार काम करते हैं और बुरे तालिबान वे हैं जो अपनी इच्छा और योजना से काम करते हैं। पिछले दिनों जब अमेरिका की सरकार ने बहुत मेहनत करके अफगानिस्तान के कुल तालिबानों में से अच्छे तालिबानियों को छांट लिये थे और उनसे परोक्ष रुप से बातचीत भी प्रारम्भ कर दी थी। इससे नाराज होकर अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने यहां तक कह दिया था कि अमेरिकी सरकार तालिबान को अपनी योजना के अनुसार इस्तेमाल करती है और उसी के अनुसार उसे अच्छे-बुरे का तमगा देती है। यही स्थिति पाकिस्तान सरकार की है। उसने भी पाकिस्तान में काम कर रहे तालिबान का इसी तरीके से विभाजन किया है। जो आतंकवादी पाकिस्तान के इशारे पर जम्मू-कश्मीर में निर्दोषों की हत्या करते हैं, वे अच्छे तालिबान हैं। उनकी सुरक्षा करना और उनको पालना-पोसना पाकिस्तान सरकार अपना दीनी फर्ज समझती है। लेकिन, जो तालिबान पेशावर में स्कूल पर हमला करके निर्दोषों की हत्या करते हैं, वे बुरे तालिबान हैं। उनकी जितनी निन्दा की जाये, उतनी कम है। वैसे केवल रिकॉर्ड के लिये दर्ज कर लिया जाये, इन सभी तालिबान को जन्म, इनको प्रशिक्षण अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ने ही मिलकर दिया है। प्रशिक्षण देते वक्त वैचारिक आधार निश्चित किया गया कि इस्लाम खतरे में है और ये तालिबान इस्लाम की रक्षा के लिये चलायी जाने वाली तहरीक के मर्दे मुजाहिद हैं। फर्क केवल इतना ही हुआ कि पहले इन तालिबान को अमेरिका और पाकिस्तान की सरकार बताती थी कि इस्लाम का दुश्मन कौन है। एक बार अमेरिका और पाकिस्तान इस्लाम के दुश्मन की शिनाख्त कर लेते थे तो अपनी इस नई प्रशिक्षित सेना को उस दुश्मन पर छोड़ देते थे। अमेरिका को उन दिनों रुस इस्लाम का दुश्मन लगता था, इसलिये तालिबान वहां मोर्चा संभाले हुये थे, लेकिन पाकिस्तान को शुरु दिन से ही हिन्दुस्तान इस्लाम का दुश्मन नजर आ रहा था, इसलिये उसने इन आतंकी तालिबानों की एक खेप कश्मीर में भेजने के बाद हिन्दुस्तान के दूसरे शहरों में भी अपने आतंकवादी प्रयोग प्रारम्भ कर दिये। दिल्ली में संसद पर और बाद में मुम्बई पर 26/11 को हुआ हमला पाकिस्तान के इसी प्रयोग का फल था।

लेकिन, इस्लामी उन्माद की घुट्टी देकर तैयार की गई यह आतंकी सेना बहुत देर तक रोबोट की तरह तो इस्तेमाल हो ही नहीं सकती थी। इस नई इस्लामी तहरीक के कुछ तालिबानियों ने खुद भी फैसला करना शुरु कर दिया कि इस्लाम का दुश्मन कौन है? इस शिनाख्त में उनको अमेरिका ही इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन नजर आया। वैसे भी यूरोप में अब्राहम की संतानों के आपसी युद्धों का पुराना इतिहास है। एक बार इस बात की शिनाख्त हो गई कि अमेरिका ही इस्लाम का असली दुश्मन है तो यह शिनाख्त होते भी भला कितनी देर लगती कि अन्दरखाने में तो पाकिस्तान की सरकार भी इस्लाम की दुश्मन है, क्योंकि यह अमेरिका के साथ मिली हुई है। तब इस्लामी तहरीक की इस नई तालिबानी सेना की कुछ टुकडिय़ों ने इन्हीं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पेशावर में हुआ आतंकी हमला इसी का परिणाम है।

पाकिस्तान में फिलहाल प्रधानमंत्री के पद पर विराजमान नवाज शरीफ इस हमले से काफी गुस्से में हैं। होना भी चाहिये। ऐसा जघन्य काम निश्चय ही सजा-ए-मौत मांगता है। वैसे सेना का दावा है कि उन्होंने आक्रमण करने वाले सातों आतंकियों को मार दिया है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि उन आतंकियों ने स्वयं ही अपने आप को उड़ाया या सेना ने उनको मारा, क्योंकि सातों आतंकी अपने इर्द-गिर्द विस्फोटक पदार्थ बांधे हुये थे। हालांकि यही प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है। क्या पाकिस्तान सरकार दाऊद जैसे आतंकवादियों को पनाह और उन्हें सुरक्षा प्रदान कर, दूसरे आतंकियों से लड़ पायेगी? पाकिस्तान अभी तक आतंकवाद को स्टेट पॉलिसी के तौर पर अफगानिस्तान और हिन्दुस्तान पर आक्रमण के रुप में प्रयोग कर रहा है। उसने न तो अभी तक इसे नकारा है और न ही छोड़ा है।

