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बुरा न मानो होली है

बुरा न मानो होली है

By मनोज समदरिया

आज सुबह के अखबार में गर्दन घुसाये वह खबर ढूंढ रहा था जिसमें होरी की गारी हो। मेवे-मिश्री की खुशबू हो और गुलाल से तर कन्याओं की तस्वीरें हों। लेकिन ऐसा कुछ मिल ही नहीं रहा। तभी हमारे पड़ोसी चचा दाढ़ी चले आये। इनकी भी नींद उचटती है तो नजर हमारे ही दरवज्जे पर टिकती है। कब चाय की खुशबू आये और ये जनाब हमारे यहां तशरीफ ले आएं। खैर अयूब मियां जिन्हें लोग प्यार से चचा दाढ़ी कहते हैं, वे पधार चुके हैं। हमसे बिना इजाजत लिये मुखातिब होकर बोले, सब खैरियत तो है मुसाफिर सिंह जी!

मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही वे टपाक से बोले – गजब समय चल रहा है श्रीमान। होली, दिवाली कुछ पता ही नहीं चलता। जब जी में आया तड़ तड़ तड़ फोड़ दिये पटाखा। बदले में का मिला? बाबाजी का आशीर्वाद। फिर पांच साल बाद मिलेगे का वादा और फर्जी दावा। वे अखबार बांचे बिना उसका मजनून सुना रहे थे। मैंने कहा – आप क्यों खामखां परेशान हो रहे हैं। होली आ गयी, मजे लिजिए। वैसे भी बुड्ढ़ों के लिए यह त्यौहार काफी फायदेमंद है।

14-03-2015

चर्चा ने फर्ज से अर्ज किया – अजी क्या खाक फायदेमंद है साहब, आजकल बुड्ढे ही सताए जा रहे हैं। देखा नहीं आपने सत्ताधारी दल के बुजुर्ग मंडली का क्या हाल हुआ। पता नहीं कौन से भवन में शयन कर रहे हैं। अब सुनते हैं पुरातन पार्टी के भी बुड्ढों पर शामत आने वाली है। अरे ऊ.. बाबा नाराज हैं। पता नहीं कहां अज्ञातवास पर चले गये हैं।

मैंने कहा – चचा दाढ़ी, आप होली जैसे मस्त, हंसी-खुशी और हुरियारे वाले समय कैसी कसमसाई-कसमसाई बातें कर रहे हैं। गुस्सा थूक दिजिए। वे बोले – हुंह… आप थूक दिजिए गुस्सा। पढ़े-लिखे न जाने क्या-क्या लोग न हैं आप? कैसे लोगों को झूठा रंग लगाकर होली की मुबारकबाद दी जा रही है, यह देखकर खून नहीं खौलता आपका। मैं समझ गया कि चचा दाढ़ी ने आज फिर उसी सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र सरीखे राजनेता का सपना देख लिया है, जो सच को सुना सुनाकर झूठ से प्यार करने के लिए मजबूर करने लगा है।

मैंने तुरंत श्रीमतीजी को आवाज लगाई – अजी सुनती हो। इससे पहले कि चचा दाढ़ी का गुस्सा उबलकर, बबल बन जाय, जल्दी चाय उबाल लाओ। श्रीमती तुरंत हाजिर थीं। उन्होंने चाय का कप आगे बढ़ाते हुए चचा दाढ़ी को सलाम किया तब उनके चेहरे की कुछ शांति की झुर्रियां दिखाई दीं।

14-03-2015

लेकिन चाय का पहला ही सिप लेते हुए दुबारा उबल पड़े। बोले – देखा? सब फ्री-फ्री बोल के राजा बन गया, अब बोलता है देखेंगे जी, सोचेंगे जी। अजी ये है क्या? कैसा उल्लू बनाते हैं लोग, जनता को। चचा बोलते जा रहे थे। उन्होंने कहा – मुसाफिर भाई एक बात बताओ क्या बोल-बोल के, बोल-बोल के इतना भी बोला जा सकता है कि लोग आपको प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बोलने लगें। मैं समझ गया इनका इशारा किधर है। मैंने भी उनकी हां में हां मिलाई और बोला – दिल्ली में दो राजा हरिश्चन्द्र राज्य कर रहे हैं। अब देखते हैं सत्य का मान रखने के लिए ये कितने-कितने रंग, कितने ढंग बदलते हैं और किसके संग चलते हैं।

तभी मेरे तीन साल के बेटे टिंचू ने हरे रंग से भरी पिचकारी चचा पर उड़ेल दी। सफेद कुर्ता हरा-भरा हो गया और उनका चेहरा खुशी से लाल हो गया। चचा ने गपाक से होली की मुबारकबाद दी और बोले – इन बड़े-बड़े देशों में छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं। फिर मैं भी झूमकर बोला – छोड़ो ये सब अर रर…जोगिरा सररर।

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