ब्रेकिंग न्यूज़ 

एक थे जिन्ना एक थी रत्ती

एक थे जिन्ना एक थी रत्ती

पाकिस्तानी मूल के लेखक और पत्रकार तारिक फतेह ने कायद-ए-आजम कहे जाने वाले पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पर निशाना साधते हुए उन्हें पेडोफाइल (बच्चों का यौन शोषण करने वाला) करार दिया है। तो थोड़ा अचरज हुआ। जिन्ना की निजी जिंदगी के पन्ने पलटने पर पता चला कि फतेह जिन्ना की प्रेम कहानी का जिक्रकर रहे हैं गौरतलब है जिन्ना ने अपने से आधी से भी कम उम्र की लड़की से शादी की थी। हाल ही में पत्रकार शीला रेड्डी की पुस्तक आई है मिस्टर एंड मिसेस जिन्ना।

तो एक थे कायदे आजम जिन्ना, एक थी रत्ती। बहुत अनोखी थी उनकी प्रेम कहानी। जिन्ना मुस्लिम थे रत्ती पारसी। जिन्ना चालीस साल के अधेड़ थे तो रत्ती उनसे चौबीस साल छोटी। अभी बालिग भी नहीं हुई थी। मगर दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे थें। फिर  सारे जमाने से लड़कर  जिन्ना ने उससे शादी भी की थी। बहुत अनोखी मगर बहुत ट्रैजिक थी उनकी प्रेम कहानी।

मुंबई के समृद्ध और प्रतिष्टित पारसी पेटिट परिवार में फरवरी 1900 को रतनबाई पेटिट का जन्म हुआ। पेटिट परिवार मुबंई के पेडर रोड  एक विशाल बंगले में  रहता है। परिवार के कई बंगले पुणे दार्जिलिंग और कई रमणीक स्थानों पर थे। रत्ती एक आकर्षक और प्रतिभाशाली बच्ची थी। कला और साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। देश के स्वतंत्रता संग्राम  की लहर से भी अछूती नहीं थी। परिवार में उस जमाने कई राजनीतिज्ञों और नेताओं का आना जाना लगा रहता था। रत्ती उनकी बातचीत और बहस चर्चाएं अक्सर सुनती रहती थी। उनकी दो बुआओं की राजनीतिक हलचलों में गहरी दिलचस्पी थी। उनके साथ वह अक्सर बम्बई की राजनीतिक सभाओं और  मीटिंगों में जाती रहती थी। मुंबई के सामाजिक, राजनीतिक और व्यापारिक क्षेत्र के दिग्गजों के बीच चालीस की उम्र पार कर चुके जिन्ना का व्यक्तित्व कई कारणों से विशिष्ट था। जिन्ना तब अपने पेशेवराना और सार्वजनिक जीवन के चरम पर थे। इंग्लैंड जाने से पहले उन्होंने मां के आग्रह पर शादी भी कर ली लेकिन वह शादी ज्यादा दिनों तक नहीं निभी। 1915 में बंबई में जिन्ना के बारे में वोलपर्ट ने लिखा है: ”किचनर की तरह बड़ी मूंछें, स्याह बाल और कटार की तरह पतले जिन्ना रोनाल्ड कोलमैन की तरह बोलते थे, एंथनी इडेन की तरह कपड़े पहनते थे। पहली ही नजर में ज्यादातर महिलाएं उनकी प्रशंसक बन जाती थीं और ज्यादातर पुरुष उनसे ईष्र्या करते थे। सर दिनशा पेटिट से उनकी अच्छी मित्रता थी। जिन्ना का उनके घर  अक्सर आना जाना होता रहता था। जीवन के  सबसे खतरनाक माने जाने वाले सोलहवें वर्ष की दहलीज पर खड़ी रत्ती के मन में धीरे धीरे अपने पिता के उम्र के इस सुदर्शन प्रौढ़ के प्रति कहीं न कहीं आकर्षण का अंकुर फूटने लगा था। दूसरी तरफ जिन्ना मनोरम व्यक्तित्व की रत्ती में हो रहे परिवर्तन को अनदेखा करने की स्थिति में नहीं रह गए थे। जिन्ना के व्यक्तित्व से प्रभावित रत्ती उनके हर सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने लगी थी। लेकिन धर्म और उम्र की दूरी के कारण दोनों के बीच पनप रहे प्यार को अभिव्यक्त होने का  मौका नही मिला था। तभी जिन्ना पेटिट परिवार के साथ गर्मियां बिताने के लिए अप्रैल 1916 में दार्जिलिंग पहुंचे। दार्जिलिंग की वादियों में दोनों को पहली बार एक दूसरे की कोमल भावनाओं का अहसास हुआ। जब वे वापस लौटे तो दोनों के मन में एक साथ जीवन बिताने के खूबसूरत सपने पल रहे थे।