मानव से ही भावी पीढ़ी सुरक्षित

डॉ. जगदीश गांधी

03-01-2015
पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल में तालिबानी आतंकवादियों द्वारा की गई 132 छोटे-छोटे बच्चों की नृशंस हत्या से एक बार फिर सारी मानवता शर्मसार हो गई है। पाकिस्तान के साथ-साथ सारी दुनिया के लोगों के हृदय को इस घटना ने झकझोर कर रख दिया है। आतंकवादियों का न तो कोई ईमान होता है न कोई नैतिक सिद्धांत। उनको तो खून-खराबा कर समाज में भय व्याप्त करना है, चाहे उसके लिए उनको मासूम बच्चों की ही हत्या क्यों न करनी पड़े। मुझे उन बच्चों की चीखें व निर्मम हत्याओं से इतना दु:ख हो रहा है कि इसके लिए जितना भी शोक प्रकट किया जाये, कम होगा। वास्तव में पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में 132 बच्चों की हत्या हो या भारत की संसद पर हमला हो या न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला, आतंकवादी कभी भी, कहीं भी हमला कर सकते हैं। आतंकवाद आज एक विश्वव्यापी बीमारी बन चुकी है और कोई एक सरकार चाहे वह भारत की हो, पाकिस्तान की हो या अमेरिका की, अकेले इस पर नियंत्रण नहीं कर सकती है।

मध्य एशिया की हालत दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। सीरिया में तो लगभग तीन साल पहले से ही गृहयुद्ध चल रहा है, जिसमें कई लाख लोगों ने पड़ोसी देशों में शरण ले रखी है। यही हाल इराक में है। अफगानिस्तान पहले से ही तलिबानी आतंक से ग्रस्त है। पाकिस्तान भी तालिबानी कहर से अछूता नहीं रह सका है। अब तो पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पदच्युत करने के लिये जबरदस्त आंदोलन चल रहा है। इसी तरह से कई उत्तरी अफ्रीकी देशों में किसी न किसी आतंकी संगठन का आतंक अपने चरम पर है। आतंकवादी बीच-बीच में अमेरिका, चीन, रूस और भारत में आतंकवादी विस्फोट कर आतंक मचाते रहते हैं। भारत में भी समय-समय पर अलग-अलग शहरों में विस्फोटों का सिलसिला चलता रहता है। हालांकि भारत सरकार व राज्य सरकारों द्वारा अब इस पर काबू पाने की हर संभव कोशिश की जा रही है।

हमारा विश्व विभिन्न संस्कृतियों, सभ्यताओं तथा विभिन्न धर्मों का है। भारत में अलग-अलग संस्कृति, धर्म और भाषाएं होते हुए भी हम सभी एक सूत्र में बंधे हुए हैं तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। इस प्रकार भगवान राम, कृष्ण, महावीर, ईसा, नानक, बुद्ध तथा बहाउल्लाह की यह सारी धरती है, जिनके जीवन शांति के लिए थे और उन्होंने विश्व भर में शांति का संदेश दिया था। हमारा मानना है कि एकता के बल पर ही अनेक राष्ट्रों का निर्माण हुआ है और प्रत्येक वर्ग में एकता के बिना देश कदापि उन्नति नहीं कर सकता। एकता में महान शक्ति है। राष्ट्रीय एकता का मतलब ही होता है, राष्ट्र के सभी घटकों में भिन्न-भिन्न विचारों और विभिन्न आस्थाओं के होते हुए भी आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे का बने रहना। राष्ट्रीय एकता में केवल शारीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें मानसिक, बौद्धिक, वैचारिक और भावनात्मक निकटता की आवश्यक है।

