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अल्पसंख्यक होने का पैमाना तय हो

अल्पसंख्यक होने का पैमाना तय हो

भारत में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक पर वार्तालाप हमेशा से हमारे बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा होती रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर भारत में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का पैमाना किस प्रकार है? देश के विभिन्न राज्यों में तो तथाकथित अल्पसंख्यक बहुसंख्यक के रूप में हैं। इसी संदर्भ में   सुप्रीम कोर्ट में एक वकील द्वारा दायर की गयी जनहित याचिका में भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय के पहचान को परिभाषित करने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर देश के आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की गई है। ऐसे में इन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यकों वाले अधिकार मिलने चाहिए। इन राज्यों में लक्षद्वीप (2.5 प्रतिशत), जम्मू-कश्मीर (28.44 प्रतिशत), मिजोरम (2.75 प्रतिशत), नागालैंड (8.75 प्रतिशत), मेघालय (11.53 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश (29 प्रतिशत), मणिपुर (31.39 प्रतिशत) और पंजाब (38.40 प्रतिशत) शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने 1993 में केंद्र सरकार द्वारा जारी किये गये  नोटिफिकेशन को भी असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है, जो अन्य पंथों के लोगों को अल्पसंख्यक का दर्जा देता हैं। 2014 में जैन समाज को भी अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया गया।

यदि हम 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर अपना ध्यान आकर्षित करे तो जम्मू-कश्मीर में 68 फीसद जनसंख्या केवल मुस्लिम समाज की है, बाकी बची जनसंख्या में हिंदू, बौध और ईसाई समाज है। इसलिए यहां यह बिल्कुल साफ होता है कि जनसंख्या के आधार पर जम्मू-कश्मीर  में मुस्लिम समाज किसी भी दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक नहीं हैं। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि संविधान में राज्य स्तर पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का कोई मानक न होने के कारण यहां का अल्पसंख्यक समाज उन सभी योजनाओं का लाभ उठा रहा है जो वास्तविक अल्पसंख्यक समाज को मिलनी चाहिये थी। एक सर्वे के अनुसार 2016-17 में अल्पसंख्यकों के लिए निर्धारित स्कॉलरशिप का फायदा 1 लाख 5 हजार से अधिक छात्र मुसलमान समुदाय को मिला, जबकि सिख, बौद्ध, पारसी और जैन धर्म के 5 हजार छात्रों को इसका फायदा मिला है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यहां हम केवल अभी जम्मू-कश्मीर की ही बात कर रहे हैं।

यह हाल केवल जम्मू-कश्मीर में ही नहीं बल्कि असम, पश्चिम बंगाल, केरल उत्तर प्रदेश और बिहार में भी हैं। यदि हम 2011 में हुई जनगणना पर नजर डालें तो बंगाल के तीन जिले  मुर्शिदाबाद (47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिन्दू), मालदा (20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिन्दू) और उत्तरी दिनाजपुर (15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिन्दू) में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या हिन्दू समुदाय से अधिक हो चुकी हैं। वहीं जहां पूरे भारत में हिन्दू समुदाय की जनसंख्या वृद्धि में 0.7 प्रतिशत की कमी आई है, बंगाल में हिन्दू  समुदाय की जनसंख्या में 1.94 प्रतिशत की सबसे अधिक कमी आई है। पूरे भारत में जहां मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में 0.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है वहीं बंगाल में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में सबसे अधिक 1.77 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बंगाल में हो रहे जनसंख्या बदलाव के बहुत सारे कारण हैं। पहला कारण उच्च तथा मध्यवर्गीय शिक्षित बंगाली हिन्दू समुदाय का बंगाल में रोजगार न होने के कारण रोजगार की तालाश में मुंबई, दिल्ली और लखनऊ जैसे शहरों में तेजी से पलायन है। इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में वृद्धि का कारण बांग्लादेश से हो रही तेजी से घुसपैठ तथा मुस्लिम समुदाय की शिक्षा में कम रुचि होना है जो परिवार नियोजन को अपने पंथ के चश्मे से देखने के लिये मौलवियों द्वारा बाध्य कर दिये जाते हैं जो उन्हें आधुनिकता को अपनाने से वंचित करता हैं।