जनवरी 1917 की एक शाम सर दिनशा पेटिट के बंगले पर  विभिन्न धार्मिक समुदायों की एकता पर चर्चा के दौरान जिन्ना ने उनसे विभिन्न समुदायों के बीच वैवाहिक रिश्तों के बारे में उनकी राय जाननी चाही। सर पेटिट की राय इसके लिए अनुकूल थे। इस मौके का लाभ उठाते हुए जिन्ना ने थोड़ा झिझकते हुए उनकी बेटी रत्ती के साथ शादी का प्रस्ताव रख दिया। कुछ समय पहले व्यक्त किए गए अपने उदार विचार की ऐसी परिणिति से सर पेटिट चौकं गए। और गुस्से से उबल पड़े। उनसे केवल तीन साल छोटे एक प्रौढ़ से उनकी सोलह साल की किशोर बेटी की शादी की बात उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोची थी। परिवार की मेहमानवाजी और मैत्री संबंध  का लाभ उठाते हुए किशोर बेटी के साथ प्रेम संबंध बढ़ाने की जिन्ना की कोशिश का उन्हें अनैतिक लग रही थी। उन्होंने जिन्ना के इस असंस्कृत प्रस्ताव को गुस्से के साथ खारिज कर दिया। प्रेमलिप्त बैरिस्टर जिन्ना की सारी दलीलें और अपीलें बेकार गई थीं। इसके बाद जिन्ना और पेटिट की दोस्ती तो दूर रही बातचीत भी बंद हो गई थी। पेटिट ने शादी की मंजूरी तो दूर रही रत्ती के जिन्ना से मिलने पर भी रोक लगा दी थी। फिर उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनके आवेदन पर पारसी विवाह कानून के प्रावधान के तहत रत्ती के जिन्ना से मिलने पर सख्त रोक लगा दी गई थी। और रत्ती को अपने विवाह के बारे में फैसला लेने के लिए अक्षम धोषित कर दिया था। कानून सम्मान करने वाले जिन्ना ने रत्ती से तब तक मुलाकात नहीं की जब तक 20 फरवरी 1918 को वे 18 साल की नहीं हो गईं। रत्ती 19 अप्रैल को जिन्ना के साथ बंबई की जामिया मस्जिद में गईं, मौलाना नजीर अहमद खोजांदी की मौजूदगी में उन्होंने इस्लाम कबूल किया और शिया रस्मो-रिवाज के मुताबिक शादी की। शादी के गवाहों में महमूदाबाद के राजा शामिल थे, जो दुल्हन की शादी की अंगूठी लेकर आए थे।

