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बर्बर हत्याकांड

बर्बर हत्याकांड

By शैलेन्द्र चौहान

सरल शब्दों में यदि कहा जाए तो हिंसात्मक घटनाओं के माध्यम से लोगों में भय पैदा करना उन्हें आतंकित करना कहलाता है और यह कार्य आतंक कहलाता है। जब यह आतंक भयानक रूप से सब ओर फैल जाता है तो इसे ‘आतंकवाद’ कहते हैं।

16 दिसंबर को पाकिस्तान के पेशावर शहर में एक आर्मी स्कूल में हुए नृशंस आतंकी हमले में 141 लोग मारे गए। मरने वालों में 132 से ज्यादा मासूम बच्चे थे, जिनकी उम्र 9 से 14 वर्ष थी और 9 स्कूल के शिक्षक व कर्मचारी थे। इस घटना में 245 से अधिक बच्चे घायल हो गए। आतंकी, सिक्योरिटी फोर्स की वर्दी में आर्मी स्कूल में घुसे थे। आतंकियों ने स्कूल में घुसने से पहले बाहर खड़ी गाडिय़ों को अपना निशाना बनाया, जबकि फायरिंग और धमाकों के कारण स्कूल की इमारत को भारी नुकसान हुआ। आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली। पेशावर के आर्मी स्कूल पर हमला करने वाले आतंकवादी संगठन, ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ को कई कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों का साझा गठजोड़ माना जाता है। यह संगठन पाकिस्तान के अफगानिस्तान सीमा से सटे कबायली इलाकों (फाटा) में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। तालिबान के पाकिस्तान में सक्रिय तकरीबन 13 गुटों ने बैतुल्लाह महसूद के नेतृत्व में टीटीपी का गठन दिसंबर 2007 में किया था। संगठन घोषित तौर पर पाकिस्तान की सरकार का विरोध करता है और देश में शरीया लागू करने के इरादे जाहिर करता है। इसके अलावा संगठन अफगानिस्तान में मौजूदा नाटो सेनाओं पर भी निशाना साधता रहा है। सरल शब्दों में यदि कहा जाए तो हिंसात्मक घटनाओं के माध्यम से लोगों में भय पैदा करना उन्हें आतंकित करना कहलाता है, और यह कार्य आतंक कहलाता है। जब यह आतंक भयानक रूप से सब ओर फैल जाता है तो इसे ‘आतंकवाद’ कहते हैं। हम देख रहे हैं आज इसने संपूर्ण विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि विश्व का कोई भी राष्ट्र बहुत गंभीरता के साथ इसे खत्म करने का प्रयास नहीं कर रहा है, खास तौर से वे बलशाली देश जो महाशक्ति कहे जाते हैं। ये महाशक्ति परोक्ष रूप से कहीं न कहीं इस आतंक के सूत्रधार ही रहे हैं। यही कारण है कि इस अत्यंत भयानक बुराई का अंत होने के बजाय इसका विस्तार हो रहा है।

03-01-2015

कुछ अन्य आतंकी घटनाएं इस कड़ी में देखी जा सकती हैं। ग्यारह सितम्बर 2001 को अमेरिका में हुई ट्विन टावर की आतंकी घटना रही हो, तेरह दिसंबर 2001 को भारत की संसद पर हमला हो, 12 अक्टूबर 2002 में बाली (इंडोनेशिया) में बम विस्फोट, 16 मई 2003 में मोरक्को में, 27 फरवरी 2004 में फीलीपींस में, 11 मार्च 2004 को मैड्रिड में बम विस्फोट, 26 नवम्बर 2008 को ताज होटल मुंबई में हमला, 13 जुलाई 2011 को मुंबई में पुन: आतंकी विस्फोट और 7 सितम्बर 2011 को दिल्ली में भीषण विस्फोट, ये सब उदाहरण इस बात का संकेत देते हैं कि आतंकवाद की पहुंच कभी भी, कहीं भी, कैसे भी हो सकती है। खासकर 11 सितम्बर 2001 की घटना ने विकसित देशों के इस भ्रम को तोड़ दिया है कि वे आतंकवाद से सुरक्षित हैं। यह संपूर्ण विश्व के लिए एक चुनौती है। अत: इस समस्या के समाधान का प्रयास भी वैश्विक स्तर पर किया जाना आवश्यक है। आतंकवाद से निपटने के लिए विश्व स्तर पर कुछ कदम उठाना फायदेमंद हो सकता है, जैसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में आतंकवाद की रोकथाम के लिए सकारात्मक निर्णय लिए जाएं तथा आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से पूर्णत: बहिष्कार किया जाए। उनके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय सहायता भी पूर्णत: बंद कर दी जानी चाहिए। दूसरा सकारात्मक कदम यह भी हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक राष्ट्र यह स्वीकार करे कि वह आतंकवाद से लडऩे के लिए प्रतिबद्ध है तथा अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए न तो आतंकवाद को बढ़ावा देगा और न ही अपने देश को आतंकवाद का आश्रय स्थल बनने देगा। अगर कोई देश जान-बूझकर ऐसा करता है तो उसके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मोर्चाबंदी की जानी चाहिए। यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि मात्र ओसामा बिन लादेन, तालिबान, मुंबई हमले के आरोपी अजमल आमिर कसाब या कुछ आतंकवादी संगठनों का सफाया ‘आतंकवाद का सफाया’ नहीं है। यह संपूर्ण विश्व में अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में सक्रिय है। इसके सफाए के लिए विश्व के विभिन्न हिस्सों में मौजूद आतंकवाद के विविध स्वरूपों को पहचानना आवश्यक है। ध्यातव्य है कि एक सुन्नी इस्लामिक मूलवादी (फंडामेंटलिस्ट) आन्दोलन, जिसे तालिबान या तालेबान के नाम से भी जाना जाता है, इसकी शुरूआत 1990 से 1994 के बीच दक्षिणी अफगानिस्तान में हुई। तालिबान पश्तो भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ज्ञानार्थी (छात्र)। ऐसे छात्र, जो इस्लामिक कट्टरपंथ की विचारधारा पर यकीन करते हैं। तालिबान इस्लामिक कट्टपंथी राजनीतिक आंदोलन है। इसकी सदस्यता पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के मदरसों में पढऩे वाले छात्रों को दी जाती है। इन मदरसों का खर्च सऊदी अरब द्वारा दिया जाता रहा है। इस आंदोलन को अमेरिका और पाकिस्तान की पूरी शह मिली हुई थी। 1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान के अधिकतर क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। बाद में ये कट्टरपंथी अमेरिका पर भारी पडऩे लगे, तब अमेरिका की नींद खुली। अब पाकिस्तान पूरी तरह इनकी जद में है। दरअसल विश्व में कुछ इस्लामिक आतंकवादी संगठनों की सक्रियता के कारण आज आतंकवाद को इस्लाम संप्रदाय से जोड़कर देखा जाने लगा है।

