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बंगाल में तुष्टिकरण अपने चरम पर

बंगाल में तुष्टिकरण अपने चरम पर

पिछले कुछ वर्षो से बंगाल के कई मुस्लिम बहुल क्षेत्र एक के बाद एक दंगे की चपेट में आते रहे हैं, चाहें कालियाचक हो या फिर धुलागढ़ में हुई हिंसा। इन सभी घटनाओं में सोशल मीडिया का भी अहम रोल रहा हैं। हाल ही में बंगाल के बशीरहाट में भयंकर हिंसात्मक दंगा हुआ जिसका एकमात्र कारण एक सत्तरह वर्षीय  हिंदु बच्चे द्वारा सोशल मीडिया पर ‘मक्का-मदीना’ से संबन्धित पोस्ट डालना था। इस पोस्ट के बाद वहां के स्थानीय मुस्लिमों ने सोशल मीडिया का प्रयोग कर भारी संख्या में भीड़ को इकट्ठा किया और हिन्दू समुदाय पर हमला करना आरंभ कर दिया, जिसमें कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस दंगे के कारण लगभग दस दिनों तक आगजनी होती रही। पुलिस पर भी हमले किये गये। इन सबके बावजूद ममता बनर्जी ने केन्द्रीय बल को यहां आने से मना कर दिया।  इस घटना को संज्ञान में लेते हुए भाजपा ने सेंट्रल डेलिगेशन टीम को दंगाग्रस्त बशीरहाट भेजा जिसे बीच में ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया। यह डेलिगेशन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के निर्देश पर दंगाग्रस्त इलाके में जांच करने के लिए जा रहा था। इस प्रतिनिधिमंडल में सांसद मीनाक्षी लेखी, ओम माथुर और सत्यपाल सिंह जैसे भाजपा के प्रमुख नेता थे। भाजपा इस मुद्दे को पूरे देश भर में ‘ममता हटाओ, बंगाल बचाओ’ जैसे नारों की सहायता से प्रवासी बंगाली समुदाय के पास पहुंचने का प्रयास कर रही है। सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि एक ओर जहां बंगाल जल रहा था, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में पूर्ण रूप से व्यस्त थी। ममता बनर्जी का मानना है कि ये सभी घटनायें भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर करवायी जा रही हैं। वैसे ममता बनर्जी का यह रवैया कोई नया नहीं है, वह शुरू से ही इस प्रकार की राजनीति से जुड़ी रही हैं। अल्पसंख्यक इस देश का अभिन्न हिस्सा हैं और इस बात को भारतीय जनता पार्टी भी स्वीकार करती है। लेकिन अभिन्नता का मतलब भिन्न होना नहीं होता। अपने ही देश में किसी दूसरे देश की विचारधारा को थोपना नहीं होता। अपने संविधान से हटकर पर्सनल लॉ जैसे अलग कानून बनाना नहीं होता। फिर भी यदि ममता बनर्जी ऐसे संगठनों को अपनी छांव में रखने से पीछे नहीं हटती है तो वो कहीं ना कहीं बंगाल के उन उदारवादी विचारों को मानने वाली जनता के मतों से खिलवाड़ कर रहीं है जिसने उनको दोबारा सत्ता पर बिठाया। यदि पिछली कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो हमें ममता बनर्जी की राजनीतिक धुरी का पता आसानी से चल जाएगा।

 

Fresh violence erupted in Basirhat subdivision in North 24 Parganas district as shops were burnt and houses vandalised