सर पेटिट इस घटना से इतने क्षुब्ध थे कि उन्होंने बेटी की मौत की सूचना छपवा कर उसका उठावना तक कर दिया था। इसके बाद उन्होंने रत्ती से कभी कोई संबंध नहीं रखा। कुछ दिनों बाद अखबार में रत्ती के इस्लाम कबूल करने और जिन्ना के साथ उनकी शादी की खबर छपी। धर्म परिवर्तन के बाद रत्ती का नाम मरियम रखा गया। रत्ती के साथ शादी में जिन्ना को सर पेटिट के एतराज के अलावा भी कई रुकावटें आईं। जिन्ना को अपने इस्माइली शिया समुदाय के विरोध का भी सामना करना पड़ा। असल में इस विवाह को लेकर जिन्ना और पेटिट के परिवार में ही नहीं वरन् पारसी और इस्माइली शिया समुदाय में भी तनाव पैदा हो गया था। जिन्ना एक जाने माने राजनीतिज्ञ और चोटी के वकील थे इसके बावजूद इस्माइली जमात की सर्वोच्च सभा रत्ती को अपने समाज में शामिल करने से हिचकिचा रही थी। इस्माइली समाज मुख्यरूप से व्यापारियों का समाज था। पारसी मुंबई के व्यापार और उद्योग पर छाए हुए थे। और पेटिट इस समाज के प्रतिष्टित सदस्य थे। वे दूसरे धर्म के अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ जो कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो अपने समाज की किशोर लड़की की शादी को पचा नहीं पा रहे थे। वे इस बात से और भी खफा थे कि मुस्लिम कानून धर्म परिवर्तन किए बिना उस विवाह को कबूल नहीं कर सकता था। इसके अलावा इस्माइली समाज के लोग रत्ती को अपने धर्म में शामिल कर पारसियों को नाराज नहीं करना चाहते थे। लेकिन आखिरकार जिन्ना ने इन सारी समस्याओं को अपने तरीके से हल कर लिया। उन्होंने इस्माइली समाज से नाता तोड़ लिया और असरी जमात के अनुसार विवाह किया।

निकाह में मेहर की रकम 1,001 रु. तय की गई, लेकिन जिन्ना ने फौरन 1,25,000 रु. का तोहफा दिया। जिन्ना सिविल मैरिज करके ज्यादा खुश हो सकते थे लेकिन उस जमाने के कानून के मुताबिक, कोर्ट मैरिज का विकल्प चुनने वाले लोगों को यह ऐलान करना होता था कि वे किसी मजहब को नहीं मानते। जिन्ना मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे और इस तरह की घोषणा से उनका चुनाव निरस्त हो जाता।

ख्वाजा रजी हैदर लिखते हैं कि बंबई के पारसी इस धर्मांतरण से काफी नाराज थे। पारसी अखबारों ने शादी के दिन को ‘काला शुक्रवार’ घोषित कर दिया। अपहरण का मामला दर्ज किया गया, और जब यह मामला अदालत पहुंचा तो न्यायाधीश ने पूछा कि क्या जिन्ना ने पैसे के लिए शादी की है। इससे नाराज जिन्ना ने कहा कि इस सवाल का जवाब केवल उनकी पत्नी ही दे सकती हैं, वे आगे आईं और उन्होंने अदालत को बताया कि वे प्यार की खातिर मुसलमान बनीं, और न तो वे और न ही उनके पति उनके पिता की दौलत में हिस्सा चाहते हैं।

शादी के बाद जिन्ना और रत्ती सुहागरात मनाने नैनीताल गए वे वहां एक हफ्ते रहे। जिन्ना के सपाट रेतीले जीवन में पहली बार कोई रसधार फूटी थी। वह उसकी हर बूंद को आत्मसात कर लेना चाहते थे। नैनीताल से वे कार से दिल्ली आए। वहां नए बने मेरिडीयन होटल में रुके। यह होटल के वातावरण और साजसज्जा में मुगल काल के साथ साथ ब्रिटिश सुख सुविधाओं का सुंदर समन्वय था।