पेशावर के शहीद बच्चों को ‘कीस’ की श्रद्धांजलि

अशोक पाण्डेय

16 दिसंबर को पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल के 132 बच्चों की निर्मम हत्या आतंकवादियों ने कर दी थी, जिसकी खबर सुनकर विश्व के सबसे बड़े आदिवासी आवासीय विद्यालय, कीस के 22 हजार 500 बच्चों ने शोक सभा बुलाकर उन शहीद बच्चों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उनकी आत्मा की चिर शांति के लिए गहरा शोक व्यक्त किया। शोक व्यक्त करनेवालों में किट-कीस के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत, कीस सोसाइटी और कीस के सभी शिक्षकगण एवं बच्चे आदि थे। सबसे पहले शोक प्रस्ताव पढ़ा गया, उसके उपरांत दो मिनट का मौन रखा गया। वहीं किट इण्टरनेशल स्कूल के बच्चों द्वारा अबोध बच्चों की आतंकियों द्वारा की गई निर्मम हत्या को सबसे बड़ा मानवीय अपराध मानकर शोक मनाये जाने की जानकारी दी गई है।

03-01-2015
अफगानिस्तान में सोवियत संघ को नीचा दिखने के लिए अमेरीका तालिबान की मदद करता है। ओसामा को आतंकवादी होने की ट्रेनिंग देता है। ईराक को मिटाकर वहां आतंवादियों को कदम रखने का मौका अमेरिका ने ही मुहैय्या कराया है। आज बगदाद पर एक आतंकवादी संगठन ‘इस्लामिक स्टेट’ काबिज हो गया है। इराक की हालत बेहद खराब है। रोज बम धमाके होते हैं, अनेकों लोग मारे जाते हैं। अब अमेरिका मूकदर्शक बन गया है। जाहिर है आज इस्लाम से आतंकवाद को अलग करना अत्यंत आवश्यक है, तभी आतंकवाद का सफाया करने में इस्लाम का सहयोग मिल सकेगा, लेकिन अमेरिका जैसे राष्ट्र दोहरी नीतियां अपनाने के कायल हैं। पश्चिमी देश इसे संस्कृतियों के संघर्ष के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। आतंक शब्द का जब भी जिक्र होता है स्वाभाविक रूप से ध्यान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल कायदा और तालिबान द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद पर जाता है। आज विश्व के सभी देश आतंकवाद को समाप्त करने के लिए प्रयासरत हैं और इसके लिए एक दूसरे को सहयोग भी कर रहे हैं, लेकिन इस सहयोग का उपयोग कितने सही तरीके से हो रहा है, यह देखना आवश्यक है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को अरबों डॉलर की सहायता राशि आतंकवाद से लडऩे के लिए दी जाती रही है, किन्तु पाकिस्तान ने हमेशा इसका उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया है। यह बात पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी ने भी स्वीकार की है कि अमेरिका द्वारा पकिस्तान को दी जा रही सहायता राशि का उपयोग पाकिस्तान भारत के विरुद्ध कार्य कर रहे आतंकी संगठनों की सहायता में खर्च करता रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि अमेरिका इससे परिचित है लेकिन वह पाकिस्तान को ऐसा करने से नहीं रोकता। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान को अलकायदा के खिलाफ अपनी सैन्य-शक्ति बढ़ाने के लिए अमेरिका की तरफ से 5 अरब अमेरिकी डॉलर दिए गए थे, मगर इस धनराशि का उपयोग उसने भारत के विरुद्ध हथियार खरीदने में किया। यूं भी अमेरिका बिना जांचे-परखे पाकिस्तान को अरबों डॉलर कि सहायता राशि देता आया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2001 से 2011 तक अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को लगभग 17 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि सहायतार्थ दी जा चुकी है। हालांकि ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी को देखने के बाद पाकिस्तान को 80 करोड़ डॉलर की सहायता स्थगित कर दी गई थी। यह मामला भारत और पाकिस्तान का ही नहीं, ऐसे सभी देशों से जुड़ा है, जहां नीतियों के दोहरेपन को दूर नहीं किया जाता। अमेरिका और उसके मित्र देश इस सम्बन्ध में एक और तो भारत का सहयोग करने का आश्वासन देते हैं, मगर हकीकत में वे ऐसा कुछ नहीं करते। यह बेहद चिंताजनक बात है। इस तरह आतंकवाद का सफाया एक मुश्किल काम होता जा रहा है।

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