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ये कैसी टीस!

ये कैसी टीस!

By अम्बा चरण वशिष्ठ

विपक्ष का ऐसा व्यवहार कोई नया नहीं है। वह तो सदा ही दोहरे मानदण्ड  अपनाता रहा है। गुजरात विधानसभा अभियान के दौरान 2007 में जब कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ तक कह दिया था। तब हमारे सेक्यूलर व उदारवादी महानुभावों को यह भाषण ‘हेट स्पीच’ नहीं लगा। न ही इससे उनके कोमल दिल में चुभन हुई। पर जनता ने अपना फतवा अवश्य सुना दिया।

इस में दो राय नहीं कि व्यक्ति, विशेषकर राजनेताओं, को अपनी वाणी पर लगाम कस कर रखनी चाहिये। समझदार ठीक ही कहते हैं कि मुंह खोलने से पहले सोच लेना जरूरी है। हम जानते हैं कि वाणी से निकला तीर लौट कर आ ही नहीं सकता है। चाकू का घाव समय बीतने के साथ भर जाता है, लेकिन जुबान का घाव कभी नहीं भरता। वह समय-समय पर याद आता रहता है और जख्म हरा हो जाता है।

सच्च यह भी है कि आदमी गलतियों का पुतला है। वह गलती करता रहता है। जो काम करेगा, जो बोलेगा उससे गलती तो होगी ही।

यह बात सच उतरती है केन्द्रीय राज्यमंत्री  साध्वी निरंजन ज्योति पर, जिन्होंने दिल्ली की एक  जनसभा में कह दिया कि आने वाले चुनाव में मतदाता को रामजादों और हरामजादों में से किसी एक का चुनाव करना है। बाद में साध्वी ने स्पष्टीकरण दिया कि भारत में सभी भगवान राम की संतान हैं और बाकी सब वह हैं जिन्होंने पूजा की पद्धति बदल ली, पर हैं सभी भारतीय ही।

इस पर संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा मच गया। मंत्री द्वारा खेद प्रकट कर देने के बावजूद भी सदन की कार्रवाई कई दिन चलने नहीं दी गई। मंत्री ने कहा कि उनकी मन्शा किसी के दिल को आघात पहुंचाने की नहीं थी। वित्तमंत्री अरूण जेटली व बाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी गुहार बेकार गई कि मामले को अधिक तूल न दिया जाए और सदन की कार्रवाई चलने दी जाए।

विपक्ष मंत्री की बलि लेने पर अडिग है, त्यागपत्र या बर्खास्तगी। विपक्ष और मीडिया ने तो मंत्री के इस कथन को ‘हेट स्पीच’ (घृणा फैलाने वाला वक्तव्य)ही बना डाला। उन्होंने कहा कि मंत्री का यह कथन उनकी संविधान की रक्षा करने की शपथ के विपरीत है। उन्होंने तो मंत्री के विरूद्ध आपराधिक मामला तक बना डालने की मांग कर दी।

विपक्ष का ऐसा व्यवहार कोई नया नहीं है। वह तो सदा ही दोहरे मानदण्ड अपनाता रहा है। गुजरात विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान 2007 में जब कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ तक कह दिया था। तब हमारे सेक्यूलर व उदारवादी महानुभावों को यह भाषण ‘हेट स्पीच’ नहीं लगा था, न ही इससे उनके कोमल दिल में चुभन हुई थी। बाद के चुनावों में जनता ने अपना फतवा अवश्य सुना दिया।

विपक्ष व कुछ मीडिया भी इस मुद्दे पर एक ही धरातल पर खड़े दिखते हैं। राजनेता इसका राजनीतिक लाभ बटोरने में लगे हैं तो मीडिया इस विवाद को हवा देकर अपनी टीआरपी को उछालने में। डंडे से लगातार पीट कर वह एक मरे हुये घोड़े को खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं।

