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स्वाभाविक प्रयास आवश्यक

स्वाभाविक प्रयास आवश्यक

गत 29 अक्टूबर को हरिद्वार प्रेस क्लब में एक पत्रकार वार्ता के माध्यम से कुछ पत्रकार मित्रों से बड़ी आकर्षक चर्चा हुई। पत्रकार वार्ता में कई बार मुझे यह कहना पड़ा कि हम पत्रकार वार्ता में हैं, न कि किसी डिबेट यानी वाद-विवाद में। वास्तव में वह पत्रकार वार्ता, जो एक परिचर्चा का बार-बार रूप धारण कर ले रही थी, मेरे साथ उन पत्रकार मित्रों को भी बहुत आनंद आ रहा था।

एक पत्रकार मित्र ने मुझसे पूछा कि दलित क्या है और कब से दलित शब्द का प्रयोग प्रारंभ हुआ? क्या दलित शब्द के प्रयोग को भाजपा बंद करने का प्रयास कर रही हैं? मैंने कहा कि दलित शब्द 1931 की जनगणना में अंग्रेजों द्वारा ‘डिप्रेस्ड क्लास’ शब्द के रूप में प्रयोग किया। उसी शब्द का डॉक्टर आंबेडकर द्वारा मराठी में दलित शब्द के रूप में अनुवाद हुआ एवं कालांतर में यही दलित शब्द सभी भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने लगा। दलितों के संदर्भ में स्थापित संबोधनों को बदलने का एक प्रयास गांधी जी ने एवं एक प्रयास ब्रिटिश इंडिया सरकार ने भी किया। गांधी जी ने अपने एक मित्र एवं तात्कालिक दलित नेता श्री राजभोज जो नासिक के रहने वाले थे, उनके सुझाव पर हरिजन शब्द रखा। कालांतर में इसे ब्रिटिश भारत सरकार ने 1936 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में प्रस्तावित किया।

डॉक्टर अंबेडकर ने तो एक बार महार महासभा की बैठक में यहां तक कहा कि नाम बदलने या छिपाने से कोई अंतर नहीं पड़ता।

एक पत्रकार मित्र ने कहा कि दलित शब्द उपयोग बंद होना चाहिए क्योंकि दलित के रूप दयनीय स्थिति में तो सभी वर्ग-जाति के लोगों को देखा जा सकता हैं। हमने उत्तर दिया कि  एक बार भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने दलित की जगह वंचित शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ किया। इस संदर्भ में हमने भाजपा के एक वरिष्ठ नेता से पूछा कि वंचित का अर्थ होता है मूलभूत आवश्यकता की वस्तुओं से वंचित होना जैसे रोटी, कपड़ा और मकान। इस आधार पर एक ब्राम्हण जाति का भी व्यक्ति वंचित हो सकता है, एक क्षत्रिय जाति का भी व्यक्ति वंचित हो सकता या अन्य किसी वर्ग जाति का व्यक्ति वंचित हो सकता हैं। परंतु क्या एक ब्राह्मण जाति का व्यक्ति दलित हो सकता है या एक क्षत्रिय जाति का व्यक्ति दलित हो सकता हैं। दलित का न्यूनतम अर्थ होता है अछूत एवं जाति व्यवस्था में निम्न और सामाजिक शक्ति के नाम पर शून्य। इसलिए दलित शब्द से किसी अन्य को बांधना स्वाभाविक नहीं  हैं।

एक पत्रकार मित्र ने पूछा कि दलितों का आरक्षण कब तक दिया जाय? मैंने कहा जब तक सामाजिक समस्या का समाधान नहीं होता तब तक क्योंकि दलित समस्या एक सामाजिक समस्या हैं, न कि राजनीतिक या आर्थिक समस्या।

एक पत्रकार मित्र ने पूछा कि दलित समस्या तो देश से समाप्त हो गई है अब हम उसे व्यर्थ में ढ़ो रहे हैं? हम ने उत्तर दिया कि दलित समस्या पहले से ज्यादा कष्टदायक हो गई हैं। पहले अशिक्षित एवं निर्धन दलित वर्ग के लोग इसे भाग्य का खेल समझ कर स्वीकार कर लेते थे, परन्तु डॉ अंबेडकर के प्रयास एवं भारत सरकार के संविधान के माध्यम से प्रदत्त  अधिकार के बाद आजके पढ़े  लिखे  शिक्षित दलित वर्ग के लोगों  के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव असहनीय होते हैं।

एक पत्रकार मित्र ने पूछा कि दलित वर्ग में जन जागरण का कार्य भारतीय जनता पार्टी की सरकार को करनी चाहिए? हमने कहा कि दलित समस्या दलित वर्ग की नहीं हैं, बल्कि सामान्य वर्ग की हैं। इसलिए जन-जागरण सामान्य वर्ग में होना चाहिए न कि दलित वर्ग में। ऐसे ही अनेकों प्रश्नों का उत्तर देते हुए पत्रकार वार्ता जब समाप्त हुई तो सायंकाल होने के कारण अंधेरा होने लगा था। स्वाभाविक प्राकृतिक प्रकाश समाप्त हो रही थी और कृत्रिम प्रकाश से पत्रकार वार्ता का हाल चमकने लगा था।

विजय सोनकर शास्त्री

 

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