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पाकिस्तान : सैन्य-नागरिक संबंधों की धूमिल होती तस्वीर

पाकिस्तान : सैन्य-नागरिक संबंधों की धूमिल होती तस्वीर

By सिग्फ्रीड ओ वोल्फ

नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री का पदभार (तीसरी बार) संभालने के तुरंत बाद ही यह सामने आ गया कि सरकार और सेना के बीच के संबंध उसी पुराने पैटर्न पर आधारित हैं, जो पहले से चलते आए हैं।सबसे पहले शरीफ ने सेना और नागरिक सरकार के बीच संबंधों में उल्लेखनीय सुधार करने का वादा किया। नए प्रधानमंत्री के परिप्रेक्ष्य के अनुसार यह अपने राजनैतिक एजेंडे को लागू करने, खासकर भारत और अफगानिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने, आर्थिक विकास को तेज करने और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने जैसे कामों के लिए नीति-निर्धारण की शक्ति का सरकार के पास होना जरूरी था।

क्या पाकिस्तान के लोक राजनेता सशस्त्र सेना के प्रभाव को रोकने में सफल हुए हैं, शायद नहीं। इस्लामाबाद में हाल ही हुए राजनीतिक उथल-पुथल से साबित होता है कि आघात की संभावना कम होने के बावजूद भी सिविल और मिलिट्री का पारस्परिक संबंध पुराने पैटर्न पर ही आधारित है।

पाकिस्तान, जो अपने अस्तित्व के आधे से भी ज्यादा समय तक सैन्य शासन के अधीन रहा, को एक प्रिटोरियन राज्य के क्लासिक उदाहरण के रूप में शामिल किया जा सकता है। मुल्क की सेना खुद को राष्ट्रीय संप्रभुता और नैतिक पवित्रता का अभिभावक मानती है। साथ ही वह राष्ट्रीय एजेंडे का मुख्य पहलकार और सामाजिक एवं राजनैतिक शक्तियों के बीच किसी भी संघर्ष में अपने आप को सबसे बड़ा मध्यस्थ मानती है। समय के साथ सेना ने देश के हर क्षेत्र में खुद को गहराई और पूरे विस्तार से समाहित कर लिया। आज वो देश की राजनीतिक नीति-निर्धारण प्रक्रिया या अपने कॉपोरेट हितों को सुरक्षित रखने के लिए किसी औपचारिक अधिकार पर निर्भर नहीं है। इसे इस तरह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान को सैन्य-नागरिक संबंधों के आलोक में ‘नागरिक सर्वोच्चता’ का कभी अनुभव नहीं रहा। समयानुसार और असामान्य परिस्थितियों के कारण (1965 और 1971 में भारत से युद्ध में हारने तथा बदनामी झेलने और 1988 में सैन्य तानाशाह जिया उल हक की असामयिक मृत्यु) बनी स्थिति में नागरिकोंके पास अपने सैनिकों और नीति-निर्धारण पर पर नियंत्रण कर राजनीतिक संस्थाओं को मजबूत करने के असाधारण मौके थे।

जो भी हो, लेकिन विडंबना यह रही है कि एक तरफ देश में लोकतांत्रिक बदलाव के नाम पर राजनैतिक हस्तक्षेप करने का प्रयास हमेशा सैन्य बलों ने किया, तो दूसरी तरफ लोकतांत्रिकरण के चरणों को काटकर छोटा करने का प्रयास भी हमेशा सेना के शीर्ष अधिकारियों ने किया। सेना पर लोक-नियंत्रण को संस्थागत रूप देने में वहां के राजनेता इसलिए नाकाम रहे क्योंकि नागरिकों के पास न ही पर्याप्त शक्ति के संसाधन थे और न ही उन्होंने राजनैतिक वर्चस्व को स्थापित करने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त नागरिक शासन हमेशा सरकार और विपक्ष के बीच अप्रतिबंधित और सतत सत्ता संघर्ष की विशेषता रही है। साथ ही साथ शासन की निरंकुश शैली, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार से युक्त यह विभिन्न राजनैतिक संस्थाओं के बीच भी वर्चस्व को उजागर करती रही है। इसके कारण ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुईं जिसमें राजनेताओं ने लोगों का समर्थन खो दिया। विकल्प के रूप में सेना ने ख्याति हासिल कर राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करने की नैतिक वैधता हासिल कर ली। इसके बाद सेना ने (जानबूझकर या अनजाने में) ऐसी मान्यता विकसित की कि नागरिक शासन न ही सुशासन देने वाली स्थायी सरकार बना सकती है और न ही देश की हित से संबंधित मामले को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा सकती है।

इस परिदृश्य के खिलाफ, नवाज शरीफ ने 2013 के आम चुनावों में बेहतर जीत हासिल की। एक नागरिक सरकार से दूसरी नागरिक सरकार को सत्ता सौंपने की पहली कामयाब कोशिश ने संकेत दिया कि अंतत: पाकिस्तान राजनीतिक स्थिरता के रास्ते पर बढ़ रहा है, खासकर ऐसे देश में जहां नागरिक सरकार और सेना के बीच संबंध कभी सामान्य नहीं रहे। यह भी सत्य है कि पाकिस्तानी सेना ने संविधान द्वारा निर्धारित सीमा रेखा से आगे बढ़कर 2008 और 2013 की चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया।

