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ब्रह्मर्षि गुरुवानन्दजी (तिरुपति): साधना एवं सिद्धि पर आरूढ़ दिव्य संत

ब्रह्मर्षि गुरुवानन्दजी (तिरुपति):  साधना एवं सिद्धि पर आरूढ़ दिव्य संत

अध्यात्म, अहिंसा एवं योग की एक बड़ी प्रयोग भूमि भारत में आज जिस तरह का घना अंधकार छा रहा है। चहूं ओर भय, अस्थिरता एवं अराजकता का माहौल बना हुआ है। इस तरह जब-जब मानवता हृास की ओर बढ़ती चली जाती है, नैतिक मूल्य अपनी पहचान खोने लगते हैं, समाज में पारस्परिक संघर्ष की स्थितियां बनती हैं, तब-तब कोई न कोई महापुरुष अपने दिव्य कर्तव्य, चिन्मयी पुरुषार्थ और तेजोमय शौर्य से मानव-मानव की चेतना को झुंकृत कर जन-जागरण का कार्य करता है। भगवान महावीर हो या गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद हो या महात्मा गांधी समय-समय पर ऐसे अनेक महापुरुषों ने अपने ध्यान चिंतन के द्वारा समाज का समुचित पथदर्शन किया। अब इस जटिल दौर में सबकी निगाहें उन प्रयत्नों की ओर लगी हुई हैं, जिनसे मानव जीवन में धर्म को, सदाचार को, नैतिकता को, अहिंसा को एवं साधना को प्रतिष्ठापित किया जा सके। ऐसा प्रतीत होता है कि आत्म कल्याण एवं लोक कल्याण हेतु समर्पित योगविभूति श्री ब्रह्मर्षि गुरुवानन्द एक ऐसे ही महायोगी हैं, सिद्ध संतपुरुष हैं,  जिनकी सातों कुण्डलिनी जागृत है, अपनी योग साधना की शक्ति से न केवल अष्ट सिद्धियों व नव निधियों को प्राप्त किया है अपितु इच्छा शक्ति के भोक्ता भी हैं। वे इंसान से इंसान को जोड़ने का उपक्रम बनकर प्रेम, भाईचारा, नैतिकता, सांप्रदायिक सौहार्द एवं अहिंसक समाज का आधार प्रस्तुत करने को तत्पर है। आज देश में गहरे हुए घावों को सहलाने के लिए, निस्तेज हुई मानवता को पुनर्जीवित करने एवं इंसानियत की ब्यार को प्रवहमान करने के लिए ऐसे ही महापुरुष/अवतार की अपेक्षा है जो मनुष्य जीवन के बेमानी होते अर्थों में नए जीवन का संचार कर सकें। श्री ब्रह्मर्षि गुरुवानन्द एक संतपुरुष हैं, एक संवेदनशील महामानव हैं। धर्म जगत के वे ऐसे आविष्कारक हैं जो पुरातन सनातन ऋषि मुनियों की लुप्त हो रही सिद्धियों और शक्तियों को खोज कर पुन: सिद्ध किया और आज भी निरन्तर अपनी साधना व तपस्या से नई-नई सिद्धियों को खोज कर पुन: सिद्ध कर रहे हैं ताकि परमात्मा के प्रिय बच्चों को उनके कष्टों से निकाल कर कर्म कटवाते हुये परिवार से परमात्मा तक की यात्रा करवा सकें। संसार रूपी भवसागर से पार लगवाते हुये मोक्ष तक पहुंचा सकें।

श्री गुरुदेव की आध्यात्मिक यात्रा चमत्कारिक परिस्थितियों में अपने बचपन ही में शुरू हुई। उन्हें एक असाध्य बीमारी से बचाने के लिए योगीराज देवराह बाबा के आश्रम में लाया गया। तब देवराह बाबा ने बालक में दिव्यता एवं अलौकिकता को महसूस किया और भविष्यवाणी की कि यह बालक आध्यात्मिकता के शिखर को प्राप्त होगा और वह उस दिव्य ऊर्जा का उपयोग करते हुए वह मानवता की सेवा करेगा। आज यह भविष्यवाणी सत्य हो रही है।

