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सड़क पर दौड़ती मौत

सड़क पर दौड़ती मौत

हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख व्यक्ति सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हो कर मौत के आगोश में चले जाते हैं। सड़कों पर मौत वाहनों के रूप में दौड़ती रहती है। मोटरों का आविष्कार पन्द्रहवीं शताब्दी में हुआ था और आज दुनिया में भिन्न-भिन्न प्रकार के लगभग 2000 मॉडल वाले स्वचालित वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। राजधानी दिल्ली में वाहनों की संख्या पचास लाख से अधिक है जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय गिने चुने लोगों के पास ही निजी वाहन होते थे। इन वाहनों की बढ़ती वृद्धि के कारण ही सड़क दुर्घटना में मरने वाला हर दूसरा व्यक्ति पैदल यात्री होता है। एक ताजा अध्ययन के अनुसार विश्व में सबसे अधिक दुर्घटनाएं भारत में होती है और वे भी राजधानी दिल्ली में होती है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक एक हजार वाहनों के पीछे दस से अधिक सड़क दुर्घटनाएं हुई, इनमें प्रत्येक दस हजार व्यक्तियों में दस व्यक्तियों की मृत्यु सिर में चोट लगने के कारण हुई। प्रत्येक 663 मौतों के पीछे 246 पैदल यात्री, 151 वाहन यात्री और 137 साइकिल सवार थे।

सड़क दुर्घटनाएं मुख्यत: दो कारणों से होती है – एक तो सड़क के नियमों की अवहेलना करने से और दूसरे शीघ्रता करने से। यातायात प्रशिक्षकों का कहना है कि वाहन चालक या पैदल यात्री जरा सा भी धैर्य बरत लें तो सड़क दुर्घटनाओं में बहुत हद तक कमी आ सकती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जीवन की तीव्रता इन दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण है, इस तीव्रता ने तनाव, भय तथा असुरक्षा की भावना को जन्म दिया है। घर या कार्यालय आदि छोड़कर जब व्यक्ति सड़क पर आ जाता है तब भी मानसिक परेशानी या तनाव उसका पीछा नहीं छोड़ता और इस मानसिक तनाव से बेसुध हुआ व्यक्ति सड़क की क्रूरता से अनभिज्ञ व्यक्ति सड़क पर किसी से टकरा कर दुर्घटना का शिकार हो जाता है। ऐसा तनावग्रस्त व्यक्ति शारीरिक रूप से सड़क पर होता है परन्तु मानसिक रूप से वह कहीं दूसरी जगह होता है और इस मनोदशा के कारण वह किसी वाहन से टकरा कर दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त दुर्घटना के अन्य कारण हैं  – चालक की लापरवाही, वाहन में कोई खराबी होना, सड़क पर गड्ढे होना या स्पीड ब्रेकर का न होना, मौसम का ठीक न होना जैसे कोहरा, धुन्ध आदि का होना तथा यातायात की सुचारू व्यवस्था न होना। सड़क पार करते समय सड़क पर चलते समय पूर्ण सावधानी बरतना तथा यातायात नियमों का परिपालन करना आवश्यक है। वाहनों को सुरक्षात्मक दृष्टि से गतिशील बनाने के लिए कुशल चालक, अच्छी सड़क, अच्छे पुलिसकर्मी अपेक्षित होते हैं। पैदल यात्री को सावधानी बरतने तथा यातायात नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है क्योंकि यही वर्ग दुर्घटनाओं में अधिक लिप्त रहते हैं। सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए इन बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है – पैदल यात्री जेब्रा क्रासिंग पर ही सड़क पार करें, सड़क पर जाने से पूर्व किसी प्रकार के मादक द्रव का सेवन न करे, सड़क यातायात के नियमों की अवहेलना न करे, भवन निर्माण सामग्री सड़क पर न डाले, सड़क पर वाहन की मरम्मत न करें, बहुत तीव्र आवाज से हॉर्न न बजाए, वाहनों पर प्रकाश की पूर्ण व्यवस्था हो, सड़कों के किनारे चमकीले प्रतिबिम्ब वाले बोर्ड न लगाए।