सेना ने नागरिक सरकार की नीति-निर्धारित के अनुरूप काम कर यह दिखाने का भी प्रयास किया कि सेना और नागरिक सरकार के बीच बेहतर समन्वय है, लेकिन शरीफ के प्रधानमंत्री का पदभार (तीसरी बार) संभालने के तुरंत बाद ही यह सच्चाई सामने आ गई कि सरकार और सेना के बीच के संबंध उसी पुराने पैटर्न पर आधारित हैं, जो पहले से चलते आए हैं। सबसे पहले शरीफ ने सेना और नागरिक सरकार के बीच संबंधों में उल्लेखनीय सुधार करने का वादा किया। नए प्रधानमंत्री के परिप्रेक्ष्य के अनुसार, अपने राजनैतिक एजेंडे को लागू करने, खासकर भारत और अफगानिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने, आर्थिक विकास को तेज करने और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने जैसे कामों के लिए नीति-निर्धारण की शक्ति का सरकार के पास होना जरूरी था। अपने प्रभाव को बढ़ाने के प्रयास में शरीफ ने सबसे पहले विदेश नीति पर अपनी प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने और रक्षा विभाग को अपने अधिकार क्षेत्र में लाने की कोशिश की। उनकी रणनीति की प्रमुख आधारशिला में आंतरिक सुरक्षा के लिए सेना की सैन्य कार्रवाई की मांग के बावजूद उन्होंने तालिबान के साथ वार्ता को आगे बढ़ाया।

03-01-2015

सेना के प्रति अपनी निष्ठा को दिखाने के लिए शरीफ ने दो वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की अनदेखी कर राहील शरीफ को सेना का प्रमुख नियुक्त किया। नियुक्ति की प्रक्रिया में सैन्य वरिष्ठता क्रम की अनदेखी को ऑफिसर्स कॉर्प में, खासकर निर्णय लेने वाली पाकिस्तान की सबसे शक्तिशाली संस्था कॉप्र्स कमांडर कॉन्फ्रेंस में सही नहीं माना जाता। इसके अलावा सेना विदेश नीति पर, खासकर अमेरिका, भारत और अफगानिस्तान के मामले में, अपनी पकड़  ढीली होने देना नहीं चाहती। यह उल्लेखनीय है कि अपने रक्षा बजट को बढ़ाने के औचित्य को सही ढंग से बताने (सिवाय तालिबान और अन्य चरमपंथी गुटों के लडऩे के) में असफलता के कारण सेना को नई दिल्ली के साथ अपनी निकटता बढ़ाने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि तालिबान मामले को जिस तरह से प्रधानमंत्री ने संभालने की कोशिश की, वह सामान्य मार्ग नहीं था। इसके कारण रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय बेहद नाराज हुआ। इसके बाद मतभेद उस समय और गहरा गए जब 1999 में शरीफ को हटाकर सत्ता पर कब्जा जमाने वाले पूर्व सैनिक तानाशाह परवेज मुशर्रफ के खिलाफ देशद्रोह के मामले को शरीफ ने आगे बढ़ाया। एक सेवानिवृत्त जनरल के साथ इस तरह के सलूक को सेना ने एक संस्था के स्वरूप पर प्रतिष्ठात्मक हमला माना।  सेना को यह भी लगा कि इससे सेना की जवाबदेही को आम लोगों के बीच कमजोरी के रूप में उछाला जा रहा है। अंतत: नागरिक सरकार और सेना के संबंध 2014 के पूर्वाद्र्ध में और भी खराब हो गए, जब यह साफ हो गया कि वार्ता के दौरान ही आतंकवादी गतिविधियों को संचालित करने वाले तालिबान के साथ शांति समझौता संभव नहीं है। तालिबान के साथ शरीफ की वार्ता और असैन्य समाधान निकालने के प्रयास को असफल होते देखा गया और इसे सेना द्वारा समय की बर्बादी माना गया।

ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में इतिहास खुद को दोहरा रहा है और मुल्क में नागरिक सरकार और सेना के संबंधों का भविष्य बदतर होता जा रहा है। शरीफ सरकार और सेना का आमने-सामने आने के कारण पिछली गर्मी में पाकिस्तान की राजनैतिक स्थिति में गंभीर उथल-पुथल मच गई। विपक्ष के नेता इमरान खान और ताहिर-उल-कादरी के नेतृत्व में 2013 के आम चुनाव में धांधली करने सहित सरकार के कुशासन के खिलाफ शरीफ के इस्तीफे की मांग करते हुए बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। राजनैतिक दलों के बीच जारी राजनैतिक गतिरोध ने सेना को अपने ‘नैतिक  जिम्मेवारी’ की याद दिलाते हुए राजनीति में सीधा और औपचारिक प्रवेश का मौका दे दिया। परिणाम यह हुआ कि राजनैतिक शांति और स्थायित्व के लिए खुद को तटस्थ तीसरी ताकत के रूप में प्रस्तुत करने में सेना कामयाब रही। लेकिन कई विशेषज्ञों द्वारा  सवाल पूछा गया कि शरीफ विरोधी आंदोलन में सेना ने क्या भूमिका निभाई? शरीफ द्वारा नागरिक सरकार के नियंत्रण को बढ़ाने की बात ध्यान रखी जाए तो शरीफ का शक्ति से परिपूर्ण होने का आधार पंजाब के निर्वाचन क्षेत्रों में उनका जनाधार (जिसे सेना द्वारा भी आर्थिक, राजनीतिक और प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण संसाधन मानती है) और आम चुनावों में मिली स्पष्ट बहुमत थी। कुछ विशेषज्ञों को संदेह है कि सेना पर्दे के पीछे आंदोलन के बाद उपजे हालातों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि शक्तिशाली शरीफ, जिनका सेना के साथ हमेशा ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है, ने सेना पर नागरिक शासन का वर्चस्व स्थापित करने के लिए रक्षा क्षेत्र और आंतरिक सुरक्षा की निर्धारित लालरेखा को पार करने का प्रयास किया था, जो केवल सेना के जनरलों के लिए सुरक्षित समझा जाता है। अंत में सुरक्षाबलों ने आंदोलन को खत्म करने के लिए हस्तक्षेप किया और शरीफ कुछ समय के लिए संकट से उबर गए। दूसरे परिप्रेक्ष्य में कोई भी व्यक्ति यह महसूस कर सकता है कि प्रधानमंत्री और सेना के बीच कुछ निश्चित मामले पर पॉवर-शेयरिंग अनुबंध हुए होंगे। लेकिन, राजनैतिक उथल-पुथल का समाधान निकालने के लिए सेना का हस्तक्षेप करना एक तरह का पुरस्कार होगा, जो एक बार फिर देश की नागरिक सरकार की संस्थाओं के लचीलापन और लोकतंत्र की गुणवत्ता की रूप में कीमत चुकाई गई होगी।

सच्चाई यह है कि सेना द्वारा सार्वजनिक रूप से संविधान की सर्वोच्चता के किए गए समर्थन को देश की राजनीति में जनरलों की अनुचित भागीदारी के विरोधाभास के रूप में नहीं देखा जा सकता। सेना ने एक बार फिर चुनी हुई सरकार की अकर्मण्यता, राजनैतिक स्थायित्व और बेहतर प्रशासन देने में नाकाम होने की ओर उंगली उठाकर खुद को लाभान्वित किया है। सेना ने शरीफ को बाहर करने के बजाय उन्हें कमजोर कर बता दिया कि देश में वास्तविक शक्ति का केन्द्र कौन है।

कहने की जरूरत नहीं कि सेना और प्रधानमंत्री शरीफ, दोनों पक्षों को यह मालूम है कि एक चुनी हुई सरकार के खिलाफ सैन्य विद्रोह का विकल्प क्षीण हो चुकी है। पहला, संवैधानिक बदलावों के कारण प्रधानमंत्री और उसकी सरकार को कमतर करने के लिए राष्ट्रपति (पहले प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने का अधिकार था) पद का इस्तेमाल करने के अवसर को सेना खो चुकी है, जैसा कि अतीत में होते आया है। दूसरा, वर्तमान में संसद में देश की सभी बड़ी प्रमुख पार्टियों के बीच यह सहमति है कि सरकार को त्यागपत्र देने के लिए विवश करने का एकमात्र उपाय अविश्वास प्रस्ताव है। इस कारण सरकार को गैर-संवैधानिक तरीके से त्यागपत्र देने के लिए बाध्य करने की स्थिति को काफी कम कर दिया है। तीसरा, न ही पाकिस्तान की जनता और न ही अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी सीधे सैन्य प्रशासन को स्वीकार करेगी।

इस बात को ध्यान में रखते हुए कि सेना उनका पर कतरने में सक्षम थी, नवाज शरीफ कुछ खामियों का सहारा लेकर निर्णय-क्षेत्र में सेना के जनरलों की शक्ति को संतुलित करने का प्रयास कर सकते हैं। इसलिए नागरिक सरकार को सर्वोच्च साबित करने के नवाज शरीफ के लक्ष्य की रणनीति से पीछे हटने के कोई संकेत नहीं है। इसे इस संकेत के तौर पर देखा जा सकता है कि सेना के साथ शक्ति की साझेदारी के लिए किसी भी मेल-मिलाप की नवाज शरीफ से उम्मीद नहीं है। संक्षेप में कहें तो परिस्थितियां वैसी ही रहेंगी, जैसी रही हैं। इस्लामाबाद की नागरिक सरकार और सेनाके बीच रस्साकशी जारी रहेगी, लेकिन इसकी मुख्य विशेषता सौहाद्र्र स्थापित करना नहीं हो सकता है।
(आईएसएन)

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