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पालिटिक्स की अनबूझ पहेली

पालिटिक्स की अनबूझ पहेली

बेटा : पिताजी।

पिता : हां, बेटा।

बेटा : पिताजी, लगता है हमारे नेता लालू प्रसाद जी के ग्रह ठीक नहीं चल रहे हैं।

पिता : तूनें किस ज्योतिषी को उनकी जन्मपत्री दिखा दी?

बेटा : पिताजी, न तो उनकी जन्मपत्री ही मेरे पास है और न मैंने किसी को दिखाई है।

पिता : फिर तू कैसे कह रहा है?

बेटा : आपने टीवी और समाचार पत्रों में नहीं पढ़ा कि लालूजी के परिवार के सभी सदस्य सम्पत्ति हड़पने व भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में फंस गये हैं। उनके एक पुत्र का तो पेट्रोल पम्प ही रद्द कर दिया गया है। लालूजी स्वयं भी चारा घोटाले के अलावा और भी मुकद्दमों में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।

पिता : तो क्या हो गया, बेटा? वह तो बहुत बड़े पुराने नेता हैं। उन्होंने तो जन नायक जय प्रकाश नारायण जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में कूद कर ही राजनीति में जन्म लिया था। इसमे उन्होने बड़ी यातनायें भी सही थीं। आपातकाल में वह जेल में भी रहे उन्होंने देश व बिहार की बड़ी सेवा की है।

बेटा : जेल में तो वह पिताजी तब भी रहे जब उन्हें रांची उच्च न्यायालय ने चारा घोटाले से संबंधित एक भ्रष्टाचार के मामले में पांच वर्ष की सजा दे दी  थी और उनकी लोकसभा की सदस्यता भी चली गई थी।

पिता : तो क्या हो गया बेटा? वह तो अब भी कहते हैं कि वह निर्दोष हैं और उच्चतम् न्यायालय में लम्बित अपनी अपील के फलस्वरूप वह बेदाग होकर निकलेंगे।

बेटा : यह तो पिताजी सारे ही कहते हैं। अदालत में कौन मानता है कि मैं कसूरवार हूं? जब पुलिस उन्हें जेल ले जा रही होती है तो वह इस प्रकार गर्व से मुस्करा कर दो उंगलियां लहरा कर जीत का विजयी साइन दिखाते हैं मानों वह जेल नहीं सम्मानित होने के लिये जा रहे हैं। पर फिर भी कई नेताओं को सजा मिली है।

पिता : यही तो बेटा मैं बार-बार दोहराता हूं। इसे ही तो पालिटिक्स कहते हैं।

बेटा : पिताजी, उन्हें तो जहाज पर चढऩे के लिये सीधे सीढिय़ों तक अपनी कार में जाने की भी छूट थी। आम आदमी की तरह उन्हें अपना टिकट दिखाने व बोर्डिंग पास लेने की आवश्यकता नही थी।

पिता : इस विशेषाधिकार को तो अब सरकार ने वापस ले लिया है।

बेटा : पिताजी, उन्हें तो जेड प्लस की सुरक्षा भी मिली हुई है।

पिता : बेटा, वह बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री भी तो हैं।

बेटा : वह मुख्यमन्त्री तो पूर्व में थे। वर्तमान में तो वह सांसद या विधायक भी नहीं हैं। वर्तमान में तो वह सिर्फ एक अपराधी हैं जिसे भ्रष्टाचार के जुर्म में पांच वर्ष की कैद हुई है। फर्क केवल इतना हैं कि उनकी अपील उच्चतम न्यायालय के विचाराधीन लम्बित है।

पिता : ईश्वर करे कि वह बरी हो जायें।

बेटा : ईश्वर करे कि ऐसा ही हो। पर अगर उच्चतम् न्यायालय ने उनकी अपील खारिज कर दी और उन्हें जेल जाना पड़ा तो क्या उनके सुरक्षा कर्मचारी व अधिकारी भी उनकी सुरक्षा के लिये उनके साथ ही जेल में रहेंगे?