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असम में कुल 33 जिले हैं। असम के 9 जिले मुस्लिम बहुल हैं। इन जिलों में मुस्लिमों की आबादी हिंदुओं से ज्यादा है।  2001 की जनगणना के मुताबिक असम के जिन जिलों में हिंदुओं की तुलना में मुस्लिमों की आबादी ज्यादा है उनमें बारपेटा, धुबरी, करीमगंज, गोलपाड़ा, नगांव, बोंगईगांव, मोरी गांव, हैलाकांडी व दारंग शामिल हैं। जनगणना के मुताबिक धुबरी जिले में 79.67 प्रतिशत, बारपेटा में 70.74 प्रतिशत, दारंग में 64.34 प्रतिशत, हैलाकंडी में 60.31 प्रतिशत, करीमगंज में 56.36 प्रतिशत, नगांव में 55.36 प्रतिशत, मोरीगांव में 52.56 प्रतिशत, बोंगईगांव में 50.22 प्रतिशत और गोलपाड़ा में 57.52 प्रतिशत मुस्लिम हैं।

केरल की कुल 3.50 करोड़ आबादी का 54.7 प्रतिशत भाग ही हिन्दू हैं जबकि 26.6 फीसदी मुस्लिम और 18.4 प्रतिशत ईसाई हैं। ऐसा माना जाता है कि केरल में आबादी का संतुलन मुख्यत: ईसाई मिशनरियों ने बिगाड़ा। हिन्दुओं का धर्मांतरण कर वहां की आबादी में बदलाव किये गये। 2011 की धार्मिक जगनणना के आंकड़ों के अनुसार केरल में हिन्दुओं की आबादी 16.76 प्रतिशत की दर से तो मुस्लिमों की आबादी 24.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी। अखिला अशोकन का हादिया में धर्मांतरण की घटना केरल में हो रहे तेजी से बदलाव की ताजा उदाहरण हैं।

आंकड़ों के मुताबिक राज्य में साल 2015 में जन्में कुल 5,16,013 जिंदा बच्चों में से 42.87 प्रतिशत हिन्दू समुदाय से, 41.45 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय और ईसाई समुदाय से 15.42 प्रतिशत थे। साल 2006 में मुसलमानों की जन्म दर 35 प्रतिशत से बढ़कर 2015 में बढ़कर 41.45 हो गई। 2006 में हिन्दू समुदाय ने 46 प्रतिशत की जन्म दर दर्ज की, जो 10 वर्षों में घटकर 42.87 प्रतिशत रह गई। ईसाई जन्म दर, जो हमेशा 20 प्रतिशत से नीचे थी, 2006 में 17 प्रतिशत से 2015 में 15.42 प्रतिशत हो गई। 9 साल की अवधि के दौरान मुस्लिम जन्म दर में केवल 2 बार गिरावट आई है।

उत्तर प्रदेश का मेरठ, मुज्जफरनगर, शामली, रामपुर, सहारनपुर व अन्य जिला है, जहां हिंदू समाज अल्पसंख्यक होता जा रहा हैं। बिहार पर भी नजर डाले तो अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार है, जहां तेजी से जनसंख्यिकी बदलाव होते जा रहे हैं। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि आज तक देश में जो भी सांप्रदायिक घटनाएं होती रही है, वह केवल उन्हीं स्थानों पर हुई है जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं। संभवत: यह देश के भविष्य के परिपेक्ष में सही नहीं है। सरकार को चाहिये कि धर्मांतरण को रोकने तथा परिवार नियोजन के लिए एक उचित कानून लाये जो सभी पंथों पर समान रूप से लागू हो।

 

रवि मिश्रा

 

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