इस दुनियां में या तो पूरी अराजकता होगी जिससे सरकारी सत्ता बिखरेगी, राज्य टूटेंगे, अन्तर्राष्ट्रीय आपराधिक माफियाओं का उद्भव होगा, शरणार्थियों की संख्या कई लाखों में पहुंचेगी, आतंकवाद का प्रसार, नरसंहार और नस्लवाद एक परम्परा बन जायेगी या अमीर और गरीब, पश्चिमी एवं गैर-पश्चिमी, उत्तर या गैर उत्तरी, जो सदैव युद्ध को तत्पर रहेंगे या 193 राज्यों के एक राष्ट्रकुल एवं विश्व सरकार का निर्माण होगा। मनुष्य जाति की एकता की स्वीकृति यह मांग करती है कि सम्पूर्ण सभ्य संसार का पुन: निर्माण एवं असैन्यीकरण हो, इससे कम कुछ नहीं। एक संसार, जो जीवन के सभी सारभूत पक्षों में, अपनी राजनैतिक प्रणाली में, अपनी आध्यात्मिक आकांक्षाओं में, अपने व्यापार एवं अर्थ व्यवस्था में, अपनी लिपि और भाषा में जीवन्त रूप से एकता के सूत्र में बंधा हो और फिर इस संघ की सभी संघभूत इकाइयों की राष्ट्रीय विविधताओं की विशिष्टता अनन्त हो, तभी ‘ये निरर्थक विवाद, ये विनाशकारी युद्ध समाप्त हो जायेंगे’ और विश्व एक परिवार बनेगा।

वर्तमान में धरती मां नई सभ्यता के जन्म के पूर्व की प्रसव पीड़ा झेल रही हैं। यह समय हमारी धरती मां के एक टुकड़े को प्रेम करने का नहीं वरन् अब इस सारी धरती को एक करने का समय आ गया है। विश्व के दो अरब से अधिक बच्चों के सुरक्षित भविष्य का अभियान बने। हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि विश्व का प्रत्येक बालक मानव जाति की भलाई के संकल्प के साथ विश्व एकता तथा विश्व शांति का दूत बने। इसके लिए हमें परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिये कि हे ईश्वर! आप हमें यह आशीर्वाद दें कि एकता की ज्योति सारी पृथ्वी पर छा जाए। यह सारी सृष्टि परमेश्वर की है। यह विचार उसके सभी समुदाओं एवं राष्ट्रों के चिन्तन में अंकित हो जाये।

बदलते विश्व परिदृश्य के अनुरूप शिक्षा पद्धति में भी नवीनता व बदलाव लाने की महती आवश्यकता है, जो छात्रों को संकुचित राष्ट्रीयता, रंग, जाति-धर्म, भाषा से ऊपर उठकर वैश्विक स्तर पर सोचने, समझने व समस्याओं के रचनात्मक समाधान ढूंढने के काबिल बना सके। युद्ध के विचार सबसे पहले मनुष्य के मस्तिष्क में पैदा होते हैं। इसलिए युद्ध के मुहाने पर खड़े विश्व में शान्ति लाने के लिए मनुष्य के मस्तिष्क में सबसे पहले एकता तथा शान्ति के विचार उत्पन्न करने होंगे। मानव मस्तिष्क में एकता तथा शान्ति के विचार डालने की सबसे श्रेष्ठ अवस्था बचपन है। विद्यालय समाज के प्रकाश का केन्द्र है और प्रत्येक बालक विश्व का प्रकाश है। प्रत्येक बालक एक ओर जहां विश्व का प्रकाश है वहीं दूसरी ओर उद्देश्यपूर्ण शिक्षा के अभाव में बालक बड़ा होकर विश्व में अंधकार फैलाने का कारण भी बन सकता है। अत: सारे विश्व में उद्देश्यपूर्ण विश्व-एकता की शिक्षा को सबसे अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। यही विश्व की सभी समस्याओं का समाधान है।

हमारा मानना है कि दुनियां भर में फैले हुए आतंकवाद को केवल विश्व सरकार द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है। इस समस्या का केवल एक ही समाधान है कि विश्व स्तर पर ही एक नई विश्व व्यवस्था बनानी होगी। विश्व पुलिस जिसे किसी वीजा की जरूरत न पड़े ऐसे ही पुलिस के द्वारा सारे विश्व से आतंकवाद को समाप्त किया जा सकता है और यह काम एक विश्व सरकार के तहत ही सम्भव है। हमें विश्व कानून और विश्व न्यायिक व्यवस्था को इतना मजबूत बनाना है कि सभी देशों पर इसके नियम कानून प्रभावशाली रूप से लागू किया जा सके। इसलिए अब समय आ गया है कि सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को मिलकर एक विश्व पुलिस, विश्व संसद, विश्व संविधान एवं न्यायिक व्यवस्था बनाने के लिए देरी नहीं करनी चाहिए।

03-01-2015
वह जब तक आतंक को स्टेट पॉलिसी के तौर पर इस्तेमाल करता रहेगा, तब तक उसके लिये अपने देश के भीतर आतंकवादियों से लडऩा आसान नहीं होगा। आतंकवादी अच्छा या बुरा नहीं होता, वह केवल आतंकवादी ही होता है। पेशावर की घटना के बाद भी यदि पाकिस्तान सरकार इस तथ्य को अच्छी तरह समझ ले तो हो सकता है कि आगे से किसी दूसरे शहर को पेशावर बनने से रोका जा सके।
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