पिता : बेटा, यह तो शासन की गूढ़ी बातें हैं। यह तो वही जानें।

बेटा : पर पिताजी, यह तो मानना पड़ेगा कि लालूजी के राष्ट्रीय जनता दल और सोनियाजी-राहुलजी के कांग्रेस की दोस्ती अटूट लगती है।

पिता : यह तो है ही बेटा। दोनों ही महागठबंधन के बड़े स्तम्भ हैं। बेटा, यह इसलिये भी कि लालूजी का सारा परिवार – उनकी धर्मपत्नी, दोनों बेटे, सुपुत्री – भ्रष्टाचार और स्कैमों के आरोपों के घेरे में फंसे हुये हैं। नीतीशजी का कहना है कि वह तो भ्रष्टाचार किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह उनका राजनीतिक आदर्श है।

बेटा : पर पिताजी, जब उन्होंने भाजपा को ठेंगा दिखाकर लालूजी को गले लगाया था तब तक तो लालूजी को भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने पर ही पांच साल के कारावास की सजा हो चुकी थी। तब उन्होंने चुनावी लाभ के लिये भ्रष्टाचार से क्यों समझौता कर लिया था?

पिता : लगता है बेटा, उन्हें अपनी इस गलती का एहसास हो गया है और अब वह आगे इसे दोहराना नहीं चाहते।

बेटा : पर कांग्रेस और लालूजी की पार्टी तो अभी भी एक दूसरे के साथ खड़े दिख रहे हैं हर हालत में। अब तो ऐसे लग रहा है कि कांग्रेस व लालूजी की आरजेडी  एक हैं और एक दूसरे के लिये ही बने हैं।

पिता : बिल्कुल ठीक। इन दोनों दलों को हर समय एक दूसरे की आवश्यता है। वह एक दूसरे के बिना जी नहीं सकते।

बेटा : कांग्रेस नितीशजी की इस मांग का विरोध कर रही है कि लालूजी के सुपुत्र उप-मुख्यमन्त्री तेजस्वी त्यागपत्र दे दें क्योंकि सीबीआई ने उनके विरूद्ध भ्रष्टाचार का मुकद्दमा कर दिया है।

पिता : ऐसा क्यों कर रही है?

बेटा : कांग्रेस का तर्क है कि उन पर अदालत में चार्जशीट दायर नहीं हुआ है। यह बात तो तर्कसंगत है।

पिता : तभी तो कांग्रेस ने लालकृष्ण आडवाणी जी सरीखे नेताओं से त्यागपत्र मांग लिया था जब राम मन्दिर मामले में अदालत में उनके विरूद्ध चार्जशीट दायर हो गया था।

बेटा : पर पिताजी कांग्रेस ने हिमाचल में अपने मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह से इस्तीफा क्यों नहीं मांगा जिनके विरूद्ध भी दिल्ली उच्च न्यायालय में एक भ्रष्टाचार के मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुका है।

पिता : बेटा, यही तो भारतीय पालिटिक्स की विडम्बना है। इसीलिये तो कांग्रेस और आरजेडी एक दूसरे के साथ खड़े हैं एक दूसरे को बचाने के लिये। कांग्रेस नेताओं के विरूद्ध भी तो ऐसे ही कई मुकद्दमें चल रहे हैं।

बेटा : पिताजी, लोकसभा की अध्यक्षा महोदया ने कांगेस के छ: सांसदों को सदन से पांच दिन के लिये क्यों निलम्बित कर दिया है?

पिता : बेटा, इसलिये कि वह बोफोर्स मामले में किसी जांच का जोरदार विरोध कर रहे थे क्योंकि अब एक नये रहस्योद्घाटन में पूर्व कांग्रेसी प्रधानमन्त्री स्वर्गीय राजीव गांधी का नाम एक बार फिर उछला है। सांसदों ने अध्यक्षा महोदया के ऊपर कागज फेंक मारे थे।

बेटा : तो क्या यह ठीक था? संसद में ऐसा करना कोई गुनाह नहीं है?

पिता : जैसे विरोध हो रहा है उससे तो ऐसा ही लगता है।

बेटा : क्या विरोधियों की मांग है कि इसे सांसदों का विशेषाधिकार मान लिया जाये?

पिता : यह तो कांग्रसी नेता ही बता पायेंगे।

बेटा : पिताजी, यदि यही अपराध संसद की दीर्घा में बैठा कोई आगन्तुक भारत का नागरिक कर बैठता तो?

पिता : तब तो यह घोर अपराध हो जाता और सारी संसद एकमत से उसे कड़ी से कड़ी सजा दे देती। उसे जेल तक भेज दिया जाता।

बेटा : पिताजी, संसदों व नागरिकों के लिये अलग-अलग कानून हैं?