जिन्ना और रत्ती की उम्र में दो दशक का लंबा फासला होने के बावजूद दोनो अपने समय में भारत के सबसे चर्चित दंपति थे तो उसकी वजह यह थी अपने गोरे रंग लंबी छरहरी देहयष्टि कीमती सूट, आत्मविश्वास से भरी तेजस्वी आंखे, पश्चिमी शिष्टाचार, अंग्रेजी पर जबरदस्त अधिकार, आकर्षक वक्तृत्व, एक सफल वकील की छवि,और राजनीति में प्रखर सेकुलर और राष्ट्रवादी नेता की छवि से महिमा मंडित जिन्ना के साथ ग्लैमर जुड़ा हुआ था। रत्ती के जिन्ना के प्रति आकर्षण में इस ग्लैमर की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। पर रत्ती खुद भी कम नहीं थी अभिजात्य और किशोरावस्था से तरुणाई की ओर बढते सौंदर्य की मिसाल थी। उसके तीखे ईरानी नाकनक्श, लंबोतरा चेहरा, गुलाब पंखुड़ी जैसे होठ, सुडौल ग्रीवा उसके सौंदर्य को विशिष्ठ बनाते थे। पर सौंदर्य की बाहरी चमक दमक के पीछे रत्ती बेहद संवेदनशील, कुशाग्र बुद्धि, स्वाभिमानी युवती थी। बंबई की सबसे मशहूर और खूबसूरत दुल्हन के तौर पर रत्ती अपने बालों में ताजे फूल, हीरे जडि़त गहने पहनती थीं, हाथी के दांत के होल्डर में रखी अंग्रेजी सिगरेट पीती थीं, माणिक, पन्ने और गले के काफी नीचे तक के रेशमी परिधान पहनती थीं जिससे बुजुर्ग महिलाएं दंग रहती थीं। इसके अलावा वह अपने समय के मुबई की सबसे स्वछंद और ग्रंथिमुक्त व्यक्तित्व थी। जिन्ना ने भी रत्ती के उन्मुक्त जीवन में कभी हस्तक्षेप नहीं किया न करने दिया। जिन्ना दंपत्ति के हनीमून से मुंबई लौटने के बाद बंबई के गवर्नर लार्ड वैलिंग्टन ने रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया। उस दिन रत्ती ने गले से बहुत नीचे कटवाला फैशनेबल गाऊन पहन रखा था, जिससे उनकी मेजबान खुश नहीं थीं। जब वे सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे तब लेडी वैलिंग्टन ने एक एडीसी से कहा कि मिसेज जिन्ना को ठंड लग रही होगी लिहाजा उनके लिए एक कपड़ा ले आए। बताया जाता है कि जिन्ना खड़े हो गए, और बोले, जब मिसेज जिन्ना को ठंड लगेगी तो वे खुद बताएंगी और खुद ढकने के लिए कपड़ा मांगेंगी। और फिर, लॉर्ड विलिंगडन जब तक गवर्नर रहे तब तक जिन्ना गवर्नर हाउस दोबारा नहीं गए। रत्ती स्वभाव से आजादख्याल की थीं। एक बार कश्मीर में वे एक फॉर्म से परेशान हो गईं, जिसमें उनकी यात्रा का उद्देश्य दर्ज करने को कहा गया था। उन्होंने लिखा: ‘राजद्रोह फैलाने के लिए।’

शिमला के वाइसरॉय लार्ड चेम्सफोर्ड ने जिन्ना दंपति के सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया था। जब रत्ती का परिचय कराया गया तो उन्होंने पश्चिमी ढंग से झुककर अभिवादन करने की बजाय दोनों हाथ जोड़कर सम्मान प्रकट किया। वाइसरॉय को यह नागवार गुजरा। भोजन के बाद उन्होंने रत्ती को अपने पास बुलवाया और सख्त आवाज में कहा आपके पति का राजनीतिक भविष्य उज्जवल है। आपको अपने व्यवहार से इसे खराब नहीं करना चाहिए। (इन रोम यू मस्ट डू एज रोमंस डू…यह उनका अंतिम वाक्य था) रत्ती ने विनम्र होकर कहा ठीक वही तो किया है महामहिम। मैं हिंदुस्तान में हूं और हिंदुस्तानी अंदाज में ही मैंने आपका अभिवादन किया है। चेम्सफोर्ड निरुत्तर हो चुके थे। उसके बाद रत्ती उनके किसी आयोजन में शामिल नहीं हुई।