श्री ब्रह्मर्षि गुरुवानन्द-वर्तमान युग के अवतरित महामानव है, जिन्हें हम देवर्षि, महर्षि और राजर्षि का एक समन्वित दिव्यरूप सकते हैं। क्योंकि जिनके आभामंडल में आने मात्र से ही शक्ति का रूपान्तरण हो जाता है। परमात्मा के साथ एकत्व ऐसे ही सिद्ध महापुरूषों के माध्यम से प्रकट होता है। गुरुदेव एक भास्कर सत्ता है, वे एक ऐसी महान् आत्मा है जिन्हें भूत भविष्य वर्तमान के कालचक्र का ज्ञान है। अनन्त आत्माओं को शुद्ध करने और उनमें चैतन्य को विकसित करने के लिये ही वे इस धरती पर अवतरित हुये हैं। उनके उपदेश और आशीर्वाद मानव जाति के जीवन की दिशा व दशा दोनों बदलने के लिये सक्रिय है। उन्होंने 170 से अधिक देशों की यात्राएं की हैं और भारत की गुरु-शक्ति एवं आध्यात्मिक ज्ञान को प्रचारित किया है। उन्हें वेदों, महाकाव्य, भगवद गीता, अन्य धार्मिक शास्त्रों और ज्योतिष का गहन ज्ञान है। वे जैन धर्म, सिख धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म और इस्लाम के भी मर्मज्ञ विद्वान हैं। गुरुदेव ने अनेक धर्म विश्व सम्मेलनों सहित कई अंतरराष्ट्रीय धार्मिक सम्मेलनों में भाग लिया है, जहां उन्हें उनकी उल्लेखनीय सेवाओं के लिये सम्मानित किया गया है। जर्मनी की ज्योतिष परिषद ने गुरुदेव को ‘ज्योतिष मर्मज्ञ’ से सम्मानित किया है।

निष्काम साधक, प्रबल पुरूषार्थ के धनी मानवीय मूल्यों के संवाहक ब्रह्मर्षि गुरुवानन्द एक ऐसी दिव्य ज्योति हैं, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मानव कल्याण हेतु समर्पित कर दिया। वे हमें नया धर्म प्रदान करने नहीं आये हैं वरन् धर्म के अन्तर्गत सही जीवन का मार्ग दिखाने आये हैं। ‘धर्म’ एक है विचार अनेक हो सकते हैं। धर्म जीवन का मार्ग है। उन्होंने अपने उपदेशों में कहा है ‘धर्म हमें बांधता कहां है, वह तो हर कर्मबंधनों से मुक्त करता है।’

मानव जाति के लिये ब्रह्मर्षि गुरुवानन्द की सेवायें असीम है। विश्व धर्म चेतना मंच के अन्तर्गत विभिन्न देशों की यात्रा के दौरान उनकी दिव्यवाणी से लाखों लोगों की जीवनशैली परिवर्तित हुई है, वे हिंसा और व्यसन का त्याग कर धर्म के मार्ग पर चलने के लिये संकल्पबद्ध भी हुये हैं। उनकी अनवरत साधनाओं को देखते हुये लगता है कि अब तो मानवता की सेवा ही उनका जीवन है। वे ईश्वर के बारे में ही नहीं अपितु ईश्वर को ही जानते हैं। यह सत्य है कि अल्प विश्वास आपको स्वर्ग तक ले जा सकता है, परन्तु सम्पूर्ण विश्वास स्वर्ग को ही आपके द्वार पर ले आता है।

तिरुपति के पास सी रामपुरम् में स्थित श्री ब्रह्मर्षि आश्रम में अनेक जन-कल्याण एवं आत्म कल्याण की गतिविधियां संचालित है। यह श्री सिद्धेश्वर तीर्थ अलौकिक सौन्दर्य बिखेरता, प्रकृति की गोद मे स्थित, चारों ओर पर्वतमालाओं से घिरा, दुर्लभ वृक्ष श्रृंखलाओं से आच्छादित है, सप्तगिरि की इस देवभूमि पर जहाँ सभी देवी देवता रमण करने आते हैं – इस पावन धारा को दक्षिण भारत का स्वर्ग कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसे गुरुदेव ने अपनी कठिन साधना व तपस्या से तपोभूमी बना दिया है। इस तीर्थस्थली की सकारात्मक ऊर्जा से एवं आबोहवा से आधि-व्याधि स्वत: दूर हो जाती है। भक्त अपनी सारी चिंताएं गुरु चरणों मे समर्पित कर स्वयं को अध्यात्म के रंग मे सरोबार कर चिर आनन्द का अनुभव करता है।

