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गाय हमारी माता है

गाय हमारी माता है

गाय हमारे भारतीय जीवन का आधार है। हम गाय को गोमाता कहते हैं और उसकी पूजा करते हैं। हम गाय को पशु नहीं माता कहते हैं। एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा कि पशु-पक्षियों में कौन श्रेष्ठ है तो बीरबल ने कहा कि मोर। तब अकबर ने पूछा कि गाय श्रेष्ठ पशु नहीं है तो बीरबल ने कहा कि गाय पशु नहीं है वह हमारी मां है जैसे गंगाजल पानी नहीं अमृत है, गंगा को हम नदी नहीं मानते वह अमृत की धारा है इसी प्रकार गाय पशु नहीं, वह हमारी मां है। बीरबल का कितना सटीक उत्तर था। भारत के देहाती क्षेत्रों में ग्रामीण लोग अपनी बात का विश्वास दिलाने के लिए अपनी सबसे प्रिय की कसम खाते हैं जिनमें अपनी मां की कसम, गंगा जी की कसम (सौगन्ध) तथा गोमाता की कसम (सौगन्ध) खाते हैं इसी से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संस्कृति में गाय का स्थान कितना बड़ा है। इसी प्रकार जब हम किसी स्त्री/लड़की की प्रशंसा करते हैं तो प्राय: यह कहते हैं कि वह तो गाय समान है अर्थात् गाय जैसी छलरहित, निष्छल, निष्पाप, पवित्र और सीधी सादी है, हमारे भारतीय परिवेश में यह है गाय का महत्व।

भारतीय संस्कृति में पांच ‘ग’ का अति महत्वपूर्ण स्थान है यथा- गणेश, गाय, गायत्री, गंगा और गीता अर्थात इन पांच ‘ग’ के बिना हमारा जीवन निरर्थक है यही पांच ‘ग’ हमारी भारतीय संस्कृति के मूल आधार है। जब हम कोई धार्मिक आयोजन करते हैं या कोई शुभ कार्य आरम्भ करते हैं तो गणेश जी का पूजन करते हैं, गंगाजल से स्थान पवित्र करते हैं, गीता का पाठ करते हैं, गायत्री मन्त्र का जाप करते हैं तथा पंचगण्य – गाय का दूध, घी, दही, गोमूत्र तथा गोबर का प्रयोग किया जाता है। हम किसी प्राणी के मल-मूत्र से घृणा करते हैं उनका खाना तो सोच भी नहीं सकते परन्तु गाय के तो मूत्र को ही नहीं उसके मल (गोबर) का सेवन करने में भी नहीं हिचकते, गोबर को हम बेहिचक खा लेते हैं और गोमूत्र पीना तो एक आम बात है क्या किसी प्राणी के मल-मूत्र को हम अपनी किचन में स्थान दे सकते हैं किसी बच्चे का भी मल यदि किसी किचन में रखे बर्तन को छू जाए तो हमें कितना गुस्सा आता है और धार्मिक आयोजनों में तो ऐसा होने पर हाय तौबा मच जाता है परन्तु हम प्रतिदन अपने चूल्हे को (देहात में मिट्टी के चूल्हे होते हैं, यह ग्रामीण परिवेश की बात है) गाय के मल-मूत्र से लीप नहीं लिया जाता तब तक चूल्हे को अशुद्ध माना जाता है। घर के आंगन को गाय के मल-मूत्र से लीप कर शुद्ध किया जाता है। य़ह है हमारी भारतीय संस्कृति में गोमाता का स्थान। भारतीय संस्कृति में गोमाता का उत्कृष्ट स्थान है और उसका अपमान सहन नहीं कर सकते जैसे हम अपनी जननी मां का अपमान सहन नहीं कर सकते उसी प्रकार हम गोमाता का अपमान सहन नहीं कर सकते।

