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पाइका विद्रोह: भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

पाइका विद्रोह: भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

1817 से लेकर 1825 तक ओडिशा में अग्रेजों के विरूद्ध खूनी विद्रोह हुआ, जिसे  ‘पाइका विद्रोह ‘ के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह पाइका विद्रोह हमारे देश की प्रथम आजादी की यलगार थी। पाइका विद्रोह गजपति महाराज के पूर्व कमाण्डर-इन-चीफ, बक्शी जगबंधु बिद्याधर महापात्रा के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हुआ जिसमे पाइका के साथ ओडिशा के स्थानीय नागरिकों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। बक्शी जगबंधु और इस विद्रोह के नायक न केवल कुशल सैन्य नेतृत्व करने वाले कमाण्डर थे बल्कि वह अपने सैन्य साथियों और लोगों के बीच में भी काफी लोकप्रिय थे। बक्शी जगबंधु की यही लोकप्रियता उनके नेतृत्व करते समय दिखाई पड़ती थी। अंग्रेजों के प्रति यह विद्रोह की आवाज धीरे-धीरे आग की तरह ओडिशा सहित अंग्रेजों के अधिकार वाली उन सभी गजाटों में पहुंच गई। यह लड़ाई लगभग 1817 से 1825 तक आठ वर्षो तक चली।

ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी ने ओडिशा के प्रबंधन को मराठाओं से समझौता कर 1803 में अपने अधिकार में ले लिया था। अंग्रेज शुरू से ही चालाक थे, अंग्रेजों ने खूरदाबी के राजा को अपने साथ में लाने के लिए पुरी के चार परगना को उनके अधिकार में देने का वचन दिया, जिस पर माराठाओं का अधिकार था। अन्त में जब मराठा पूर्ण रूप से राज्य से बाहर हो गये और पूरे राज्य पर ईस्ट इण्डिया कंपनी ने अपना अद्यिपत्य जमा लिया लेकिन अंग्रेजों ने महाराज को चार परगना जमीन नहीं लौटायी। अंग्रेजों के जमीन न देने के बावजूद भी राजा के मुख्यमंत्री श्री जयकृष्णा राजगुरू ने बलपूर्वक इन परागनाओं से राजस्व वसूला और अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। अन्तत: 1804 में राजा और अंग्रेजों के बीच भयंकर लड़ाई चली, जिसमें राजा की पराजय हुई। अंग्रेजों ने राजा और उनके मंत्री जय राजगुरू को मिदनापुर जेल में रखा। जय राजगुरू को अंग्रेजों ने मौत की सजा सुनाई, जिसमें उनकी निर्मम हत्या कर दी गई। खूरदाबी के राजा की छोटी उम्र होने के कारण उनको उनके पुरी के बालिसाही महल में रहने की अनुमति दे दी गई और उनके  आने-जाने पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।

ईस्ट इण्डिया कंपनी ने  धीरे-धीरे ओडिशा में शासन-व्यवस्था को काफी कठोर कर दिया। ओडिया किसी भी बाहरी शासन व्यवस्था को सहन करने के लिए तैयार नहीं थे। ईस्ट इण्डिया कंपनी के अधिकतर अधिकारी और राजकीय संचालन से जुड़े लोग बंगाल से लाये गये, जो ओडिशा के लोगों पर अत्याचार करने और उनके संपति को नुकसान करने का कोई कसर नहीं छोड़ते थे। पाइका मुख्य रूप से किसान थे, जो राज्य की सुरक्षा भी करते थे और इसके बदले उनको जमीन दी गई थी। पाइकाओं से सम्बंधित जमीन को पाइका जागीर के नाम से जाना जाता था, जिसपर वे कई पीढी से अपना अधिकार रखते थे। बिना किसी सूचना और मुआवजा के सरकार ने इनके जमीनों को निरस्त कर दिया। किसानों से वसूले जाने वाले राजस्व कर को बढ़ा दिया गया और कई सारे अन्य कर भी उनके ऊपर लाद दिये गये।  नमक व्यापार पर ईस्ट इण्डिया कंपनी का एकाधिकार होने के कारण चिल्का लेक पर नमक बनाने वाले कई नमक व्यापारी और श्रमिक बेरोजगार हो गये।  दूसरों को छोड़ दे स्वयं बक्शी जगबंधु की जमींदारी रोदंग पर भी श्री कु्रश्नाचंद्र सिंह नामक बंगाली दीवान के द्वारा कब्जा कर लिया गया। बक्शी जगबंधु  के कुछ करीबियों ने जमींदारी वापस लाने के लिए उन्हें अंग्रेजों के पास जाने की सलाह दी। लेकिन राज्य के सम्मानित व्यक्ति होने के कारण उन्होंने अंग्रेजों के पास जाने से साफ मना कर दिया, जिससे लोगों के बीच उनके प्रति असंतुष्टि और नाराजगी फैल गई।

