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चिटफंड कंपनियों का कहर

चिटफंड कंपनियों का कहर

By कोलकाता से संजय सिन्हा

देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए चिटफंड कंपनियों की वजह से लाखों लोगों का नुकसान हुआ है। हाड़तोड़ मेहनत के बाद पाई-पाई इकट्ठा करके चिटफंड कंपनियों में जमा कराने वाले ज्यादातर लोगों के पैसे डूब गए।

पूरे देश में 87 चिटफंड कंपनियों पर लगभग एक लाख करोड़ रूपए के घोटाले का आरोप हैं। तमाम नियम-कानूनों को ताक पर रखकर इन कंपनियों ने बाजार से ‘पैसे’ उठाए, लेकिन परिपक्वता के बाद भी लोगों को उनके खून-पसीने की कमाई को नहीं लौटाए। कई कंपनियों ने तो परिपक्वता-अवधि से पहले ही कार्यालय बंद कर दिए। विरोध के बावजूद भी निवेशकों को उनके पैसे नहीं मिले। गौरतलब है कि 87 घोटालेबाज चिटफंड कंपनियों में से 73 कंपनियां पश्चिम बंगाल की हैं। इन कंपनियों ने पश्चिम बंगाल के अलावा आसपास के राज्यों के लाखों लोगों को पहले तो सब्जबाग दिखाए, इसके बाद उनके पैसे लेकर चंपत हो गए। अभी भी कई चिटफंड कंपनियां पश्चिम बंगाल में सक्रिय हैं। अगर इन पर नकेल नहीं कसा गया तो अधिक रिटर्न के लालच में लोग फिर फंसेंगे और फिर पुलिस, सिस्टम और सरकार को कोसेंगे।

अस्सी के दशक में चिटफंड कंपनियों ने यहां अपना पांव पसारना शुरू किया था। संचिता, ओवरलैण्ड, वेरोना और रेनेसां जैसी कंपनियों ने लोगों को अधिक रिटर्न का लोभ देकर फंसाना शुरू किया। लिहाजा हजारों लोग इनके चंगुल में फंसते चले गए। ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों ने रिटायरमेंट के बाद मिली पूरी राशि इन कंपनियों में लगा दिए, ताकि उन्हें अधिक रिटर्न मिल सके। मेहनत-मजदूरी करने वाले एवं व्यवसायी वर्ग के लोगों ने भी मेहनत से कमाए गए रूपये कंपनियों में जमा कराए, लेकिन ज्यादा कमाई का लालच उन्हें ले डूबा। इस तरह की कंपनियां अपने एजेंटों को चालीस प्रतिशत तक कमीशन बांट देती हैं। ऐसे में निवेशकों को परिपक्वता के बाद लगभग दुगुनी रकम लौटाना कतई आसान नहीं है।

03-01-2015

80 और 90 के दशक में हुए लंबे घोटाले के बाद इस तरह की लगभग सभी चिटफंड कंपनियों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया और फरार हो गईं। फलस्वरूप कई एजेंटों और निवेशकों ने खुदकुशी तक कर ली। वर्षों की जमापूंजी एक झटके में खत्म हो गई। पुलिस और अदालत के दरवाजे खटखटाए गए, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ और न ही निवेशकों को उनके पैसे वापस मिल पाए। पश्चिम बंगाल से शुरू हुई चिटफंड कंपनियों ने रसूख कायम करने के लिए मीडिया के क्षेत्र में भी प्रवेश करना शुरू किया। इसके अलावा चाय बागान से लेकर क्रिकेट एवं फुटबॉल के मैदान तक निवेश करने लगे। कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों की भी फंडिंग की जाने लगी, ताकि उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिल सके। भोली-भोली जनता को ठग कर इन कंपनियों के अधिकारी वीआईपी की तरह जीने लगे। जब निवेशकों को पैसे लौटाने की बारी आई तो इन कंपनियों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया और फरार हो गर्इं। हालांकि निवेशकों के दबाव के बाद लगातार इन कंपनियों के अधिकारियों की गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन लचर कानून-व्यवस्था का फायदा उठाते हुए वे लोग जल्दी छूट भी गए। इसमें निवेशकों का कुछ खास भला नहीं हो पाया। उस समय इन कंपनियों ने लगभग 200 करोड़ का चूना लगाया। इसके बाद पश्चिम बंगाल के तत्कालीन वित मंत्री असीम दासगुप्ता ने चिटफंड कंपनियों के खिलाफ रूख कड़ा किया और लगाम लगाया, लेकिन 10 साल बाद एक बार फिर से चिटफंड कंपनियों ने पनपना शुरू किया। एक के बाद एक, दर्जनों चिटफंड कंपनियां फिर से कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं। सारधा, रोजवैली प्रयाग यूरो, राहुल ग्रुप, विश्वामित्र परिवार, बासिल आदि दर्जनों छोटी-बड़ी चिटफंड कंपनियां अस्तित्व में आर्इं। इसके बाद फिर से लोगों को अधिक रिटर्न का लालच दिया जाने लगा। अधिक रिटर्न के लोभ में लोग फंसने लगे और पुराने घटनाक्रम को भुलाकर लोग इन कंपनियों में पुन: पैसे लगाने लगे। 2004 से लेकर 2011 तक ये कंपनियां शिखर पर रहीं, इसके बाद घोटाले की खबरें आनी शुरू हो गर्इं। 10 हजार करोड़ के सारधा घोटाले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। निवेशकों ने हो-हल्ला मचाना शुरू किया तो दबाव में आकर दूसरी कंपनियों ने भी मैदान छोड़कर भागना शुरू कर दिया, क्योंकि ये कंपनियां शुरू से ही निवेशकों के पैसे लौटाने के मूड में नहीं थीं। हां अपनी साख बढ़ाने के लिए कई बार अपने एजेंटों और बिचौलियों को उपहार जरूर बांटे गए, क्योंकि मार्केट से रूपए लाने का काम एजेंटों के जरिए ही होता है और कंपनियों की तालाबंदी के बाद सबसे ज्यादा फजीहत भी एजेंटों की ही होती है।