‘जादे’ उर्दू भाषा का शब्द है जिसे हिन्दी भाषा में भी प्रयुक्त किया जा रहा है। शाहजादे (राजा-महाराजा की संतान), साहिबजादे (उच्च  घराने की संतान) और जादे को और शब्दों के साथ जोड़कर कई प्रकार का अर्थ निकाला जाता है और विभिन्न संदेश देने का प्रयास भी किया जाता है। यह भी सच्च  है कि कई बार इन शब्दों का प्रयोग उपहास उड़ाने के लिये भी किया जाता है। ऐसे ही शब्द हरामी और हरामजादे भी हैं।

03-01-2015

रामजादे का अर्थ है भगवान राम की संतति, वंशज। राम भारत के करोड़़ों लोगों के लिये भगवान हैं और वह उनको अपना परम् पिता मानते हैं। संसार के हर धर्म के अनुयायी – ईसाई, मुस्लिम तथा अन्य सभी-अपने आपको अपने ईश्वर की संतान मानते हैं। कोई इस विश्वास को चुनौती नहीं देता। भारत हिन्दुओं का देश रहा है जिसमें किसी को भी, यहां तक कि अपने परिवार में भी, अपनी पूजा पद्धति अपनाने या बदलने की पूरी छूट है। फिर भी सभी हिन्दु ही रहते हैं। अन्य किसी धर्म में ऐसी स्वतंत्रता नहीं है।

मुस्लिम और अंग्रेज आक्रमणों के बाद ही भारत में कुछ हिन्दुओं ने अपनी पूजा पद्धति बदल ली। हिन्दू समाज ने उनके इस निर्णय का आदर किया। ऐसी स्थिति में रामजादे शब्द के प्रयोग से किसी को क्यों कोई आपत्ति हो जब भारत के सभी हिन्दू अपने आपको भगवान राम की संतान मानते हैं। इस तथ्य को कौन नकार सकता है कि सभी भारतीय ईश्वर की संतान हैं, वह चाहे किसी भी पूजा पद्धति के अनुयायी हों।

शब्दकोश में हरामजादे शब्द का अर्थ दुष्ट, धूर्त व हरामी है। यह एक ऐसा शब्द है जिसे लोग अपनी प्रतिदिन की भाषा में हर किसी व्यक्ति विशेष के प्रति विशेषण के रूप में प्रयोग करते हैं। गुस्सा होने पर तो प्राय: पिता भी अपने बेटे को हरामजादा कह बैठते है। साध्वी ने तो हरामजादे व रामजादे शब्दों का प्रयोग कर केवल ईश्वर की संतान व धूर्त-दुष्टों के बीच भेद उजागर करने का प्रयास किया है। क्यों… ऐसा करना कोई पाप या अपराध है? क्या विरोधी दल देश की जनता को यह समझाना चाहते हैं कि इस देश में कोई धूर्त, दुष्ट या हरामी नहीं है? ऐसी स्थिति में क्या  जनता का आह्वान करना भी पाप व अपराध है कि वह ईश्वर की संतति/वंशजों और धूर्त-दुष्टों के बीच में से किसी का चुनाव करे?

हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के यह शब्द हमारे कानों में आज भी गूंजते रहते हैं: ‘आराम हराम है’। क्या इसमें भी कुछ बुरा है?

इसी प्रकार हलाल भी आम प्रचलित एक उर्दू शब्द है। हम सब इसका अर्थ जानते हैं। हलाल की कमाई और किसी पशु को हलाल कर देने का अर्थ एक नहीं है।  गुस्से में व्यक्ति कई बार चेतावनी देते हुये कह बैठते है कि मैं तुझे हलाल कर रख दूंगा। उसका अर्थ हत्या नहीं, उससे भी आगे कुछ वीभत्स है, पर कुछ लोगों को हलाल एक शालीन शब्द व कार्य लगता है।

वस्तुत: यह हमारे जनतंत्र व सेक्यूलरिज्म की ही विडंबना है कि संख्या में देश में आज हिन्दू 80 प्रतिशत से भी अधिक होने के बावजूद भी गर्व से नहीं कह सकते कि मैं हिन्दू हूं। यदि कहें तो वे सांप्रदायिक हैं। इसके विपरीत सभी अल्पसंख्यक यदि गर्व से अपने आपको अपने धर्म का अनुयायी कहें तो वह शांतिप्रिय और सेक्यूलर हैं।

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