ब्रेकिंग न्यूज़ 

भाजपा का बढ़ता प्रभाव

भाजपा का बढ़ता प्रभाव

पिछले कुछ वर्षो से विपक्ष में रहने के बाद भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर बिहार की सत्ता में वापस लौट चुकी है। जिस प्रकार से भाजपा ने अपने पुराने साथी जदयू को फिर से अपने पाले में कर लिया, वह अपने आप में एक बड़ी तख्तापलट था। देश के सारे विपक्षी दल एक होने की होड़ में लगे थे और उसी समय भजपा की महागठबंधन में सेंध, विपक्ष को भविष्य में कमजोर करने की एक कड़ी है। कांग्रेस को केन्द्र और राज्यों से बेदखल करने के बाद भ्रष्ट क्षेत्रीय राजनीतिक दल अब भाजपा के निशाने पर हैं। बिहार में अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद भाजपा ओडिशा और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी अपना पैर फैला सकती है, जहां वर्षो से भाजपा को उतनी लोकप्रियता नहीं मिली है।

बिहार के उप-मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमों लालू यादव के छोटे पुत्र तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने  तथा सीबाआई का लालू परिवार पर शिकंजा कसे जाने के बाद से ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तेजस्वी पर कारवाई की मांग कर रहे थे। लेकिन लालू यादव का तेजस्वी के इस्तीफा देने से इंकार करने के बाद नीतीश कुमार ने महागठबंधन में रहना उचित न समझते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। महज कुछ घटों में ही जदयू को भाजपा द्वारा बिना किसी शर्त के समर्थन दिये जाने के बाद  नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ जाने का निर्णय लिया और अगले ही दिन राजग और जदयू के 131 विधायकों का विधानसभा में समर्थन हासिल करते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

बिहार से पहले भाजपा को फरवरी में हुए ओडिशा के पंचायत चुनाव में भी लोगों का भरपूर साथ मिला। भाजपा ओडिशा में हुए पंचायत चुनाव में 851 में से 297  सीटों को अपनी ओर समेटते हुए तथा बीजद को चुनौती देते हुए दूसरे नंबर की पार्टी बनी,  जो 2014 में ओडिशा विधानसभा के आये हुए परिणाम के ठीक उलट था। 2014 में ओडिशा विधानसभा चुनाव में भाजपा को 147 में से 10 सीटें मिली और भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी बनी। लेकिन जिस प्रकार से अमित शाह ने ओडिशा को अपना मिशन बनाया, भाजपा पंचायत चुनाव में 7.3 प्रतिशत से 34.9 प्रतिशत वोट पाने में सफल रही। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की नजर 2019 में होने वाले ओडिशा विधानसभा चुनाव पर है जो लोकसभा चुनाव के साथ में होगा। यही कारण है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जुलाई में ओडिशा के हुगुलपट्टा, जजपुर और धौली क्षेत्रों का दौरा कर केन्द्र सरकार के कार्यों का निरीक्षण किया, जो उनके ओडिशा मिशन का पहला अध्याय है। उन्होने बरहमपुर और बीराहा मंदिर क्षेत्रों का भी दौरा किया।  ऐसा लगता है कि भाजपा की ओडिशा में इस प्रकार की चहलकदमी राज्य में मजबूत बीजू जनता दल के वर्चस्व को खत्म करने की शुरूआत है। बीजू जनता दल 1998 में जनता दल से अलग होकर अस्तित्व में आया और 2000 से लेकर  2009 तक भाजपा के साथ रही। लेकिन 2009 में बीजद ने भाजपा से नाता तोड़ लिया और एक बार फिर मजबूत होकर उभरी। बीजू जनता दल के सदस्य अपने इस कार्यकाल के दौरान कई सारे चिटफण्ड घोटालों में भागीदार रहे हैं। यहा तक की बीजद के कई सदस्य वित्तीय अनियमितताओं में संलग्न पाये गये हैं। बीजद की इन्ही कमजोरियों को भाजपा ने लोगों के बीच ले जाने में सफल रही और  2014  से लेकर अब तक भाजपा ओडिशा में मजबूत होती जा रही है।