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भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा का कहना है कि चिटफंड कंपनियों को सबसे ज्यादा प्रश्रय तृणमूल कांग्रेस ने दिया। मीडिया से लेकर निर्माण और फुटबॉल मैदान में निवेश दिखाकर निवेशकों को लुभाया गया। कंपनी के बोर्ड में राजनीति, मनोरंजन एवं नौकरशाहों से लेकर खिलाडिय़ों को शामिल किया गया, जिससे इन पर लोगों का भरोसा बढ़ा। दूसरी तरफ प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि चिटफंड कंपनियों को वाम फ्रंट के शासनकाल में प्रश्रय मिला। विरोधी पार्टियां नाहक ही तृणमूल कांग्रेस को बदनाम कर रही हैं।

इन बयानबाजियों के बीच सारधा घोटाले ने जबर्दस्त तूल पकड़ा और फिलहाल दो केन्द्रीय जांच एजेंसियां, सी.बी.आई एवं प्रवर्तन निर्दशालय (इडी) अलग-अलग तरीके से इसके जांच-कार्य में लगे हुए हैं।

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दस हजार करोड़ का सारधा घोटाला
वर्ष 2013 में सारधा ग्रुप के चेयरमैन सुदीप्त सेन के फरार होने की खबर सामने आने के बाद सारधा घोटाला सामने आया। सारधा ग्रुप ने अरबों की संपति अर्जित की थी। काफी रूपए सुदीप्त सेन ने विभिन्न क्षेत्रों में लगा रखे थे। करीब 10 हजार करोड़ रूपए के सारधा घोटाले की जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर शुरू हुई तो परत-दर-परत उघडऩा शुरू हो गया। सारधा ग्रुप के मालिक सुदीप्त सेन, देबयानी मुखोपाध्याय एवं कुणाल घोष को इसमें आरोपी बनाया गया। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय एवं सी.बी.आई. ने कई हस्तियों से पूछताछ की। भविष्य में कई और हस्तियों से इस मामले में पूछताछ की जा सकती है। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के परविहन मंत्री मदन मित्रा की गिरफ्तारी सहित सांसद सृंजय बोस एवं असम के पूर्व स्वास्थय मंत्री हेमंत विश्व शर्मा सहित कई लोगों से पूछताछ की गई। मदन मित्रा का नाम सारधा ग्रुप के साथ-साथ एक अन्य चिटफंड कंपनी आई-कोर के साथ भी जुड़ रहा है। सीबीआई जल्दी ही सारधा ग्रुप की ब्रांड एंबेसडर एवं बांग्ला फिल्मों की अभिनेत्री सह सांसद शताब्दी रॉय से भी पूछताछ करेगी। शताब्दी वीरभूम से तृणमूल कांग्रेस की सीट पर सांसद हैं। जांच एजेंसियों को पता चला है कि सारधा चिटफंड कंपनी के विकास में शताब्दी रॉय की महत्वपूर्ण भूमिका थी। बतौर ब्रांड एंबेसडर उन्होंने ज्यादा से ज्यादा लोगों को सारधा कंपनी में निवेश करने को प्रेरित किया। इसके बदले उन्हें कंपनी से एक मोटी रकम दी जाती थी।

