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बेटियां सुखी तो राष्ट्र सुखी

बेटियां सुखी तो राष्ट्र सुखी

संस्कृत से एक विद्वान के साथ समाज में दु:खों और बढ़ते हुए अपराधों पर चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि इसका मुख्य कारण समाज में महिलाओं के अपमान और उनके प्रति अपराध की बढ़ती घटनाएं जिम्मेदार हैं। भारत में महिलाओं के सम्मान की महत्ता बताते हुए हमारे ग्रन्थ कहते हैं – ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।’ अर्थात् जिस समाज में नारी शक्ति का सम्मान होता है वहां पर देवताओं का वास होता है। इसका सीधा सा अर्थ हुआ कि जब समाज में नारी का सम्मान घटने लगता है तो वहां स्वाभाविक रूप से राक्षसी प्रवृत्तियां पैदा होने लगती हैं। इस चर्चा के बीच मेरा ध्यान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की उस योजना की गहराई में उतरने लगा जिसका नाम है – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।’ भ्रूण हत्याबन्दी विषय पर तो सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों से अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं। हालांकि अभी भी लड़कों की तुलना में लड़कियों का अनुपात बराबर नहीं आ पाया।

‘बेटी बचाओ’ का नारा अक्सर भ्रूण हत्या रोकने के सम्बन्ध में ही समझा जाता है। परन्तु मेरा स्पष्ट मत है कि कन्याओं को भ्रूण हत्या जैसे घिनौने अपराध से बचाने के बाद जन्म लेने वाली उस बेटी को उसके पूरे जीवन तक भरपूर आदर, संरक्षण और प्रगति की सभी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी सारे समाज का कत्र्तव्य बनता है। बेटी को जन्म देने के बाद उसकी पढ़ाई के साथ-साथ उसे मनचाहे क्षेत्र में प्रगति के अवसर, पूरे सम्मान के साथ विवाह तथा विवाह के बाद भी ससुराल परिवार में उसी प्रकार का सम्मान मिले जैसा माता-पिता के घर पर मिलता था। दो परिवारों के बाहर भी जब कोई बेटी समाज में विचरण करे तो उसे अपराधमुक्त वातावरण प्राप्त हो। यह तभी सम्भव है जब ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नारे को हम पूरे व्यापक रूप में समझें कि बेटियों को हर प्रकार से सम्मान और प्रगति के सभी अवसर प्राप्त होने चाहिए।

महिलाओं के सम्बन्ध में जब तक हमारे देश में मूल भारतीय संस्कृति की स्थापना एक-एक व्यक्ति के मन में नहीं होगी तब तक महिलाओं की रक्षा सदैव संदेह के घेरे में ही रहेगी। महिलाओं की रक्षा के बिना समाज में पूरी तरह सुख और शांति की स्थापना भी नहीं हो पायेगी। यह कार्य किसी विशेष सरकारी प्रयास से नहीं हो सकता बल्कि इसके लिए हम सबको गैर-सरकारी प्रयासों से ही यह सुनिश्चित करना होगा कि बेटियों की शिक्षा से लेकर उन्हें सुखी जीवन उपलब्ध कराना हमारा प्रथम दायित्व होना चाहिए।

कुछ वर्ष पूर्व मुझे पंजाब के एक शहर की रीना (बदला हुआ नाम) के बारे में पता चला जो दृष्टिहीन होने के बावजूद भी दौड़ में प्रथम आई। विद्यालय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर उसने प्रथम विजेता का स्थान प्राप्त किया। अपने राजनीतिक कार्यक्रमों के बीच मैं एक दिन उस लड़की से मिलने उनके घर गया। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। बच्ची की विद्यालय की पढ़ाई समाप्त हो रही थी। उसने मुझे कहा कि वह कॉलेज में भी पढऩा चाहती है। मैंने उसकी शिक्षा की सारी व्यवस्था की। राज्य सरकार से कुछ आर्थिक सहायता भी दिलवाई। आज वह युवती कॉलेज की शिक्षा भी पूरी कर चुकी है। इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की एक और खिलाड़ी युवती को भी राज्य सरकार से आगे शिक्षा की आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई।

मेरी अपनी बेटी के विद्यालय में उसके साथ एक लड़की पढ़ती थी जिसके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उसका भविष्य अन्धकार में था। मेरी बेटी ने मुझे प्रेरणा दी कि उसके पढ़ाई के खर्च को बेशक कम करके उसकी सहेली की पढ़ाई में मदद करनी चाहिए। उस लड़की को मैंने स्नातक तक की पढ़ाई पूरी करवाई और उसकी नौकरी का भी प्रबन्ध किया। कुछ समय के बाद एक दिन जब वह मुझे मिलने आई तो उसने बताया कि मैंने एयर कंडीशनर का नाम तो सुना था परन्तु इस नौकरी से मुझे पहली बार एयर कंडीशनर केबिन में बैठकर काम करने का अनुभव हुआ है। मैं उसकी बात को सुनकर केवल इसी बात में खो गया कि हमारे देश में ऐसी कितनी ही बेटियां और बेटे होंगे जो आर्थिक कमजोरी के कारण न तो पढ़ाई पूरी कर पाते हैं और न ही उनके भविष्य का कोई मजबूत आर्थिक आधार बन पाता है।