पिता : यह तो बेटा, मैं नहीं बता सकता। यह तो कानूनी विशेषज्ञ ही बता सकते हैं।

बेटा : पिताजी, लालूजी कहते हैं कि वह निर्दोष हैं और सुप्रीम कोर्ट से उन्हें न्याय मिलेगा और वह ससम्मान बरी होंगे।

पिता : यदि ऐसी ही बात है तो उनकी लोकसभा की सदस्यता क्यों समाप्त कर दी गयी।

बेटा : पर यह भी कोर्ट के आदेश से ही हुआ है। पर पिताजी, एक बात समझ नहीं आती।

पिता : क्या?

बेटा : लालूजी न तो मुख्यमंत्री हैं, न ही विधायक और न सांसद। आज तो केवल हैं तो बस केवल भ्रष्टाचार के अपराध में पांच साल की सजा पाए एक अपराधी। पर फिर भी उन्हें जेड-प्लस की सुरक्षा मिली हुयी है जनता के पैसे से।

पिता : वह पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं और इसलिए उन्हें ये सुरक्षा मिली लगती है।

बेटा : यह तो सब पूर्व की बात है। वर्तमान में तो वह केवल अपराधी ही हैं न।

पिता : यह तो बेटा सरकार जाने या अदालतें। हम क्या कह सकते हैं?

बेटा : पर पिताजी, उन पर तो कई और भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप भी तो हैं।

पिता : वह तो कहते हैं कि यह सब राजनीतिक बदले की दुर्भावना से किया जा रहा है. वह निर्दोष हैं।

बेटा : कहने को तो सब अपराधी यही कहते हैं कि यह सारी उनके विरोधियों की साजिश है पर उनकी कौन सुनता है?

पिता : बेटा, लालूजी को आम आदमियों की तरह मत देख। वह वीआईपी हैं, खास आदमी।

बेटा : अब बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार जी ने तो ऐसे पासा फेंका है कि लालू जी जो सारी सरकार की डोर अपने हाथ में लिए फिरते दिखते थे आज हक्के-बक्के रह गए हैं। उनके दोनों पुत्रों, जिनमें एक तो उप-मुख्यमंत्री था, की तो कुर्सी ही चली गयी है

पिता : बेटा, पॉलिटिक्स में तो सब चलता है। कभी सब कुछ एक जैसा सदैव नहीं रहता। कभी तख्त तो कभी तख्ता।

बेटा : पर पिताजी, लालूजी के साथ तो धोखा ही हुआ न, विश्वासघात।

पिता : यही पॉलिटिक्स है। इस में न कोई सदा के लिए दोस्त रहता है न दुश्मन। आज जो दोस्त है वह कल दुश्मन और आज जो दुश्मन है वह कल को दोस्त बन जाता है।

बेटा : आपकी बात तो ठीक है। चार साल पूर्व नीतीशजी ने भाजपा से भी तो यही किया था। तो फिर इस ताजी घटना का क्या अर्थ निकाला जाये?

पिता : नीतीशजी की घर वापसी ही कही जायेगी क्योंकि वह लालूजी के साथ भाजपा के साथ सम्बन्ध विच्छेद कर ही गए थे।

बेटा : पिताजी, उधर कांग्रेस ने राजग के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर भी गलत तरीके से स्वयं व अपने पुत्र के लिये सम्पत्ति खड़ी करने के आरोप लगा दिये हैं। और यह भी मांग की है कि उस पर जांच बिठाई जाये।

पिता : यह अजीब बात है। एक तर्फ तो मांग करते हैं कि जांच बिठाई जाये और दूसरी ओर हंगामा करते हैं कि जांच की बात ही क्यों की जा रही है।

बेटा : पिताजी, आजकल महामहिम नए राष्ट्रपति के प्रथम उद्बोधन पर कुछ राजनीतिक दलों ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। उनका कहना है कि प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम न लेकर उनकी अवहेलना की गयी है

पिता : हां इस पर संसद में भी काफी शोर मचा।

बेटा : अपने सम्बोधन में नेहरूजी का नाम लेना कोई संवैधानिक अनिवार्यता है क्या?

पिता : जहां तक मेरा ज्ञान है ऐसी तो कोई प्रतिबद्धता नहीं है। बाकी नेता लोग हम से ज्यादा जानते हैं।

बेटा : पिताजी, ऐसा भी कोई प्रावधान है कि राष्ट्रपति अपने सम्बोधन का प्रारूप राजनितिक दलों से अनुमोदित कराएं?

पिता : क्या फिजूल की बातें कर रहा है? वह राष्ट्रपति हैं, किसी पार्टी के नेता नहीं पार्टी नेता भी अपना सम्बोधन किसी से पहले अनुमोदित नहीं करवाते।

बेटा : फिर यह शोर किस बात का?

पिता : बेटा, इसे ही तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते हैं।

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