भारतीय संस्कृति गाय में सभी देवी देवताओं का वास मानते हैं उसे माता कहते हैं और उसकी पूजा करते हैं। गाय वसुन्धरा और सरस्वती का प्रतीक है तो बैल धर्म का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में मान्यता है कि पृथ्वी को धारण करने वाले सात तत्व है – गौ, विप्र, वेद, सती,सत्यवादी, निलोर्भी, दानशीलता।

गोभिविप्रैश्व वेदैश्व सतीभि: सत्यवादिभि:

अलुब्धैर्दानशीलैश्व सप्तभिर्धार्यते मही।।

इसमें गौ का प्रथम स्थान है, गाय का आध्यात्मिक रूप तो पृथ्वी है ही प्रत्यक्ष रूप में भी उसने पृथ्वी को धारण कर रखा है। समस्त मानव जाति को किसी न किसी प्रकार गौ से हमारे जीवन का पोषण होता है। भारतीय वेदों और सम्पूर्ण शास्त्रों में नाना प्रकार से यह सिद्ध किया गया है कि गौ हमारी माता ही नहीं विश्वमाता है। इसके शरीर में सभी देवी-देवताओं का निवास है। यह शुद्ध सात्विक गुणों की अनन्त भण्डार है। यह साक्षात् भूदेवी है। इस लोक में समस्त जीव जगत का पालन करने वाली है और परलोक में जाने का शिवत्व प्रदान करने वाली है। सभी ऋषि मुनियों, दर्शनों और सत्यदृष्टा का भी यही मत है। गण्य पदार्थ गोबर गोमूत्र की खाद बैल के हल से जोती हुई भूमि से उत्पन्न अन्न और यज्ञविधि पर विचार किया जाए तो विज्ञान से भी इनकी सात्विकता सिद्ध होती है।

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गौ जितनी दु:खी और कृश होगी उतना ही सात्विकता का अभाव होगा और विश्व का वातावरण तामसी होकर संहार का कारण बनेगा और मानवता का ह्रास ताथा दानवता का विकास होगा इसलिए यदि मनुष्य को अपने विनाश से बचना है तो गोमाता की रक्षा करनी होगी। गौ ही विश्व की माता है – ‘गावो विश्वस्य मातर:’ यह प्रत्यक्ष सत्य है। यह सृष्टि की जड़ है – ‘छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम’- अत: वृक्ष को बचाने के लिए जड़ की रक्षा करना जरूरी है।

भारत में गायों की पांच जातियां प्रसिद्ध है-

  • सिन्धी- यह दूध सबसे ज्यादा देती है परन्तु सब स्थानों के लिए उपयुक्त नहीं है।
  • कठियावाड़ी – यह चितकबरी होती है।
  • कोसी – मथुरा के आस-पास की है, इसका कद छोटा होता है।
  • हरियाणा- यह सर्वत्र पाई जाती है, मुख्यत: हरियाणा प्रदेश की है, इसके बैल सर्वश्रेष्ठ होते हैं।
  • मेवाती – जयपुर के आस-पास की होती है, इसके सींग लम्बें होते हैं।
  • गंगा तीरी- यह नस्ल पूर्वांचल में होती है।

उपर्युक्त जातियों में जिस स्थान के लिए जो उपयुक्त हो वहां उसको पालना चाहिए। शारीरिक स्वास्थ्य और बौद्धिक विकास के लिए गाय का दूध परमावश्यक खाद्य है । गाय के दूध में सभी तत्व विद्यमान हैं जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। यह बुद्धिवर्धक तथा अनेक रोगों की दवा है। गाय के दूध, घी, दही, मल-मूत्र के सेवन से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है, इससे मानसिक शाक्ति मिलती है, डिप्रेशन, तनाव ठीक होता है, इसके सेवन से अल्सर किडनी रोग ठीक हो जाते हैं। आंखों की ज्योति बढ़ती है। गोमूत्र पीने से कैंसर जैसी घातक बीमारी का भी उपचार हो जाता है। हवन में गौ के घी से वातावरण शुद्ध होता हैं। गाय का गोबर तथा गोमूत्र बैक्टीरिया रहित है इसीलिए घर के चूल्हे आंगन को गोबर से लीपा जाता है। गाय का सारा जीवन हमारी सेवा में बीतता है, इसलिए उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना ही चाहिए। उसकी सेवा तथा रक्षा करना हमारा कर्तव्य है जो लोग अपने इस कर्तव्य की अवहेलना करते हैं वे निश्चय ही घोर अपराधी हैं विश्व का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो गोमाता के उपकार से उपकृत न हुआ हो। अत: प्रत्येक भारतीय को गोमाता और गोवंश के लिए प्रेम और श्रद्धा का भाव रखना चाहिए गोमाता और गोवंस की समृद्धि ही हमारी सबकी समृद्धि है।