श्री ब्रह्मर्षि आश्रम के प्रांगण में सुबह शाम पूजाघर से गूंजती घंटियों की आवाज, आरती और भजनों की मधुर ध्वनि वातावरण को सदैव पवित्र स्पन्दन से भर देता है। श्री गुरु भगवन की आध्यात्मिक वाणी एवं दिव्य आशीर्वाद भक्तों के जीवन में नये प्राणों का संचार करती है। ‘वसुधैव् कुटुम्बकम’ की भावना से ओतप्रोत यह तीर्थस्थली सम्प्रदायवाद से मुक्त है। जातिवाद से परे हर धर्म हर सम्प्रदाय के लोग एक ‘विश्व परिवार’ की तरह यहां रहते हंै। आश्रम में सभी धर्म, जाति, वर्ग और वर्ण के लोग बिना भेदभाव के दिव्य जीवन का अनुभव करते हैं। चारों तरफ ‘ओम नम: शिवाय’, ‘नमोकार महामंत्र’ ‘बुद्धम् शरण गच्छामि’, ‘एक ओंकार सतनाम’ की ध्वनि गुंजायमान होती रहती है। वहां उपस्थित भक्त दैवीय शक्तियों का अनुभव करते हैं, आश्रम में हवन की भीनी-भीनी सुगंध का अहसास उन्हें रोमांचित करता है। भक्तों का मानना है कि कभी-कभी ऐसे दिव्य मानव पुण्य धरा पर अवतरित होते हंै। परमात्मा के साथ एकत्व ऐसे सिद्ध पुरुषों के माध्यम से प्रकट होता है। साधना शक्ति के महापुंज गुरुदेव ने जिन सिद्धियों को प्राप्त किया है, इनका उपयोग वे मानव कल्याण के लिए कर रहे हैं।

आश्रम में यों तो अनेक रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्यक्रम संचालित हैं, लेकिन बालिका कल्याण के लिये ‘बालिका पढ़ाओ-बालिका बचाओ’ अभियान के अन्तर्गत एक लाख बालिकाओं को पढ़ाया जा रहा है। निकट भविष्य में इस कार्यक्रम को देशभर में विस्तारित किया जाएगा। आश्रम की संरचना ‘विश्व धर्म परिवार’ के रूप में की गयी है जहां सभी धर्म के देवताओं के मन्दिर बनाये जायेंगे। वर्तमान में आश्रम में भगवान शिव मंदिर, एक विशाल प्रार्थना हॉल, कई गेस्ट हाउस, एक पूरी तरह सुसज्जित रसोईघर और जैन तीर्थंकर और अन्य महान आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के नाम पर कई योजनाएं संचालित है, जिनमें गौशाला आदि हैं। एक महालक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण पूरा हो चुका है और एक तरह का ध्यान केंद्र और ब्रह्मेश्वर शिव स्वर्ण मंदिर का निर्माण शुरू होने वाला है। भविष्य की योजनाओं में कई अतिरिक्त मंदिरों का निर्माण, एक अस्पताल, एक मेडिकल कॉलेज, एक इंजीनियरिंग कॉलेज, योग केंद्र, एक प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र, एक धार्मिक पुस्तकालय और एक संग्रहालय शामिल हैं।

आप एक ऐसे उच्च कोटि के महान योगी, प्रवचनकार, मंत्रविद्, ज्योतिष मर्मज्ञ, भाष्यकार हैं, जिनकी जीवन यात्रा का प्रत्येक चरण साधना की सौरभ और उजाले से ओत-प्रोत हैं, जिनकी पारदर्शी चेतना क्षितिज के उस पार पहुंच चुकी है जहां केवल दिव्यता एवं अलौकिकता के दर्शन होते हैं। आप सघन साधना से शक्ति संपन्न बनकर सम्पूर्ण राष्ट्र को शक्ति संपन्न बनाने के लिये प्रयासरत हैं। आपने साधना की गहराइयों में उतरकर नया सत्य उपलब्ध किया है। अपनी ऊर्वर मेधा से मानवता की धरती पर साधना की मंदाकिनी प्रवाहित की है। आपके आध्यात्मिक नेतृत्व से  हिन्दू समाज ही नहीं, संपूर्ण मानवता लाभान्वित हो रही है।

 

ललित गर्ग

 

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