बंगाल में अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा वहां के हिन्दुओं पर यह कोई पहला जानलेवा हमला नहीं है। पिछले वर्ष 3 जनवरी को मालदा जिले के कलियाचक में भी हिन्दू समुदाय तथा वहां की पुलिस पर उग्र भीड़ ने जानलेवा हमला किया और पुलिस स्टेशन सहित कई लोगों के घरों में आग लगा दी। वहां तो पुलिस को ही अपनी जान बचाने के लिये भागना पड़ा। ध्यान देने वाली बात यह है कि बंगाल में आम नागरिकों के साथ-साथ वहां का कट्टर अल्पसंख्यक समुदाय जो धीरे-धीरे बहुसंख्यक होने की ओर अग्रसर हो रहा है वह कश्मीर के अलगाववादियों के नक्शे-कदम पर चलते हुए पुलिस पर हमला कर रहा है, जो कहीं न कहीं एक गंभीर परिणाम की ओर निर्दिष्ट करता है। यदि हम 2011 में हुई जनगणना पर नजर डालें तो बंगाल के तीन जिले  मुर्शिदाबाद (47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिन्दू), मालदा (20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिन्दू) और उत्तरी दिनाजपुर (15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिन्दू) में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या हिन्दू समुदाय से अधिक हो चुकी है। वहीं जहां पूरे भारत में हिन्दू समुदाय की जनसंख्या वृद्धि में दशमलव सात प्रतिशत की कमी आई है, बंगाल में हिन्दू  समुदाय की जनसंख्या में 1.94 प्रतिशत की सबसे अधिक कमी आई है। पूरे भारत में जहां मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में 0.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है वहीं बंगाल में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में सबसे अधिक 1.77 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

बंगाल में हो रहे जनसंख्या बदलाव के बहुत सारे कारण हैं। पहला कारण उच्च तथा मध्यवर्गीय शिक्षित बंगाली हिन्दू समुदाय का बंगाल में रोजगार न होने के कारण रोजगार की तालाश में मुंबई, दिल्ली और लखनऊ जैसे शहरों में तेजी से पलायन है। इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में वृद्धि का कारण बांग्लादेश से हो रही तेजी से घुसपैठ तथा मुस्लिम समुदाय की शिक्षा में कम रुचि होना है जो परिवार नियोजन को अपने पंथ के चश्मे से देखने के लिये मौलवियों द्वारा बाध्य कर दिये जाते हैं जो उन्हें आधुनिकता को अपनाने से वंचित करता है। जिस प्रकार बंगाल में मदरसों के नाम पर मस्जिदों का निर्माण बेहिसाब हो रहा है, यह कहीं न कहीं बंगाल को धर्म-परिवर्तन के द्वारा बड़ी तेजी से एक मुस्लिम बहुल राज्य बनाने की तैयारी है। यह हम पहले ही कश्मीर में देख चुके है।

बंगाल में बर्धमान, 24 परगना सहित अन्य जगहों पर हुए बम ब्लास्ट को यदि ध्यानपूर्वक देखें तो इन सभी धमाकों में तृणमूल कांग्रेस के ही सदस्य लिप्त पाये गये। बंगाल में जो भी पाकिस्तानी एजेन्ट पाया जाता रहा है वो भी तृणमूल कांग्रेस का स्थानीय कार्यकर्ता ही होता है।  ये सारी चीजें कहीं न कहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की विचार-धारा पर ही प्रश्न खड़ा करती हैं जो अपने आप को पंथनिरपेक्ष होने का ढिंढोरा पीटती है। अभी हाल ही में कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम नूर रहमान बरकती, जो ममता बनर्जी के करीबी हैं, ने देश को बांटने तक की बात कह दी थी, जिस पर भी ममता बनर्जी ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी। हालांकि कई संगठनों के विरोध के बाद उनको  मस्जिद के इमाम पद से हटा दिया गया।

ये घटनायें यदि इसी प्रकार निरंतर होती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब बंगाल को भी कश्मीर जैसे हालात से गुजरना पड़ेगा। यह समय की मांग है कि ममता बनर्जी अपने अंदर से तुष्टीकरण के भूत को बाहर का रास्ता दिखायें। आज उनकी तुष्टीकरण की ही राजनीति है जिसके चलते बंगाल में औद्यौगीकरण खत्म होता जा रहा है। आम शिक्षित बंगाली दूसरे राज्यों में नौकरी की तलाश में भागने को मजबूर है।

 रवि मिश्रा

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