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अमरनाथ यात्रियों पर हमला और धारा 370

अमरनाथ यात्रियों पर हमला और धारा 370

जुलाई के दुसरे सप्ताह में इस्लामिक जिहादियों ने अमरनाथ यात्रियों से भरी बस पर हमला कर दिया जिसमें आठ लोगों की मौत और उन्नीस लोग जख्मी हो गये। पिछले कुछ समय से घाटी में लगातार जिहादी गतिविधियां और अलगाववादियों के द्वारा उथल-पुथल मचाने जैसी घटनायें घट रही हैं। लेकिन अमरनाथ यात्रियों पर हुआ यह हमला किसी झटके से कम नहीं है। क्योंकि इतिहास पर नजर डाले तो घाटी में तीर्थयात्रियों को हमेशा से कड़ी सुरक्षा प्रदान की गई है। लेकिन हाल में हुई घटना से ऐसा लगता है कि  उस सुरक्षा तंत्र में छेद हो चुका है। संभवत: हमारे तीर्थयात्रियों को जिस सुरक्षा के वातावरण की आदत थी वह एक मिथ्या मात्र थी जिसे जिहादियों ने उजागर कर दिया। पहले ये जिहादी भी एक दुसरे की आस्था का सम्मान करते थे और कभी भी तीर्थयात्रियों पर हमले नहीं करते थे लेकिन इस बार उन्होंने भी अपने अंदर की मानवता को तार-तार कर दिया। चाहे कुछ भी कारण हो लेकिन घाटी अमरनाथ  तीर्थयात्रियों के लिये सुरक्षित नहीं है। देश के किसी दूसरे राज्य में यदि इस प्रकार की अमानवीय तथा कानून की धज्जियां उड़ाने वाली घटनायें होती तो धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता। इसके लिए राष्ट्रपति को पिछले एक दशक की किसी भी एक दिन की खबरों पर नजर डालनी चाहिए। फिर उसके बाद धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं, ताकि वहां कानून व्यवस्था बनाई रखा जा सके।

चूंकि धारा 370 लगने के कारण कश्मीर दूसरे राज्यों से अलग है, जहां पर धारा 356 के साथ-साथ केन्द्र के कई नियमों को लागू नहीं किया जा सकता। यदि घाटी में राष्ट्रपति शासन लगाना है तो इसके लिये राज्य सरकार से भी सहमती लेनी पड़ेगी। जिस प्रकार से राज्य सरकार द्वारा अलगाववादियों को समर्थन और केन्द्र को द्वेश के भाव से देखा जा रहा हैं, इससे यह बिल्कुल स्पष्ट होता है कि भले ही घाटी की स्थिति कितनी ही खराब क्यों न हो जाए लेकिन यहां कोई राष्ट्रपति शासन  नहीं लगाया जाएगा। अत: घाटी में स्थिरता लाने का सबसे आसान उपाय है धारा 370 को हटाना। देश की जनता का भी मानना है कि कश्मीर से धारा 370 को हटाया जाए। यदि धारा 370 को घाटी से हटाया जाता है तो कश्मीर की स्थिती का जायजा केन्द्र भी ले सकता है जो घाटी के सुरक्षा और सुशासन को भी सुनिश्चित करेगा।

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दुर्भाग्य से धारा 370 के हटने के पश्चात घाटी देश के नियंत्रण से बााहर चली जाएगी। कानूनन घाटी से धारा 370 के हटने के बाद भारत का कश्मीर पर से कानूनी अधिकार खत्म हो जायेगा। केशवनंद भारती मामले में जब संविधान पर चर्चा हुई थी तब उसमें यह कहा गया था कि संविधान के गठन के समय प्रत्येक राज्यों ने अपने राज्य के नियमों पर नियंत्रण करने का अधिकार केन्द्र को दिया। लेकिन धारा 370 के कारण कश्मीर ने अपने कुछ ही अधिकारों को भारतीय संविधान के अंदर रखा। अत: बिना धारा 370 के भारत का कश्मीर पर कानूनन हक खत्म हो जायेगा और उसके पश्चात कश्मीर को अपने नियंत्रण में लेने का केवल एक ही रास्ता होगा, कश्मीर पर सेना द्वारा कब्जा करना। जब कश्मीर को सेना अपने कब्जे में ले लेगी तो इसे संविधान की धारा 3 के तहत नये राज्य का नाम दिया जाएगा, जिससे कश्मीर में आसानी से नयी विधानसभा का निर्माण, नये रूप से सीमा का रेखांकन और सबसे महत्वपूर्ण धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकेगा।

बिल्कुल ही, यह सैन्य ताकत से अधिकृत राज्य माना जाएगा। लेकिन इसके बाद घाटी को देश के अन्य राज्यों की तरह देखना संभव हो पाएगा। लेकिन इसमें भी कई सारी कठिनाईयां हैं। घाटी को सैन्य ताकत से अधिकृत करने पर अलगाववादियों की मांग को उचित ठहराया जाने लगेगा। भारत के उपर साम्राज्यवाद का ठप्पा लगाया जाने लगेगा और इस बार अलगाववादियों के पास प्रमाण होगा। यदि अभी बिना किसी सैन्य कब्जे के बावजूद अलगाववादी घाटी में नीच हरकत करने से बाज नहीं आते तो सैन्य नियंत्रण के बाद कश्मीर का क्या हाल होगा, यह अनुमान लगाना भयावह है।

ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत का पक्ष कमजोर पड़ जायेगा। दुनिया की नजर में भारत एक लोकतांत्रिक, शांत और स्वतंत्र देश से एक साम्राज्यवाद देश के रूप में जाना जाने लगेगा। हमारे इस कारनामे से चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को भी मौका मिल जाएगा जो पंजाब और पुर्वोत्तर में अपनी हरकतें करना आरंभ कर देंगे, जो हमें फिर पुरानी स्थिति में वापस ला खड़ा कर देगा।

घाटी में जिहाद और अलगाववाद नियंत्रण से बाहर है और इसमें केंद्र भी प्रत्यक्ष रूप से दखल नहीं दे सकता है। अत: कश्मीर में शांति लाने के लिये एक राजनीतिक सुधार लाने की आवश्यकता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी घटनाओं के बीच कश्मीर जल रहा है।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं)

आकाश कश्यप

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