सुचारू रूप से यातायत करने के लिए यातायात बहुल मार्गों पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए हर सड़क को दो भागों में बांटा गया है, एक भाग जाने वालों के लिए तथा दूसरा भाग आने वालों के लिए, इन भागों में दो-दो या तीन-तीन लेन बनाई गई है। दो लेन वाली सड़क पर बाई लेन वाहन के सामान्य गति से चलने के लिए सुरक्षित रहती है और दाई लेन पीछे से तेज रफ्तार से आने वाले वाहनों को आगे निकलने के लिए होती है, हल्के वाहनों के लिए ओवरटेकिंग के लिए दाई ओर की लेन होती है, ओवरटेक दाई ओर से ही करना चाहिए। यातायात बहुल सड़कों पर यातायात व्यवस्था के अन्तर्गत दाई ओर मुडऩा या ओवरटेक करना वर्जित होता है। पैदल यात्रियों के लिए पैदल पारपथ बनाया जाता है सड़क पार करने के लिए फुट ओवरब्रिज बनाया जाता है। चौराहों पर लाल बत्ती / हरी बत्ती की व्यवस्था की जाती है, हरी बत्ती होने पर ही सड़क पार करनी चाहिए। चालक को वाहन मोडऩे से पूर्व इशारा देना चाहिए और ओवरटेक करने से पूर्व हॉर्न बजा कर अगली गाड़ी को सचेत करना चाहिए जब अगली गाड़ी का चालक हाथ के इशारे से आगे जाने का संकेत दे तब ओवरटेक करना चाहिए। ओवरटेक करने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। दस मील प्रति घन्टे से दौड़ती गाड़ी को अगली गाड़ी से एक गाड़ी के बराबर फासला रखकर पार करना चाहिए तथा पिछली गाड़ी के चालक को यह ध्यान रखना चाहिए कि आगे का रास्ता 600 फीट तक साफ हो। दस मील प्रति घन्टा से जा रही गाड़ी को ओवरटेक करने के लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि आगे का रास्ता 1000 फीट तक साफ है साथ ही ओवरटेक करने से पूर्व चालक को अपनी गाड़ी का प्रतिबिम्ब अगली गाड़ी की पृष्टदर्शी दर्पण पर पडऩे देना चाहिए ताकि अगली गाड़ी का चालक सावधानी रख सके।

भारतीय टेक्नोलॉजी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली ने बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के कारणों तथा उपायों पर एक अध्ययन किया था तथा गहन अध्ययन के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। संस्थान के सहायक प्रोफेसर दिनेश मोहन द्वारा किए गए अध्ययन में सुरक्षा के लिए भारी वाहन ड्राइवरों के लिए 25 वर्ष की न्यनतम आयु सीमा तथा स्पीड गवर्नरों की सिफारिश की गई थी, रिपोर्ट में कहा गया है कि वाहनों की अगाड़ी का डिजाइन बदलने, सड़क सुरक्षा स्तर में सुधार, गोल चक्करों तथा सड़क पर यातायात को बांटने के साधनों के प्रयोग से भी लाभ होगा। उन्होंने कारों में दुर्घटना के समय फूल जाने वाले थैलों की भी सिफारिश की था। रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई थी कि ऊबड़-खाबड़ रास्तों, रेलवे फाटक, स्कूल तथा अस्पताल के पास गाड़ी की गति धीमी होनी चाहिए और इनके पास स्पीड ब्रेकर होने चाहिए, आगे रास्ता खराब है या आगे अस्पताल तथा स्कूल है इनके बारे में चमकते बोर्ड लगने चाहिए, स्कूल अस्पतालों के पास तेज आवाज से हॉर्न नहीं बजाने चाहिए।