बक्शी जगबंधु न केवल एक बहादुर और अनुभवी कमांडर थे, बल्कि वे अपने मातृभूमि के प्रति गहरे झुकाव के लिए भी प्रसिद्ध थे। उन्होंने दालबेहरा, दलाईस और अन्य पाइका नेताओं के साथ वार्ता की और उन्हे मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लडऩे के लिए प्रेरित किया। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोंगों का विरोध सुनियोजित था। अब लोग अंग्रेजी शासन से हर क्षेत्र में अपनी नाराजगी प्रकट करने लगे। बक्शी जगबंधु ने सभी लोगों से नमक पर अंग्रेजों  का एकाधिकार का विरोध करने तथा  चिल्का सहित समुंद्र तट के अन्य भागों से अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हुए नमक का संग्रह करने का परामर्श दिया। जंगल, पहाड़ी, नदिया और चिल्का झील के बीच होने के कारण बक्शी जगबंधु ने पुरी जिला के बनपुर को अपने सामरिक रणनीति के लिए उचित स्थान बनाया। उन्होंने अपने सबसे बहादुर कमांडरों में एक, भातपाडा दुर्ग के दालबेहरा श्री दिनबंधु समांतराय से पाइका और झुमसार से आये कांधास के साथ अपने नेतृत्व में अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई छेडऩे को कहा। 1 अप्रैल 1817 को अंग्रेज और उनके सैन्य अधिकारियों की पराजय हुई और उन्हें बनपुर से भागना पड़ा। पाइकाओं ने अंग्रेजों के कैंपों और सैन्य ठिकानों को जलाते हुए अवशेष में बदल दिया। बनपुर पुलिस स्टेशन को जलाते हुए सरकार द्वारा रखी गई पन्द्रह हजार की धनराशि को भी पाइका अपने साथ ले गये।  अंग्रेजों के विरूद्ध हुई यह विजय मानो अग्नि की तरह पूरे राज्य में फैल गई और बक्शी जगबंधु के परामर्श के अनुसार राज्य के लोगों ने अलग-अलग स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ लडऩा आरम्भ कर दिया। बक्शी जगबंधु बोलगढ़ होते हुए अपने विजयी पाइकाओं और दिनबंधु समंतराय के साथ खुर्दा पहुंचे। जब वह बोलगढ़ पहुंचे तो परशुराम राउत्रय, सचितानंद पटनायक और दामा सुबुद्धि बोल गढ़ पाइका के साथ उनके साथ जुड़े। संबलपुर की रानी जो पंचगाड़ा को नियंत्रण करती थी, भयाकुल होकर कटक की ओर भाग गई और उनका दीवान सदाशिवा राय मारा गया। बक्शी के खुर्दा पहुंचते ही पाइकाओं की संख्या बढ़कर पांच हजार हो गई।  लेक्रिटनेंट प्राईडक्स ने इतनी बड़ी सैन्य ताकत को देखकर इससे टकराने की हिम्मत नहीं दिखाई और अपने सैनिकों के साथ खुर्दा को छोडऩा ही उचित समझा। अप्रैल के पहले सप्ताह में ही बिना खून बहाये और किसी लड़ाई के पाइका ने खुर्दा पर अपना अद्यिपत्य जमा लिया। बक्शी क्रु्रश्नचन्द्र भ्रमरबार और अन्य पाइका सरदारों के साथ गंगापाढ़ा में लेक्रिटनेंट प्राईडक्स और लेक्रिटनेंट पेरिश के एकजुट सैनिकों के साथ लड़ाई लड़ी, जहां अंग्रेजों की हार हुई। इस लड़ाई में लेक्रिटनेंट पेरिश अपने सैनिकों के साथ मारा गया। ईम्फाई जो सेंट ड्रेविस और बंगाल पैदल सेना के साथ कटक से गंगापाढ़ा पहुंचा था उसे गंगापाढ़ा में ही पीछे हटना पड़ा।

