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विज्ञान और अध्यात्म

विज्ञान और अध्यात्म

विज्ञान के प्रगति को जब हम अपने व्यक्तिव की प्रगति मानने लगते हैं तो यह गलत होगा। यह विज्ञान मनुष्य के जीने के तरीके को सरल जरूर बना सकता है, लेकिन संपूर्ण रूप से आनंददायक नहीं बना पाया है। विज्ञान के कारण दुनिया में रहने वाले लोगों के रहने का रंग-ढंग जितना अधिक बढ़ता जाता है उतना ही अधिक हमारे अंदर की मनुष्यता घटती जाती है। मनुष्य जो कि भावना से पूर्ण एक प्राणी है उसकी भावना जैसे धीरे-धीरे कम होती जा रही है। हमारी भावना में इतनी ताकत होती है, जो कोसों दूर रहने वाले अपनों के हृदय को छू सकती है। अपनी भावना के द्वारा हम प्रत्येक संपर्क को मजबूत करने में सक्षम भी हो सकते थे। आजकल हम जैसे इन्हीं भावनाओं को संदूक में बंद करके रखते हैं। हम अपने अंदर रहने वाले अपने अस्तित्व को भूल जाते हैं। हमारे मुनि-तपस्यिों ने योग और कठिन तपस्या के द्वारा यह साबित कर चुके हैं। स्थल दुनिया से सूक्ष्म दुनिया कितना अधिक बलवान होता है, यह प्रमाणित हो चुका है। लेकिन हम अधिक से अधिक उसी दुनिया में ही डूबे रहते हैं।

धीरे-धीरे समाज में इस यांत्रिक प्रगति को देखकर मन में अजीब सा डर महसूस होता है। अपने आस-पास रहने वाले यंत्रों के साथ रह कर हम अपने आपको भी यांत्रिक मानव में रूपांतरित करने लगे हैं। सर्वप्रथम मनुष्य ने विज्ञान और वैज्ञानिक तकनीक को अपने सुख को ध्यान में रखकर वृद्धि किया था। लेकिन उसे यह ज्ञान नहीं था कि एक दिन वही विज्ञान ही मनुष्य से उसकी मनुष्यता को चुरा ले जाएगा। जिस खुशी को पाना हमारा पहला आग्रह था वही खुशी अपने पास आकर भी उसे पाने का हमारे अंदर दिल नहीं है।

समय के साथ-साथ खुद को बदलना गलत नहीं है, लेकिन हम जब इतना अधिक बदल जाते हैं कि खुद के अस्तित्व ही भूल जाते हैं तो यह चिंता की बात होती है। अब समय आ गया है जब हम खुद को खुद के अंदर से बाहर निकाल लें कि, दिन में हमारा कुछ समय ऐसा हो कि हम कोई भी यंत्र का प्रयोग ना करें। अध्यात्मिक मार्ग में खुद से हमें खुद को जोड़ कर रखना होगा। प्राणायाम आदि के माध्यम से अपने अंदर की तरफ यात्रा शुरू कर लेनी चाहिए। हमें धीरे-धीरे उसे एहसास में डालने से हमारे जीवन में कोई भी कठिन परिस्थितियों को हम अत्यंत सरलता से सुलझा सकते हैं। यंत्र का प्रयोग उतना ही करें जितना कि हमें जरूरत है। सबकुछ करके भी अपनी जड़ से जुड़ाव को खत्म नहीं करना चाहिए। जैसे पेड़ की जड़ जितनी अधिक जमीन के साथ जुड़ी रहती है, उतनी ही अधिक वो मजबूत हो जाती है जिसे कि कोई भी आसानी से नष्ट नहीं कर पाता है।

अध्यात्मिक मार्ग में चलने वाले व्यक्ति, आसानी से बाहरी चीजों से प्रभावित पहीं हो पाते हैं। हमें अपने खुद पर इतना विश्वास होना चाहिए कि हम जिसके उपर निर्भर रहते हैं वह हमारे सामने कमजोर पड़ जाए। हमारे जीवन में हम मशीनों का, भले ही वह मोबाईल फोन ही क्यों न हो प्रयोग उतना ही करें जितना कि कम-से-कम जरूरत हो। हम उन सभी चीजों का दास बन के न बैठें। उसके बगैर हम खुद की पहचान भी खो न दें। हमारे अंदर के सोते हुई परमशक्ति को जाग्रत करें। खुद को मशीन ना बना कर एक संपूर्ण मानव बनाने का प्रयास हमारे अंदर होना चाहिए।

उपाली अपराजिता रथ

 

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