पंजाब के नवाशहर जिले के एक ग्रामीण सरकारी स्कूल में जब मैं बच्चों से बात कर रहा था तो मैंने देखा कि सातवीं कक्षा की एक छोटी सी बच्ची गुमसुम एक तरफ खड़ी थी। मेरे बुलाने पर भी उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। मैंने मां-बाप का नाम पूछा, परन्तु वह कुछ नहीं बोली। मुझे पता लगा कि वह लड़की न बोल सकती है और न सुन सकती है। मैंने उसके मां-बाप को बुलाकर उन्हें समझाया कि इसे अलग मूक-बधिर  बच्चों के विद्यालय में दाखिल करवाना चाहिए। उनका जवाब था कि हमारी चार बेटियां और हैं जबकि आर्थिक हालत कमजोर है। इस पर मैंने उस बिटिया का दाखिला जिला रूपनगर के प्रकाश मेमोरियल विद्यालय में करवा दिया जहां मूक और बधिर बच्चों को शिक्षा देने की ही विशेष व्यवस्था थी। आज वह लड़की 12वीं कक्षा में पढ़ती है और पेंटिंग में बहुत अच्छा हुनर प्राप्त कर चुकी है।

मेरे होशियारपुर निवास के पास ही एक ऐसी बिटिया मेरे संज्ञान में आई जो पढऩे में काफी होशियार थी और डॉक्टरी शिक्षा के क्षेत्र में जाना चाहती थी। परन्तु उसके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उसकी मां को दूसरों के घरों में सफाई, बर्तन आदि का कार्य करके घर का खर्च चलाना पड़ता था। मैंने उस बेटी को विज्ञान की शिक्षा और डॉक्टरी की शिक्षा के लिए हर सम्भव सुविधा उपलब्ध कराई। मैं जब भी उसे देखता हूं, मेरा मन खुशी से भर जाता है क्योंकि वह लड़की आज हमारे ही शहर में दांतों की डॉक्टर बनकर नाम कमा रही है।

कुछ वर्ष पूर्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिवस पर मैंने होशियारपुर के अपने पैतृक गांव जेजों दोआबा के सरकारी विद्यालय में छात्राओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए कन्या पूजन का कार्यक्रम निर्धारित किया। पूजनीय कन्याओं ने मुझे कहा कि आपने कन्याओं के बारे में बड़ी उच्च बाते कहीं हैं परन्तु हमारे गांव में विद्यालय के बाद कॉलेज की पढ़ाई का कोई प्रबन्ध नहीं है। शिक्षा के प्रति उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए मैंने बाबा औघड़दास एजुकेशनल सोसाइटी का गठन किया और हर तरफ से वित्तीय सहायता एकत्र करने के लिए कुछ लोगों को इस कार्य में लगाया। प्रारम्भ में इस सोसाइटी के द्वारा गांव के मंदिर में कॉलेज की कक्षाओं का आयोजन किया गया। बाद में गांव के सरकारी विद्यालय में ही कॉलेज की विधिवत पढ़ाई प्रारम्भ हो गई। इस प्रकार गांव की बेटियों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खुल गये। इस कॉलेज से निकलने वाली अनेकों बेटियां प्रान्त के कई विभागों में कार्यरत भी हो चुकी हैं। इनमें दो बेटियां तो बी.एस.एफ. में नौकरी भी कर रही हैं।

भटिंडा की भी एक ऐसी ही घटना ने मेरे अन्दर भावनात्मक रूप से उस बेटी के प्रति दर्द उत्पन्न कर दिया जो अपने आपको ताई कमाण्डो में दक्ष मानती थी और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली एक प्रतियोगिता में भाग नहीं ले पा रही थी क्योंकि उसके परिवार की आर्थिक हालत कमजोर थी। उसके पिता ने बैंक से 15 हजार रुपये का ऋण लेकर उसके विदेश जाने की व्यवस्था की। उस बेटी को अन्तर्राष्ट्रीय ताई कमाण्डो प्रतियोगिता में प्रथम स्थान मिला। परन्तु गांव में आने पर कहीं किसी प्रकार का स्वागत समारोह तो दूर किसी ने उसे शुभकामनाएं भी नहीं दी। समाचार पत्रों के माध्यम से जब मुझे यह जानकारी मिली तो मैं तुरन्त अपने कार्यक्रमों के बीच में से समय निकालकर उस बेटी को मिलने उनके घर पहुंचा। मैंने पंजाब सरकार से उसे 15 हजार रुपये की सहायता दिलवाई। जो गांव अपनी बेटी की इतनी बड़ी उपलब्धि पर उसे सम्मानित नहीं कर पाया, वह बेटी अपने गांव के दर्द को सुनाते हुए मुझे कहने लगी कि हमारे गांव में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। मैंने अपने सांसद निधि में से तुरन्त उनके गांव में पीने के पानी की व्यवस्था का प्रबन्ध करवाया।

इन सभी प्रयासों के बावजूद मैं यह सोचने के लिए मजबूर हो जाता हूं कि देश की असंख्य प्रतिभाएं सुविधाओं और सहायता के अभाव में दबकर रह जाती होंगी। वास्तव में हमारे छोटे-छोटे प्रयास हमारे देश की महान उन्नति का आधार बन सकते हैं। इसलिए समाज के प्रत्येक सम्पन्न व्यक्ति को यह अपना नैतिक और राष्ट्रीय दायित्व समझना चाहिए कि जहां कहीं भी पढ़ाई में रुचि रखने वाले बच्चों को आर्थिक सुविधाओं के अभाव में कोई समस्या आ रही हो तो ऐसे बच्चों को शिक्षा की पूरी सुविधाएं उपलब्ध करवानी चाहिए। बेटियों के लिए तो हमारा यह दायित्व और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि बेटियां सुखी तो राष्ट्र सुखी।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

अविनाश राय खन्ना

 

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