पाइका का अगला लक्ष्य पुरी था, जहां खुर्दा के राजा मुकुन्द देव को बालिसाही महल में रखे गये थे। जब बक्शी जगबंधु पुरी पहुंचे तो पाइकाओं की संख्या दस हजार से अधिक तक पहुंच चुकी थी। कैप्टन विलिंगटन के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को यहां भी हार का सामना करना पड़ा। कैप्टन विलिंगटन अपने कुछ सिपाहियों, जिला अधिकारी व अन्य अफसरों के साथ कटक भाग गया। बक्शी जगबंधु राजा मुकुन्द देव  के साथ खुर्दा आ गये। इस महान विजय के कारण  लोगों के बीच काफी उत्साह था।

बनपुर, खुर्दा, गंगापाढ़ा और पुरी जैसे चार स्थानों पर मिली पराजय के कारण अंग्रेज पुरी तरह व्याकुल थे। इस प्रकार की भयभीत करने वाली क्रांति के ऊपर ब्रिटिश इतिहासकार जी टॉयनबी ने लिखा है ”जिस प्रकार की भयानक क्रांति पाइकाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ी थी वह अंग्रेजी सरकार के  अस्तित्व के लिए खतरनाक थी। भले यह क्रांति पूरे ओडिशा में नहीं थी, लेकिन खुर्दा में तो अवश्य ही थी।’’ इस प्रकार के भयानक हार के बाद ब्रिटिश सरकार ने मद्रास से बड़ी संख्या में सैनिको को बुलाया और ओडिशा के अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात किया। बक्शी की अनुपस्थिति में बंदूको से सुसज्जित अंग्रेजी सैनिकों ने गंगापाढ़ा पर हमला कर दिया, जिसमें कई पाइका मारे गये और अंग्रेजों की जीत हुई। यह पाइका और उनके क्रांति के लिए एक बड़ी पराजय थी। इस हमले के बाद बक्शी जगबंधु ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए जंगल और पहाडिय़ों के बीच रहकर गोरिल्ला युद्ध करना आरम्भ कर दिया। इस रणनीति के तहत बक्शी जगबंधु और उनके साथियों ने अंग्रेज अधिकारियों और सैनिकों पर अचानक हमला करते थे, जो 1825 तक चला।

गजाट राजा और जमींदार जो बक्शी जगबंधु के इस क्रांति को चलाने में सहायता करते थे, उन्होंने भी अंग्रेजों के दबाव में पाइका को सहायता राशि देना बंद कर दिया। बक्शी जगबंधु के लिये इतनी बड़ी संख्या वाली पाइका और उनके परिवार को चलाना मुश्किल हो गया। अब पाइका भी लगातार आठ वर्षो से अंग्रेजों के इतने बड़े सैन्य ताकत से लड़कर हार चुके थे। सरकार द्वारा जमीन हड़प लेने के कारण पाइका, पाइका नेता, दलाई और दालबेहरा लगभग भूमिहीन हो चुके थे और उनके परिवार के सदस्य भी भुखमरी का सामना करने लगे थे। इसके अलावा अंग्रेज प्रशासन अब इन पाइकाओं का उत्पीडऩ भी करने लगी थी। अंग्रेजों ने यह साफ कर दिया था कि जबतक बक्शी गुरिल्ला युद्ध करना बंद नहीं कर देता, पाइकाओं का इसी प्रकार उत्पीडऩ जारी रहेगा।