मुख्यमंत्री की पेंटिग्ंस को लेकर भी सवाल
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा बनाई गई पेंटिग्ंस को सारधा ग्रुप ने करोड़ों रूपए में खरीदे। इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। भाजपा नेता सिद्धार्थनाथ सिंह का कहना है कि ममता बनर्जी ने अपनी पेंटिंग्स सारधा ग्रुप को क्यों बेची? यह भी एक तरह का रिश्वत है। उन्होंने मुख्यमंत्री पर दागियों को सांसद बनाने का भी आरोप लगाया है। उधर ममता के करीबी माने जाने वाले पेंटर शुभ प्रसन्ना पर भी जांच की तलवार लटक रही है। ईडी अधिकारियों का कहना है कि शुभ प्रसन्ना को कई बार तलब किया गया, लेकिन वे हाजिर नहीं हुए।

सारधा घोटाले की गूंज लोकसभा में भी खूब सुनाई दी। हिमाचल प्रदेश से भाजपा के सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा है कि सारधा मामले से पश्चिम बंगाल सरकार भी जुड़ी हुई है। काले धन को लेकर टीएमसी के सांसद काले लिबास में संसद के बाहर प्रदर्शन करते हैं, हांडी नृत्य करते हैं, लेकिन उनका दामन खुद पाक-साफ नहीं है। चुटकी लेते हुए अनुराग कहते हैं कि सारधा घोटाला अब तक का सबसे बड़ा चिटफंड घोटाला है। यह मैं नहीं टीएमसी के पूर्व सांसद कुणाल घोष कह रहे हैं। कुणाल घोष ने कहा है कि मैं तो छोटा हूं, बड़ी मलाई खाने वाला तो कोई और है। मुख्यमंत्री की पेंटिग्ंस 1.86 करोड़ रूपए में सारधा गु्रप द्वारा खरीदे जाने पर भी अनुराग ने सवाल उठाया।

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हाल ही में कोलकाता में हुई भाजपा की सभा में तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने यहां तक कहा कि बर्दवान विस्फोट में भी सारधा का पैसा लगा है। ऐसा नहीं होता तो ममता बर्दवान विस्फोट के आरोपियों को बचाने की कोशिश नहीं करती। उन्होंने केन्द्रीय जांच एजेंसी का विरोध क्यों किया? शाह ने कहा कि ममता ने सिंगुर में 1200 किसानों के लिए अनशन किया था, लेकिन सारधा घोटाले में 17 लाख लोगों की पूंजी चली गई।

उधर ईडी ने रोजवैली समूह के 2,631 बैंक खाते सीज कर लिए हैं। इन खातों में 295 करोड़ रूपए जमा थे।

घोटालेबाजों को बनाया सांसद – नजरूल
पूर्व आईपीएस अधिकारी डॉ. नजरूल इस्लाम ने अपनी किताबों में तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी पर करारा प्रहार किया है। हाल में उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। अंग्रेजी में, ‘हर डिसऑनेस्टी’ तथा बांग्ला में ‘आईपीएस जीवनेर उप्लब्धिर जंत्रणा’। दोनों किताबों में नजरूल इस्लाम ने सत्तारूढ़ पार्टी पर संगीन आरोप लगाए हैं। नजरूल का दावा है कि उन्होंने 13 जुलाई 2012 में ही राज्य सरकार को सारधा घोटाले की जानकारी दे दी थी। उस समय वह एडीजी (टे्रनिंग) के पद पर तैनात थे। उन्होंने मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखना चाहा था, पर तत्कालीन डीजी ने उनके पत्र को मुख्यमंत्री को फॉरवर्ड करने से मना कर दिया था। इसके बाद उन्होंने मुख्य सचिव को पत्र भेजा, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई और चिटफंड कंपनियां दोनों हाथों से लोगों को लूटती रहीं। नजरूल इस्लाम ने अपने पत्र में सारधा के साथ-साथ रोजवैली, अलकैमिस्ट सहित लगभग 13 चिटफंड कंपनियों के अवैध धंधे का जिक्र किया था। डॉ. इस्लाम ने साफ तौर पर कहा कि बगैर पुलिस और राजनीतिज्ञों की मदद के जालसाजी का काम इतने बड़े पैमाने पर मुमकिन नहीं है।