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गोवंश की समृद्धि एवं भारत के जनमानस की आस्था का सम्मान करते हुए भारत के अधिकांश राज्यों ने गोवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा रखा है। केरल और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों जहां मुस्लिम समुदाय और ईसाई, समुदाय बहुलता में हैं, ने गोवध पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया। गोवध से केवल आर्थिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी ही क्षति नहीं है वरन् सामाजिक क्षति हैं क्योंकि इसके कारण भारत की अधिकांश जनता की भावनाओं को ठेस पहुचती हैं। जब तक भारत में  विदेशी शासन था चाहे मुसलमानों का था या अंग्रेजों का शासन था, उनके गोभक्षी होने के कारण हिन्दू समाज उनसे घृणा करता था जबकि उन्हें आशा थी कि स्वराज्य मिलने पर भारत में गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लग जाएगा।

उनकी यह भावना तत्कालीन नेताओं और महात्मा गांधी के वक्तव्यों से सुदृढ़ हो गई थी किन्तु स्वराज्य होने पर भी गोवध पर प्रतिवाद किया जाना बड़े खेद का विषय है और भारतीय जनता में इससे घोर निराशा है जबकि यह भी आकट्य सत्य है कि मुगल बादशाहों बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, शाहआलम, बहादुरशाह जफर के अतिरिक्त अब्दुल इब्न मरदान, सूबेदार इराकवाली हुकुमत अफगानिस्तान ने सौ से अधिक उलेमा अहले सुनत के फतवा के मुताबिक गाय की कुरबानी बन्द करवाई थी, बादशाह बहादुरशाह जफर ने 28 जुलाई 1857 को बकरीद पर गोहत्या बन्द करने का फरमान जारी किया था। मौलाना फारूखी लिखित – ‘खैरवर बरकत’ – से पता चलता है कि शरीफ मक्का ने भी गोहत्या पर पाबन्दी लगाई थी। कुरान शरीफ  में सात आयतें ऐसी है जिनमें दूध एवं ऊन देने वाले पशुओं गाय, भैस, बकरी के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है, (कुरान, पारा 14 रूकुआ 7-15) हजरत मुहम्मद ने आयशा को नसीहत देते हुए कहा है कि गाय का दूध तथा घी सेहत के लिए बहुत जरूरी है। हदीस ने भी जाबे उल बकर (गोहत्या करने वाले) को कभी बख्शा न जाए यह आदेश दिया था। उन्होंने गाय और बैलों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की थी। परन्तु ब्रिटिश शासन में ईसाई पादरियों ने मतान्तरण करने, हिन्दू जनभावना की धर्म आस्था एवं विश्वास को तहस नहस करने और शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से भारतीय संस्कृति को नष्ट करने में लगे रहे।