Layout 1

इस प्रकार सड़क पर मौत से बचने के लिए इन सभी नियमों का ज्ञान तथा उनका पालन अवश्य होना चाहिए। दुर्घटनाओं से होने वाली मौतें हमारी मानवीय भूलों एवं यातायात नियमों का पालन न करने से होती हैं। यातायात विभाग ने दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए तीन प्रकार की व्यवस्थाएं की है- आदेशात्मक, उपदेशात्मक तथा संकेतात्मक। संकेतात्मक व्यवस्था हर चौराहे पर की जाती है। इस व्वयस्था के अन्तर्गत चौराहों पर हरी, लाल तथा पीली बत्ती की व्यवस्था की गई है। आदेशात्मक व्यवस्था समय स्थान, दिशा, स्टॉप गति तथा एरिया से सम्बन्धित है जिनसे यातायात की गतिशीलता बढ़ती है और सड़कों पर अनुशासन रहता है। उपदेशात्मक संकेत चालक को गाड़ी धीरे करना, सावधानी बरतना और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए होते हैं। ये तिकोने के नीचे चेतावनी पट पर दर्शाए जाते हैं। ये प्राय: रेलवे फाटक, दाए-बाएं मोड़, स्कूल, पहाड़ी, नदी, नाला, पुल, ऊबड़-खाबड़ रास्ते तथा सड़क के अन्तिम छोर को दर्शाते हैं।

जहां दाएं-बाएं से संकीर्ण सड़के, मुख्य सड़क से मिलती है वहां ब्लिंकर व्यवस्था की जाती है, यह दो प्रकार की होती है, लाल ब्लिंकर का अर्थ ऐसी जलती बुझती रोशनी है जो पाश्र्व सड़क से मुख्य सड़क पर जाने वाली गाड़ी को रूकने का संकेत देती है। पीली ब्लिंकर मुख्य सड़क पर दौडऩे वाली गाडिय़ों को धीमा करने तथा सावधानी से गुजरने का संकेत देती है। जिन क्षेत्रों में यातायात बहुत ही ज्यादा होता है और सड़के दोनों ओर के यातायात को वहन करने योग्य नहीं होती वहां वन वे ट्रैफिक की व्यवस्था की जाती है। दो लेन वाली सड़क पर बाई लेन वाहन के सामान्य गति से चलने के लिए सुरक्षित होती है तीन लेन वाले मार्ग पर बाई लेन भारी वाहनों के लिए तथा दाई लेने ओवरटेकिंग के लिए होती है। ओवरटेक दाईं ओर से ही करे परन्तु खड़ी हुई गाड़ी को बाई ओर से भी ओवरटेक कर सकते हैं। इन दुर्घटनाओं से होने वाली मौतें राष्ट्रीय क्षति है, इनसे हमारी संस्कृति, कला, विज्ञान, अर्थ तथा साहित्य का ह्रास होता है क्योंकि हर जीवित व्यक्ति इन क्षेत्रों में कुछ न कुछ अपना निजी योगदान अवश्य देता है, यहां उल्लेखनीय है कि मोदी मंत्रिमंडल में नवनियुक्त केन्द्रीय मंत्री श्री गोपीनाथ मुंडे सड़क दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं। उनसे पूर्व मनमोहन सरकार के महत्वपूर्ण सदस्य श्री राजेश पायलट भी सड़क दुर्घटना की भेंट चढ़ चुके हैं और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केन्द्रीय मंत्री रह चुके श्री साहब सिंह वर्मा भी सड़क दुर्घटना में अपनी जान गवां चुके हैं, ये तो कुछ गिने चुने उदाहरण हैं ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे सामने हैं जिनकी मौत से हुई क्षति की भरपाई आज तक नहीं हो पाई। इसलिए यह आवश्यक है कि सड़क दुर्घटनाओं पर अविलम्ब रोकथाम की जाए अन्यथा न जाने कौन कब इन दुर्खटनाओं का शिकार हो जाए। यातायत विभाग द्वारा निर्धारित यातायात नियमों का पालन करने से सड़क दुर्घटनाओं में रोकथाम हो सकती है। सावधानी दुर्घटना की सबसे बड़ी रोकथाम है। कभी-कभी दूसरे की भूल से भी दुर्घटना हो जाती है अत: सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सभी को सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक है। यातायत को सुचारू रूप से नियन्त्रित करने के लिए केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं है, जनता के द्वारा सड़कों के नियमों का पालन करना तथा यातायात पुलिस को अपना सहयोग देना भी अति आवश्यक है।

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