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बुल्डोजर नहीं, स्वच्छ विकास के लिए गडकरी की गंभीर सोच

बुल्डोजर नहीं, स्वच्छ विकास के लिए गडकरी की गंभीर सोच

एक बार अमेरिकी  राष्ट्रपति जान एफ. कैनेडी ने कहा था कि अमेरिकन रोड अच्छे हैं, इसका कारण यह नहीं है कि अमेरिेका धनी है। बल्कि अमेरिका धनी है, क्योंकि इसके रोड अच्छे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हाईवे, जहाजरानी और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस बात को अपने दिल पर ले लिया है और इसके फलस्वरूप वह पूरे देश को मजबूत सड़क नेटवर्क से जोडऩे के लिए जबरदस्त मेहनत करने में लगे हैं। इसमें कोई आश्चर्यचकित होने वाली बात नहीं कि नितिन गडकरी पूरे देश में लगभग 46 हजार किलोमीटर का राष्ट्रीय हाईवे बनाने की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने देश को शुद्ध वातावरण प्रदान करने की भी ठान ली है। नितिन गडकरी ने अभी हाल ही में यह निर्णय लिया कि वह 2030 तक देश के सभी ईधन वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों में परिवर्तित कर देंगे। वैसे इस महत्वाकांक्षी योजना को सफल बनाने के लिए एक संगठित योजना की आवश्यकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नितिन गडकरी अच्छा कार्य कर रहे हैं। लोग हस्तक्षेप करते रहेंगे, लेकिन यदि हमें अपने देश को विकसित करना है तो हमें आयात किये हुए ईंधन से छुटकारा पाना होगा। साधारण तौर पर भी देखे तो यह आयात हमारे हित में नहीं है।

आज, पूरे विश्व में औद्योगिक और मोटर वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के कारण वायु प्रदूषण एक गंभीर विषय बना हुआ है। ग्लोबल डेटा ऑफ डिजेज, 2010, के अनुसार पूरे विश्व भर में वायु प्रदूषण मुख्य 10 खतरों में से एक है। एशिया के विकासशील देशों में यह पांचवें पायदान पर है। भारत में भी वायु प्रदूषण के खतरे भयानक हैं, जिन्हें रोकने के लिये जल्द से जल्द नीति बनाने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में नितिन गडकरी द्वारा दिया गया इस प्रकार का वक्तव्य हमारे वातावरण की सुरक्षा के संदर्भ में उचित समय पर दिया गया है। पूर्व में भारत की किसी भी सरकार ने वायु प्रदूषण रोकने के संदर्भ में कभी भी इस प्रकार का निर्णय नहीं लिया।

यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि जिस ऑटो क्रयूल पॉलिसी ने बीएस-6 को 2024 तक लागू करने का सलाह दी थी, उसे सड़क परिवहन मंत्रालय ने 1 अप्रैल 2021 कर दिया। वर्तमान में भारत के 50 शहरों में बीएस-4 तथा बाकी बची जगहों पर बीएस-3 ईधन प्रदान कराया जाता है। लेकिन बीएस-6 के लागू होनें से भारत अमेरिका, जापान और यूरोपियन देशों की श्रेणी में सम्मिलित हो जायेगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने तो जनवरी 2016 में भारत सरकार से 1 अप्रैल 2021 से पहले ही बीएस-6 लागू करने को कहा था। कोर्ट के इस आदेश का अनुसरण करते हुए सड़क परिवहन मंत्रालय ने अपने निर्धारित समय में कटौती करते हुए 1 अप्रैल 2020 कर दिया। इसके अनुसार बीएस-6, 1 अप्रैल 2020 या इसके बाद के 3500 किलोग्राम से कम वाले मोटर वाहन मॉडलों पर लागू होगा। बीएस-6 को लागू करने के लिये मोटर कम्पनियों को अपनी टेक्नोलॉजी में बदलाव करने होंगे। अनुमानत: र्इंधन वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को 4 बिलियन डालर और ऑटो कम्पनियों को 7.5 बिलियन डॉलर खर्च करने होंगे। अत: यह सत्य है कि देश की कई बड़ी कंपनियां इसमें कोई रूची नहीं दिखा रही है। लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में भारत इसे वास्तविक बनाने के लिए तैयार है।

आटो इंडस्ट्री का कहना है कि 2030 तक देश के सभी ईधन वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों में परिवर्तित करना हिमालय के समान बड़ा कार्य है, आखिर सरकार इन इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए इतनी इलेक्ट्रिक चार्जर कैसे लगा पायेगी? लेकिन ये लोग यह भूल जाते हैं कि पूरे देश में पेट्रोल पम्प शुरू करने वालों की लम्बी सूची है। यदि इन्हीं लोगों को  इलेक्ट्रिक चार्जर की व्यवस्था कराने को कहा  जाय तो यह काम हमारे सोच से अति शीघ्र हो सकता है। मुझे ऐसा लगता है कि नितिन गडकरी द्वारा दिया यह निर्देश इस क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए भविष्यवाणी के समान है, जिससे ये लोग भविष्य में इस क्षेत्र में अपना निवेश न करें। उनके द्वारा इस काम को पूरा करने के लिए दिया गया समय, यह सुनिश्चित करता है कि ऑटोमोबाइल सेक्टर उनकी इस बात को गंभीरता से ले। यह कहना गलत नहीं होगा कि हम जिन देशों से अपना 80 प्रतिशत ईंधन का निर्यात करते हैं, उन देशों से डील करना आसान नहीं  है।

इलेक्ट्रिक वाहनों में वह सारी व्यस्थायें होंगी जो मोटर ईधन वाहनों में होती हैं। यदि कोई बदलाव होगा तो वह है मोटर इजन के स्थान पर इलेक्ट्रिक इंजन। वर्तमान में जल्द से जल्द नई इलेक्ट्रिक कारों को बाजार में लाने की आवश्यकता है। इसको पूरा करने के लिए 13 वर्ष की अवधि काफी अधिक है। इस पर अभी से ही काम करना आरम्भ कर देना चाहिए। लेकिन इसके लिए सरकार को आगे आकर बैट्री और बैट्री चार्जिंग की संरचना से जुड़े लोगों को सब्सिडी प्रदान करनी होगी। भारत को साथ ही सभी ऑटो कंपनियों को उनकी मैन्यूफैक्चर करने की संरचना में बदलाव करने पर भी बल देना चाहिए। लेकिन इससे पहले सरकार को इन इलेक्ट्रिक वाहनों से निकलने वाली बैटरियों का निपटारा करने के  लिये उचित नीति बनानी होगी। हमें भारत में बेचे जाने वाली वाहनों के प्रारूपों को समझना होगा। इलेक्ट्रिक वाहनों में प्रयोग की जाने वाली बैट्री लिथियम से बनी होगी और यदि हम देखे तो अन्य इलेक्ट्रिक यंत्रों में भी इसका प्रयोग होता है। अत: यह बिल्कुल साफ है कि लिथियम की मांग बढ़ेगी, जिससे इसका मूल्य बढ़ेगा और इसके कारण इलेक्ट्रिक वाहनों के मूल्य में भी बढ़ोत्तरी संभव है। लेकिन मैं अपनी बात खत्म करने से पहले इतना अवश्य कहूंगा कि साफ वातावरण की दृष्टिकोण से यह एक उचित कदम है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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