यह सर्वविदित है कि सैनिकों को ऐसे कारतूस दिए जाते थे जिनमें गाय की चर्बी लगी होती थी और उन कारतूसों को दांतों से खोलना पड़ता था जो सीधे-सीधे हमारी संस्कृति पर हमला था। परिणामस्वरूप सन् 1857 में मंगल पाण्डेय के नेतृत्व मे सैनिकों ने विद्रोह किया जो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए विख्यात है। अंग्रेजों के शासनकाल में हिन्दी के लेखकों ने भी गोहत्या के विरोध में अपनी लेखनी उठाई थी। सन् 1879 में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली अखबार ‘सार सुधानिधि’ ने वेद और शास्त्रों से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए गोरक्षा के बारे में लेख प्रकाशित करता रहता था। जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा जाता था कि अंग्रेज हिन्दू को मुसलमानों से आपस में लड़ाने के लिए गोहत्या को बढ़ावा दे रहे हैं। ‘उचित वक्ता’ नामक अखबार ने 21 मई 1881 के सम्पादकीय अंक में लिखा था हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं का जरा सा भी ख्याल न करके हिन्दुओं के मोहल्ले में गोमांस की बिक्री की जाती है कोई भी अपने धर्म पर आघात कैसे सहन कर सकता है। सन् 1892 में प्रयाग से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘गोसेवक’ के लेखों में स्पष्ट रूप से यह कहा जाता था कि साधु-सन्तों ने गोरक्षा का अलख जगा रखा है और उन्होंने इसके लिए सन्यासियों, नागा साधुओं, बैरागियों की एक फौज खड़ी कर रखी है। सिख पन्त के गोभक्त कूका गोवध का विरोध करते हुए फांसी पर झूल गए थे और सिखों के दसवें गुरू गोविन्द सिंह जी-

यही देऊ आज्ञा तुर्क गाहे खपाऊ।

गऊघात का दोष जगसिंह मिटाऊ।।

कहकर चंडी भवानी से वरदान मांग रहे थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भी हमारे नेतागण भारतीय जनता को आश्वासन देते रहते थे कि आजादी मिलने के बाद गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाएगा। लोकमान्य तिलक की घोषणा थी कि स्वराज्य मिलने के बाद पांच मिनट में ही गोहत्या निषेध कानून बना दिया जाएगा। महात्मा गांधी प्राय: यह कहते थे कि गोहत्या निषेध कानून स्वराज्य से भी अधिक महत्वपूर्ण है। गांवों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए गोपालन और गोरक्षा प्रमुख साधन है।

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स्वतंत्रता मिलने के बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 19 नवंबर सन् 1947 को भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की ओर से सर दातारसिंह की अध्यक्षता में गोरक्षा एवं गोविकास समिति गठित की। जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ तब संविधान के अनुच्छेद-48 में गाय, गोवंश, दूध देने वाले पशु, कृषि कार्य एवं भार वहन करने वाले पशुओं का वध न होने देना राज्य की नीति निर्धारित की गयी। सन् 1952 की गोपाष्टमी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गोवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक हस्ताक्षर अभियान चलाया और लगभग दो करोड़ हस्ताक्षर लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सर संघ चालक गोवलकर जी के नेतृत्व में लाला हरदेव सहाय, संत प्रभुदत्त ब्रहाचारी, पूज्यपाद धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी और रामचन्द्र शर्मा वीर राष्ट्रपति भवन में डा. राजेन्द्र प्रसाद जी से मिले। सात नवम्बर सन् 1966 को लगभग 12 लाख गोभक्तों ने गोवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने के लिए संसद भवन पर विशाल प्रदर्शन किया जिसमें धर्म सम्राट कलपात्री जी, महाराज पुरीपीठाधीश्वर जगतगुरू शंकराचार्य, निरंजनदेव तीर्थ एवं प्रभुदत्त ब्रह्राचारी आदि सम्मिलित हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए बर्बरतापूर्वक कार्रवाई की, प्रदर्शनकारियों पर अश्रु गैस, लाठीचार्ज किया गया और साधु-सन्तों और महात्माओं ने स्पष्ट कर दिया कि हम पीछे नहीं हटेंगें। तब तत्कालीन सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाना आरम्भ कर दिया और देखते ही देखते वहां गोभक्तों की लाशें बिछ गयी।