केन्द्र के इशारे पर काम कर रही है सीबीआई – ममता
प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि चिटफंड कंपनियों के पनपने के पीछे केन्द्र सरकार का भी हाथ है। जब ये चिटफंड कंपनियां राज्य में अपना पैर पसार रही थीं, तो सेबी क्यों सोई हुई थी। उस समय क्यों नहीं कोई कार्रवाई की गई। टीएमसी ने तो चिटफंड कंपनियों की करतूतें उजागर कीं। हालांकि इन कंपनियों का विस्तार राज्य में वाम फ्रंट के शासनकाल में हुआ था। उस समय केन्द्र में कांग्रेस एवं भाजपा दोनों की सरकार थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि चिटफंड कंपनियों के खिलाफ जो कानून है वह भी केन्द्र सरकार के अधीन है। यहां एक बात बताते चलें कि राज्य सरकार ने चिटफंड कंपनियों की जांच के लिए श्यामल कमीशन का गठन किया था, लेकिन उसने अपनी अवधि पूरी कर ली। राज्य सरकार ने 500 करोड़ रूपए मुआवजे के लिए दिए, लेकिन इससे कुछ नहीं हुआ। प्रभावितों को अब तक इंसाफ नहीं मिल पाया है।

सोसाइटी के नाम पर हो रही है ठगी
सरकार द्वारा चिटफंड कंपनियों पर नकेल कसे जाने और निवेशकों की नाराजगी को देखते हुए इस धंधे के खिलाडिय़ों ने अब नए तरीके से लोगों को ठगने का काम शुरू कर दिया है। नन-बैंकिंग कंपनियों की तर्ज पर अब ‘मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी’ (एमएससीएस) के जरिए लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल, झारखण्ड और बिहार सहित दूसरे कई राज्यों में इस तरह की को-ऑपरेटिव सोसाइटी सक्रिय हैं। चिटफंड या सोसाइटी से जुड़े लोग ग्रामीण क्षेत्रों को अपना निशाना बनाते हैं, जहां गरीबी और निरक्षरता होती है। रोज कमाने-खाने वाले साधारण किस्म के ग्रामीण, बैंकों में रूपए जमा कराने के झंझट से बचने के लिए चिटफंड कंपनियों में पैसे जमा करवाते हैं। इन कंपनियों के एजेंट उनके घरों और दूकानों से पैसे संग्रह करने की सहूलियत देने के साथ-साथ अधिक रिटर्न पाने का लालच भी होता है।

को-ऑपरेटिव सोसाइटी, नन-बैंकिंग ऐक्ट के तहत नहीं आते। इस तरह की संस्थाओं को आम जनता से किसी स्कीम के जरिए पैसे लेने का कोई अधिकार नहीं होता है, इसलिए ये लोग बड़ी चालाकी से पहले 5 या 10 रूपए लेकर लोगों को सदस्य बनाते हैं, फिर अपनी स्कीम से जोड़ लेते हैं। इस तरह की संस्थाएं आवास या जमीन संबंधी योजनाओं के जरिए लोगों को वित्तीय फायदे दिखाती हैं, फिर कुछ समय बाद सब समेट कर फरार हो जाती हैं। मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी का पंजीयन कृषि मंत्रालय के तहत केन्द्रीय रजिस्ट्रार से करवाया जाता है। ऐसा करने से इन पर भारतीय रिजर्व बैंक और सेबी (सिक्यूरिटी ऐण्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) का नियंत्रण पूरी तरह से खत्म हो जाता है। ऐसी संस्थाओं पर को-ऑपरेटिव ऐक्ट के तहत सभी नियम लागू होते हैं। मल्टी स्टेट फॉर्मूले को अपनाकर केन्द्रीय रजिस्ट्रार से निबंधन कराने के कारण इन्हें एक साथ कई राज्यों में काम करने की छूट मिल जाती है। ये लोग राज्य सरकार को भी ये जानकारी नहीं देते हैं कि इनके कार्यालय किन-किन जिलों में हैं, जबकि नियमानुसार इन्हें प्रत्येक वर्ष ऑडिट करवा कर इसकी रिपोर्ट केन्द्रीय रजिस्ट्रार को भेजना होता है। लिहाजा इस तरह की संस्थाएं बड़ी चालाकी से जालसाजी कर रही हैं।

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