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भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 औद्योगिक प्रगति में बाधा?

भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 औद्योगिक प्रगति में बाधा?

By डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल

जहां तक प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का प्रश्न है, यह मुद्दा भी समुचित सरकारों के पास है कि वे सीमा तय करें कि कितनी जमीन अधिग्रहण होने पर पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थापन आवश्यक है। राज्य सरकारें अपने कैबिनेट निर्णय से समुचित अधिसूचना जारी करके यह सीमा समय पर परिवर्तन कर सकती हैं।

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनव्र्यवस्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 को लेकर इतनी बहस हो रही है, शायद स्वतन्त्रता के पश्चात् अन्य किसी अधिनियम पर इतनी चर्चा नहीं हुई होगी, क्योंकि जब यू.पी.ए.-2 सरकार यह अधिनियम संसद के सामने लाई तो यह कहा गया कि यह अधिनियम कृषकों एवं भूमि मालिकों के हितों की रक्षा हेतु है, जबकि वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार इस अधिनियम को औद्योगिक प्रगति में बाधा मानती है एवं उसमें आवश्यक संशोधन करना चाहती है, ताकि भारत की वर्तमान आर्थिक उन्नति सम्यक् गति पकड़ सके।

इस अधिनियम का उद्देश्य यह है कि औद्योगीकरण, अनिवार्य व संरचनात्मक सुविधाओं के विकास और शहरीकरण के लिए भू-स्वामियों तथा अन्य प्रभावित परिवारों को कम से कम बाधा पहुंचाए बिना भूमि अर्जन के लिए मानवीय, सहभागी, सूचनाबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जा सके, जो  संविधान के अधीन स्थापित स्थानीय स्वशासी संस्थाओं और ग्राम सभाओं के परामर्श से सुनिश्चित करने तथा उन प्रभावित परिवारों को, जिनकी भूमि ली गई है या लिए जाने की संभावना है या जो ऐसे अर्जन से प्रभावित हुए हैं, न्यायोचित और उचित मुआवजा देने और ऐसे प्रभावित व्यक्तियों के लिए, उनके पुर्नवास और पुनव्र्यवस्थापन के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए कि अनिवार्य भूमि अर्जन का कुल परिणाम ऐसा होना चाहिए कि प्रभावित व्यक्ति ऐसे विकास में भागीदार बनें, जिससे अर्जन के बाद की उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके तथा उससे सम्बन्धित या उसके आनुषांगिक विषयों की पर्याप्त व्यवस्था हो।

निम्नलिखित मुख्य बिन्दुओं को लेकर इस अधिनियम के संशोधन की वकालत की जा रही है:-

  • सामाजिक समाघात निर्धारण में अत्यन्त विलम्ब होगा।
  • निजी कम्पनियों के लिए 80 प्रतिशत एवं पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी वाली परियोजनाओं के लिए 70 प्रतिशत भू-स्वामियों की सहमति प्राप्त करना कठिन।
  • पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थापन करना कठिन होगा।
  • भूमि-अधिग्रहण में मुआवजे की राशि अत्याधिक होने से परियेाजनाओं पर खर्च अधिक होगा, जो उनसे आमदनी करके नहीं वसूला जा सकेगा।

इन सभी संशयों का अधिनियम में उत्तर है। अधिनियम में यह व्यवस्था है कि सामाजिक समाघात निर्धारण की प्रक्रिया भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के साथ-साथ चल सकती है।

इसके पूर्व सभी भूमि स्वामियों को पहले से पता ही नहीं चलता था कि उनकी भूमि सरकार द्वारा अधिगृहित होने जा रही है। कोई नोटिस उनके क्षेत्र में लगा दिया जाता था जो सभी भूमि स्वामी नहीं पढ़ पाते थे विशेषत: जो गांव में नहीं रहते। अब ग्राम सभा की मीटिंग के माध्यम से सभी को यह ज्ञात होगा तथा वे परियोजना के लाभ एवं हानि पर विचार कर सकेंगे। फिर विभिन्न धाराओं के तहत सरकार समुचित सामाजिक समाधान निर्धारण अध्ययन की छूट भी दे सकेगी।

पूर्व में भी प्राइवेट कम्पनियों के लिए अपवाद स्वरुप जमीन अधिगृहीत की जाती थी। अब यह अधिक होने लगा है। अत: भूमि सुधारों के क्षेत्र में यह आवश्यक है कि 80 प्रतिशत न हो तो 70 प्रतिशत भूमि स्वामियों की सहमति हो। इसी प्रकार पब्लिक-प्राइवेट परियोजनाओं में यह सीमा 70 प्रतिशत से कम करके 50 प्रतिशत की जा सकती है, क्योंकि कुछ भूमि स्वामी इस प्रकार की परियेाजनाओं में निहित स्वार्थ के लिए बाधा पहुंचा सकते हैं। फिर धारा 40 के अंतर्गत तो किसी सहमति की आवश्यकता ही नहीं। सरकार निर्णय लेकर तुरन्त ही राष्ट्र एवं जनहित में भूमि अधिग्रहण कर सकती है।

जहां तक प्रभावित परिवारों के पुर्नवास का प्रश्न है, यह मुद्दा भी सरकारों के पास है कि वे सीमा तय करें कि कितनी जमीन अधिग्रहण होने पर पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थापन आवश्यक है। राज्य सरकारें अपने कैबिनेट निर्णय से समुचित अधिसूचना जारी करके यह सीमा समय पर परिवर्तन कर सकती हैं।

अंतिम बिन्दु अवश्य ही विचारणीय है, क्योंकि भूमि स्वामियों को उनकी जमीन के वर्तमान बाजार दर से कम से कम ढ़ाई गुना मुआवजा मिलेगा। पर यदि विचार किया जाय कि यह लम्बी अवधि में परियोजना से प्रभावित लोगों का सहयोग प्राप्त करने के लिए आवश्यक है, तो यह परियोजना के हित में ही होगा, क्योंकि कोई भी परियोजना स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना सफल नहीं हो सकती। यदि यह दर अधिक हुई तो प्राइवेट कम्पनियों को लोग स्वयं ही कम दरों में अपनी जमीनें बेच देंगे। इस अधिनियम में यह बार-बार दोहराया गया है कि परियोजना के लिए अपेक्षित भूमि केवल न्यूनतम क्षेत्र के अर्जन के लिए प्रस्तावित हो। यदि केवल यह प्रावधान ही कार्यकारी हो, तो अधिकांश समस्याएं मिट जायेंगी। परियोजना के नाम अत्यधिक भूमि अधिग्रहीत होती है, जो वर्षों अनुपयोगी पड़ी रहती है।

अधिनियम में व्यवस्था है कि प्राइवेट कम्पनियां स्वयं जमीन खरीद सकती हैं तथा समुचित सरकारों द्वारा निर्धारित सीमा के बाहर जमीन खरीदने पर ही उन्हें पुनर्वास की व्यवस्था करनी होगी।

अत: सारांश रुप में अधिनियम, 2013 में ऐेसे प्रावधान नहीं हैं, जिससे आर्थिक-प्रगति में बड़ी बाधा हो। समुचित सरकारें अपने-अपने स्तर पर अधिनियम में संशोधन करके उन अड़चनों को दूर कर सकती हैं तथा अधिग्रहीत भूमि का दुरुपयोग होने पर उन्हें और कठोर बना सकती हैं।

(लेखक भारतीय प्रशसानिक सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं, जो प. बंगाल सरकार के भूमि सुधार आयुक्त थे।)

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