तत्कालीन गृहमंत्री श्री गुलजारी लाल नंदा ने गृहमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके विरोध में सन्त प्रभुदत्त ब्रह्राचारी, जगतगुरू शंकराचार्य, निरंजनदेव तीर्थ और रामचन्द्र शर्मा वीर आमरण अनशन पर बैठ गए। तब जाकर सरकार नींद से जागी और गोहत्या बंदी कानून बनाने का आश्वासन देकर उनका अनशन तुड़वाया और केन्द्रीय मंत्री श्री जगजीवन राम की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया गया जिसमें राष्ट्रीय स्वय सेवक संघ के तत्कालीन सर संघ चालक गुरू गोवलकर जी, कामरेड अशोक मित्रा आदि सदस्य थे। समिति बिना कोई रिपोर्ट दिए मर गई। फिर सन् 1976 में आपातकाल के समय आचार्य विनोबा भावे गोवध निषेध कानून बनवाने के आमरण अनशन पर बैठ गए। जीवन के आखिरी पड़ाव में वयोवृद्ध आचार्य विनोबा भावे ने यह कदम उठाकर अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। उनके इस कदम से इन्दिरा जी घबरा गयी और झूठा आश्वासन देकर उनका अनशन समाप्त करवा दिया। इस प्रकार गोहत्या निषेध आंदोलन निष्प्राण हो गया जो अब तक मृत प्राय: पड़ा हुआ है।

सन् 1977 के आम चुनावों मे इन्दिरा जी की करारी हार हुई और उनके हाथों में सत्ता आ गयी जो इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे परन्तु गोहत्या निषेध कानून उन्होंने भी नहीं बनाया। जनता स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगी और ऐसा लगने लगा मानो यह आंदोलन गोरक्षा के लिए न होकर इन्दिरा विरोधी था। उसके बाद अनेकों सरकार आती रही जाती रही, सरकारे बदलती रही, गोवध निषेध कानून किसी ने नहीं बनाया। सन् 2014 के आम चुनाव में जनता ने मोदी को इसी आशा को फलीभूत करने के लिए वोट किया था कि यह सरकार आने के बाद गोवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाएगा परन्तु खेद की बात है कि उनके गृहराज्य मंत्री श्री किरण रिजिजू स्वयं यह मानते हैं कि वह गोमांस खाते हैं तो फिर गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात तो सोचना बेमानी होगा।

उपयुक्त विवेचन से इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि गोवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध न लगने का मुख्य कारण हमारी अर्थव्यवस्था है। भारत चमड़े और गोमांस का बहुत बड़ा निर्यातक देश है। चीन के बाद दूसरे नम्बर का देश भारत है जो चमड़े और गोमांस का व्यापार करता है कोई भी सरकार इस पर प्रतिबन्ध लगाकर आर्थिक घाटा उठाने को तैयार नहीं है। भारत में प्रति मिनट 28 गायें कत्ल की जाती है। सन् 1981 में 30908 टन मांस भारत से निर्यात होता था। फॉरेन ट्रेड बुलेटिन के फरवरी 1994 के अंक में बताया गया कि 230 करोड़ रूपये का वार्षिक निर्यात कत्लखानों के उत्पादन से हो रहा है और अब एक हजार करोड़ रूपये वार्षिक से अधिक हो रहा है और गोवध निषेध कानून न बनने का मुख्य कारण भी यही है परन्तु हमें निराश नहीं होना चाहिए। वर्तमान में केन्द्रीय सरकार नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में तथा उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ योगी की सरकार इस बारे में सजग और सचेत है और इस दिशा में प्रयासरत है। योगी सरकार ने अवैध कत्लखानों को बन्द कराने का आदेश दे दिया है। आशा है वे गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने में सफल होंगे क्योंकि उनका स्वयं का यह कहना है कि –

देश धर्म का नाता है। गाय हमारी माता है।।

श्रीकृष्ण मुदगिल

 

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