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अब ब्रिटिश शासन ओडिशा सहित पूरे देश में फैल चुका था, जिसको हमारे देश से हटाना लगभग संभव नहीं था। इस स्थिति में उत्पीडऩ का सामना कर रहे लोगों का भी मानना था कि गुरिल्ला युद्ध को खत्म किया जाये, जिससे वे अपने जीवन का शान्ति ढ़ंग से यापन कर सके। ब्रिटिश सरकार जो खुद शांति और बेदखल शासन चाहती थी, योजना के तहत बक्शी के साथ समझौता करने का निर्णय लिया। क्योंकि अंग्रेजी शासन का अभी भी मानना था कि बक्शी जगबंधु की लोकप्रियता लोगों में कम नहीं हुई है। अंग्रेज यह जानते थे कि बक्शी जगबंधु पर यदि किसी प्रकार की कार्यवाही की जाती है तो एक बार फिर लोगों का सरकार के प्रति विद्रोह भड़क जायेगा। अंगे्रजी सरकार बक्शी जगबंधु के करीबी मित्र और नयागढ़ के राजा से जगबंधु से लोग और प्रशासन के बीच शांति स्थापित करने के लिये गुरिल्ला युद्ध रोकने का निवेदन किया। जैसा की अंगे्रजों को भी पता था कि बक्शी जगबंधु लोगों और पाइका की भलाई के लिये किसी भी प्रकार का त्याग कर सकते है। सरकार ने यह विश्वास दिलाया कि यदि बक्शी जगबंधु  गोरिल्ला युद्ध बंद कर देते है तो लोगों के प्रति की जाने वाली सभी प्रकार की उत्पीडऩ रोक दी जायेगी और उन्हे सभी क्षेत्रों में न्याय दिया जायेगा। पाइकाओं के ‘जागीर’ को भी वापस दिया जायेगा। पाइका नेता अपने-अपने जमीन की पहचान भी कर सकेंगे। बक्शी जगबंधु शांतिपूर्वक और सम्मान से अपने लोगों और परिवारों के साथ कटक में रहेंगें। नयागढ़ के राजा ने अंग्रेजों द्वारा समझाये गये सारे समझौतों को बक्शी जगबंधु से साझा किया। चुकि लोगों ने भी इस सहमति में अपना समर्थन जताया था। उन्होंने बक्शी जगबंधु को यह समझाया कि अंग्रेजों को  ओडिशा से भगाना लगभग असंभव है और इनसे लडऩा उद्श्यहीन होगा। सभी बातों का सावधानी पूर्वक अध्ययन करने के बाद बक्शी जगबंधु ने लोगों के हित के लिये इन समझौतों में अपनी सहमति जताई। बक्शी जगबंधु को सारे सम्मान के साथ 27मई 1825 को हाथी पर लाया गया। बक्शी जगबंधु वहां अपने परिवार के साथ भी रहे। लेकिन वह अधिक दिन तक इस दुनिया में नहीं रह पाये।

पाइका विद्रोह करने वाले बक्शी जगबंधु की देशभक्ति अतुल्य है। उनको आने वाली पीढ़ी कभी नहीं भूल पायेगी। बक्शी जगबंधु ने अपने देश और लोगों के लिए अपने पूरे जीवन को न्यौछावर कर दिया। काश! ऐसा होता कि बक्शी जगबंधु देश के आजाद होने तक जीवित होते। अपने देश को स्वतंत्रता न दिलाने के दुख और पश्चाताप के साथ  महज चार वर्ष के अंदर ही देश के इतिहास में पहली स्वतंत्रता की आग को जलाने वाले महान देशभक्त, बक्शी जगबंधु ने 24 जनवरी 1829 को अपने जीवन को त्याग दिया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब देश के 17 लोगों ने अपने-अपने समय में अंग्रेजों का विरोध किया तों इसमें पाइका विद्रोंह को ही पहला स्थान क्यों दिया जाये? लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इन सभी बिद्रोहियों ने अपने पूरे जीवन काल तक मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों से नहीं लड़ा। ये सभी योद्धा बक्शी जगबंधु जैसे नेतृत्व के लिए प्रसिद्ध नहीं थे। उन 17 बिद्रोहियों ने देश की स्वतंत्रता के लिए न लड़कर अपने मुद्दों के लिए लड़ा। सिपाही विद्रोह को हम भले ही भारत का प्रथम स्वतंत्रता की लड़ाई मानते है लेकिन यह केवल सिपाहियों का विद्रोह था, जिसमें बाद में झांसी की रानी, तात्या टोपे और नाना साहेब ने भाग लिया। वैसे फिर भी हम सभी इस पर गौरवान्वित महसूस करते है।  सिपाही विद्रोह को अंग्रेजों ने महज चार वर्षों में 1859 तक समाप्त कर दिया जबकि पाइका विद्रोह आठ वर्षो तक चलता रहा। पाइका आंदोलन राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन जैसा आम लोगों और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिये था। सिपाही विद्रोह बिना किसी योजना के किया गया था जबकि पाइका विद्रोह सुनियोजित ढ़ंग से किया गया था, जिसमें बक्शी जगबंधु  की नेतृत्व क्षमता साफ झलकती है। जिस प्रकार से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों के एकाधिकार का विरोध किया गया, इससे पहले बक्शी जगबंधु के समय में भी अंग्रेजों के एकाधिकार का पाइकाओं के द्वारा उल्लंघन किया गया था। पाइका बिद्रोह में भी लोगों ने अंग्रेजों से असहमत होकर अंग्रेजों द्वारा की जाने वाली कर वसूली को देने से साफ मना कर दिया और इसी प्रकार का अंग्रेजों का विरोध हम राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय देखते है। इन सभी तथ्यों पर ध्यान देते हुए यह कहा जा सकता है कि पाइका विद्रोह जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से 40 वर्ष पहले किया गया था, वह देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम था।

(अनुवादक : रवि मिश्रा)

बी. बी. हरिचंदन

 

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