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एक कर्मयोगी  और एक अबोध

एक कर्मयोगी  और एक अबोध

गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव के कारण एक बार फिर गुजरात और मोदी सुर्खियों में छा गये हंै। इस बार भी नरेन्द्र मोदी के आलोचक उनका विरोध करने में कोई कसर नही छोड़ रहे हैं। क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि वे अपनी बनावटी बातों से मोदी नामक सुनामी को रोकने में सफल हो जायेंगे। जिस प्रकार से भाजपा उत्तर प्रदेश में विजयी हुई, तभी से इन आलोचकों ने भाजपा, मोदी और मोदी सरकार की आलोचना करने की शैली में बदलाव किया है। उदाहरण के तौर पर यदि कांग्रेस के राजकुमार और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को देखे तो उन्होंने भी गुजरात चुनाव में विजय पाने के लिये जाति पर आधारित अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले कुछ नेताओं का दामन पकड़ लिया है। राहुल गांधी के सलाहकारों ने राजनीतिक लाभ पहुंचाने के लिए, राहुल को कुछ विशेष समुदाय से जुड़े मामलों को उठाने का परामर्श दिया है। 8 नवम्बर को नोटबंदी के एक वर्ष होने पर राहुल गुजरात की वित्तीय राजधानी कहे जाने वाले सूरत शहर के उन व्यापारियों से मिलें, जिनके मन में जीएसटीके प्रति थोड़ा कड़वाहट है। बिना कुछ सोचे-समझे कांग्रेस, आर्थिक सुधार के संदर्भ में मोदी सरकार द्वारा जीएसटी और नोटबंदी पर लिये गये निर्णय का विरोध कर रही है और यहां तक कि कांग्रेस पाटीदार समुदाय द्वारा हो रही आरक्षण की मांग का भी फायदा उठाने का भरपूर प्रयास कर रही है।

सबसे मुख्य बात यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी के पास मोदी पर निशाना साधने के लिए कोई मुद्दा है? उत्तर यही होगा कि वर्तमान हालात में कांग्रेस के पास कोई मुद्दा ही नहीं है। लोगों के मन को टटोलने के लिए मैंने हाल ही में गुजरात का दौरा किया। इस दौरे में मैंने सूरत, राजकोट और गांधीनगर जैसे स्थानों पर गया। मैंने व्यापारी वर्ग, आम आदमी, किसान और सरकारी कर्मचारियों से बात की। हां यह सत्य है कि इनमें से कुछ लोग जीएसटी से परेशान हैं, लेकिन उनका भी मानना था कि जीएसटी कोई विध्वंसक विचार नहीं है, इसमें केवल कुछ सुधार की आवश्यकता है। जब मैने एक कपड़ा व्यापारी से इस संदर्भ में बात की तो उस महानुभाव ने जीएसटी के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट की। उन्होंने बताया की जीएसटी के कारण कपड़ा उद्योग थोड़ी समस्याओं का सामना कर रहा है, जिसे हल किया जा सकता है। फिर इस संदर्भ में मैंने उनसे भाजपा के विरोध में मत देने के संबंध में पूछा तो उन्होंने बिल्कुल साफ शब्दों में कहा कि हम नरेन्द्र मोदी का कभी भी विरोध नहीं कर सकते। आज यदि हमारा व्यापार बढ़ा है तो उसके पीछे नरेंद्र मोदी का ही हाथ है, जिन्होंने हमे हमेशा एक वैश्विक वातावरण प्रदान किया। इन सभी लोगों का मानना था कि फार्मा सेक्टर से लेकर बायो-टेक्नोलॉजी और कपड़ा उद्योग तक को बढ़ाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में अपने कार्यकाल के दौरान अंतर्राष्ट्रीय स्तर की संरचना व्यापारियों को उपलब्ध कराई थी।

गुजरात के आनंद जिले के डाकुर में मैंने एक किसान भाई से उनकी राजनीतिक भावना को जानने का प्रयास किया तो उन्होंने कहा कि बिना किसी शर्त के वह नरेंद्र मोदी को समर्थन करेंगे। अपने इस दौरे में मैंने यह साफ पाया की मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, गुजरात के कुछ लोगों में गुजरात के स्थानीय नेताओं के प्रति थोड़ा मन-मुटाव है और इसके पीछे  गुजरात भाजपा के नेताओं के बीच कुछ आपसी तनाव एक कारण है। बात तो यहां तक चल रही है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के बीच भी कुछ तनाव है। हालांकि यह मुद्दा इस चुनाव में उतनी अहमियत नहीं रखता। गुजरात में चारों तरफ लोग नरेंद्र मोदी की ही बात कर रहे है। यहां यह कहना महत्वपूर्ण होगा कि अभी भी राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध किसी भी प्रकार का माहौल नहीं बना पाये हैं। न केवल गुजरात में, बल्कि पूरे भारत में नरेंद्र मोदी की छवि अभी तक पाक साफ रही है। नरेंद्र मोदी हमेशा विकास पुरूष के रूप में जाने जाते रहे है। अत: वह आज भी गुजरात के लोगों के दिलो-दिमाम में विद्यमान है।

दिल्ली में बैठी मीडिया में हार्दिक पटेल और राहुल गांधी की सभा में उमड़ी भीड़ की बात चल रही है। हमने भूतकाल में भी कई सभाओं में  उमड़ी भीड़ को देखा है, लेकिन क्या यह भीड़ वोटों में तब्दील हो पाती है? आजकल राजनीतिक सभाओं में हुई भीड़ एक चर्चा का विषय बना दिया जाता है। लेकिन किसी का भी इस भीड़ के सहारे किसी भी राजनीतिक दल के प्रदर्शन का आंकलन करना गलत होता है। मेरा मानना है कि गुजरात में भाजपा के 22 वर्षों के शासन के बावजूद नरेन्द्र मोदी के प्रति यहां के लोगों का विश्वास घटा नहीं, बल्कि बढ़ा ही है। भारत के मतदाता अब काफी परिपक्व हो चुके हैं, वे परफार्मिंग-मोदी और राहुल जैसे नन-परफार्मिंग एसेट मे साधारण पूर्वक अंतर कर सकते हैं। जब भी किसी राज्य में चुनाव की घोषणा होती है तो लोगों के मन-मस्तिष्क में मोदी-मोदी-मोदी के नारे गूंजने लगते हंै। इन्हें पता है कि भारत को मोदी जैसे ताकतवर नेतृत्व की आवश्यकता है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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