Amit-Shah2_940_reuters1

भाजपा के लिये ओडिशा में सबसे बड़ी अड़चन वर्तमान मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हैं, जो पार्टी सदस्यों के द्वारा काफी भ्रष्टाचार करने के बावजूद भी ओडिशा के लोगों के बीच में अपना प्रभाव बनाये रखे हुए हैं। भाजपा अभी तक किसी ऐसे नेता को सामने नही ला पायी है जो नवीन पटनायक को चुनौती दे सके। लेकिन हाल ही में चुनाव आयोग ने नवीन पटनायक की चुनावी फंडिंग में अनियमितता पाई है। चुनाव आयोग का कहना है कि नवीन पटनायक ने अपने हलफनामे में झूठ बोला था। ऐसा माना जा रहा है कि ये गैर-कानूनी फंडिंग चिट-फंड की हो सकती है।  यह भाजपा के लिये राहत की खबर है। वैसे भाजपा इस मुद्दे को बढ़-चढ़ कर उठा रही है और यदि नवीन पटनायक इसमें संलिप्त पाये गये तो उन्हे अपने बचे कार्यकाल से भी हटना होगा और पटनायक का बाहर होना भाजपा के लिये ओडिशा में एक बड़ी आशा की किरण साबित हो सकती है।

तमिलनाडु में जयललिता की मृत्यु और शशिकला की गिरक्रतारी ने एआईएडीएमके को दो धड़ो में बांट दिया है, जिससे राज्य की राजनीति में भारी खालीपन आ चुका है। राज्य में दो धड़े बन चुके हैं जिसका मुख्य कारण पूर्व मुख्यमंत्री ओ पनिरसेल्वम और वर्तमान मुख्यमंत्री ई पलानिस्वामी के बीच हो रही खींचातानी है। इस आपसी टकराव ने दोनो धड़ों को कमजोर किया है। इन दोनो धड़ों का एक साथ आना लगभग असंभव है। उधर डीएमके के कमजोर होने का कारण करूणानिधि का गिरता स्वास्थ्य है। भारतीय जनता पार्टी इस मौके को भुनाने में कोई देर न करते हुए एआईएडीएमके के धड़ों को एक-जुट होने का परामर्श दे चूकी है। इसके साथ ही भाजपा रजनीकांत से भी संभावित गठबंधन कर सकती है जिन्होंने अभी अपनी पार्टी की घोषणा नहीं की है।

गोवा में भी भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे अपनी पकड़ बना रही है। गोवा विधानसभा में भाजपा को थोड़ी कठिनाई झेलनी पड़ी थी, लेकिन जुलाई में हुए पंचायत चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों की जीत ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि लोगों का  भाजपा के प्रति विश्वास एक बार फिर जगा है। लोगों का भाजपा को समर्थन 2014 लोकसभा चुनाव जैसा था।

जिस प्रकार भाजपा की लहर चल रही है उससे बिल्कुल प्रतीत होता है कि अब भाजपा का अगला लक्ष्य पश्चिम बंगाल है। पश्चिम बंगाल की मूलभूत संरचना दयनीय स्थिति में है और पिछले वर्ष जिस  प्रकार से विवेकानंद क्रलाईओवर के गिरने से 26 लोगों की मौत और 80 लोग घायल हुए इससे तृणमूल कांग्रेस के अन्दर चल रही लूट साफ प्रतीत होती है। नारदा कांड में तो  तृणमूल के 13 बड़े नेता तो कैमरा के सामने पैसे की लेनदेन में खुलेआम पाये गये। इन सभी घटनाओं से तो यह साफ लगने लगा है कि राज्य की कानून व्यवस्था में लगातार हो रही गिरावट और आर्थिक विकासहीनता अपने चरम पर है। अब तो बंगाल के लोगों में भी सरकार के प्रति मोह-भंग हो चुका है, जो भारतीय जनता पार्टी के भविष्य के लिए शुभ संकेत है। यदि भाजपा की लहर इस प्रकार दो वर्षो तक चलती रही तो 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत को रोकना असंभव है।  अब केवल यही देखना है कि भाजपा कितने मतों से विजय प्राप्त करती है।

आकाश कश्यप

Leave a Reply

Your email address will not be published.