Layout 1

जिन्ना के सचिव एमसी छागला  अपनी आत्मकथा ‘रोजेज इन दिसंबर’ में एक और मजेदार संस्मरण लिखा है, ”एक बार रती बंबई के टाउन हॉल में जिन्ना की शानदार लिमोजीन में आई. टिफन ले कर बाहर निकलीं और सीढिय़ां चढऩे लगीं। उन्होंने कहा, जे (वो जिन्ना को इसी नाम से पुकारती थीं) सोचो मैं तुम्हारे लिए लंच में क्या लाई हूं। जिन्ना का जवाब था मुझे क्या पता तुम क्या लाई हो। इस पर वो बोलीं मैं तुम्हारे पसंदीदा हैम सैंडविच लाई हूं। इस पर जिन्ना बोले माई गॉड ये तुमने क्या किया? क्या तुम मुझे चुनाव में हरवाना चाहती हो? क्या तुम्हें नहीं पता कि मैं पृथक मुसलमानों वाली सीट से चुनाव लड़ रहा हूं? अगर मेरे वोटरों को पता चल गया कि मैं लंच में हैम सैंडविच खा रहा हूं तो मेरे जीतने की क्या उम्मीद रह जाएगी? ये सुनकर रत्ती का मुंह लटक गया। उन्होंने फौरन टिफिन उठाया और खटाखट सीढिय़ां उतरते हुए वापस चली गईं।’’

रत्ती से शादी के पहले जिन्ना के मुंबई आवास साउथ कोर्ट पर उनकी बहन फातिमा का कब्जा था। रत्ती के प्रवेश से उनका एकछत्र राज टूटा। इससे पहले जिन्ना रत्ती को भी वक्त नहीं दे पा रहे थे। राजनीतिक व्यस्तताओं ने उन्हें रत्ती से दूर कर दिया। रत्ती खुद को उपेक्षित महसूस करने लगी। जनवरी 1928 में उन्होंने जिन्ना से अलग रहने का फैसला किया। मुंबई में समंदर किनारे बने ताज होटल में उन्होंने एक सुइट बुक करा लिया था। दोनों के बीच अलगाव के राजनीतिक कारण भी थे। 1926 आते-आते जिन्ना का भारतीय राजनीति में वो स्थान नहीं रहा था जो 1916 में हुआ करता था। फिर रत्ती बीमार भी रहने लगी थीं। यही वह वक्त रहा जब उदारवादी और सेकुलर जिन्ना का नया अवतार सामने आया। वह था मुस्लिम सांप्रदायिक नेता का। उधर रत्ती जिन्ना से अलग भले ही हो गई थीं, लेकिन जिन्ना के प्रति आत्मीय भाव बना हुआ था। वह बदलते जिन्ना को देख व्यथित थीं। धीरे-धीरे पहले से खराब तबियत और खराब होने लगी। अप्रैल 1928 में वे इलाज के लिए मां के साथ पेरिस रवाना हुईं। जिन्ना भी रत्ती से मिलने के लिए पेरिस के अस्पताल पहुंचे। उन्होंने डाक्टरों से मशविरा कर रत्ती के लिए बेहतर डॉक्टर और नर्स की व्यवस्था की। वे एक महीना साथ रहे। देखभाल से रत्ती ठीक होने लगी थीं। फिर अचानक दोनों में झगड़ा हुआ और रत्ती मां के साथ मुंबई लौट गई। कुछ समय ठीक रहने के बाद स्वास्थ्य फिर गिरने लगा। 18 फरवरी, 1929 को रत्ती ने जिन्ना के लिए लिखा, मेरे प्रिय मैंने तुम्हें इतना प्यार किया, जितना कभी किसी पुरुष को नहीं किया। यही प्रार्थना है कि जिस ट्रेजेडी का प्रारंभ प्रेम से हुआ था, उसका अवसान भी प्रेम से ही हो। गुडनाइट…गुड बाई…। परी कथा की इस हसीन नायिका का अंत सुखद नहीं था।

जब रत्ती के पार्थिव शरीर को कब्र में दफऩ करने के बाद जिन्ना से कहा गया कि सबसे नजदीकी रिश्तेदार होने के नाते वो कब्र पर मिट्टी फेंके तो जिन्ना सुबक-सुबक कर रो पड़े थे। ये पहली और आखिरी बार था जब किसी ने जिन्ना को सार्वजनिक रूप से अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए देखा था।

 

सतीश पेडणेकर

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.