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लव-जिहाद का मकडज़ाल

लव-जिहाद का मकडज़ाल

विश्व में बदलाव की प्रक्रिया सत्त है। मनुष्य और समाज के विचारों में समय के साथ बदलाव होता हैं, लेकिन जब यह बदलाव किसी व्यक्ति विशेष के कारण समाज की मान्यताओं को ताक पर रखकर होने लगे तो इस पर सोचने की आवश्यकता होती हैं। ऐसा ही एक ज्वलंत उदाहरण केरल की अखिला अशोकन का हादिया बनना है। यह धर्मांतरण की घटना देश में वायरस की तरह फैल रही इस्लामिक कट्टरता के एक षड्यंत्र की ओर निर्दिष्ट करती हैं। एक सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत ये लोग अपने घर-परिवार को छोड़कर बाहर अध्यन कर रहीं छात्राओं को अपना निशाना बनाकर उनका धर्म परिवर्तन कराते हैं। पैसा अच्छे-अच्छे लोगों को भी भ्रष्ट बना देता हैं। ऐसा माना जाता है कि इस जिहाद में लिप्त लड़कों को बाहर के लोगों और कुछ संगठनों के द्वारा बकायदा फंडिंग होती है। ताकि वे पैसे के बल पर इन लड़कियों से शीघ्रता से दोस्ती कर अपने जाल में फंसा सके ।

विभिन्न हिंदू और ईसाई संगठनें  इस बात को गंभीरता से ले रहे है, लेकिन मुस्लिम संगठन इस बात को कभी भी सच नहीं मानते। स्वतंत्रता का मतलब किसी को कुछ भी करने की आजादी नही दी जानी चाहिये। हादिया का मुस्लिम बनने का सच कुछ भी क्यों न हो, सेकुलर ब्रिगेड हादिया के इस कारनामें को सराहने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। यदि कोई लड़की जिहादी गतिविधियों में लिप्त लड़के से विवाह कर ले तो ये सेकुलरवादी इसे उसकी अपनी स्वतंत्रता का नाम देकर और बढ़-चढ़ कर प्रोत्साहित करेंगे। इस ब्रिगेड को उन जिहादियों में कोई बुराई नहीं दिखती, जो जिहाद के नाम पर लड़कियों का ब्रेनवास कर धर्मपरिवर्तन करा रहे हैं। अफजल गुरू और याकुब मेमन जैसे आतंकियों का पक्ष लेने वाली इस ब्रिगेड से हम आशा भी क्या कर सकते हैं। यह ब्रिगेड उन माता-पिता के दर्द को समझने का प्रयास नहीं करती, जिनकी बच्चियों को इस प्रकार से मोहरा बनाया जाता है। इस संदर्भ में यहां यह समझाना आवश्यक है कि इस लव-जिहाद मामले पर इस्लामिक संगठनों की चुप्पी इन संगठनों पर ही प्रश्न खड़ा करती है। बड़ा दिलचस्प बात है कि आखिर हर बात में फतवा जारी करने वाले ये मुस्लिम संगठन कम से कम इस मामले में क्यों नहीं फतवा जारी करते? इससे तो यह साफ-साफ पता चलता है कि  इस लव-जिहाद के पीछे इन संगठनों का ही हाथ है। जहां तक प्रेम-प्रसंग की बात है तो यह दो व्यक्तियों के बीच की अपनी भावना होती हंै। भारतीय संस्कृती में प्रेम-विवाह को अध्यात्म के रूप में माना जाता हैं तथा अंतर्जातिय विवाह का हमेशा से स्वागत किया जाता रहा हैं।

हमारे समाज में कई बड़े चेहरे हैं, जिन्होंने अपने समुदाय से हटकर दुसरे समुदाय में अपना विवाह रचाया, लेकिन जब ये संबन्ध झुठ और फरेब के सहारे होते हैं। तो अधिक दिनों तक नहीं चलते। इस प्रकार के विवाह में अक्सर लड़की को अपना धर्मपरिवर्तन करने के लिये कहा जाता है, अत: इस विषय को समाजिक रूप से देखने की आवश्यकता है। हिंदू और ईसाई लड़कियों का इस प्रकार की जिहादी मानसिकता वाले लड़कों से विवाह का विषय तबतक हमारे सामने नहीं आता, जबतक  धर्मपरिवर्तन का मामला कोर्ट में नहीं जाता। इस पृष्ठभूमि में यहां यह बताना आवश्यक है कि सेकुलर ब्रिगेड का इस धर्मांतरण के संदर्भ में यह मानना है कि कुछ हिंदूओं के मुस्लिम बनने से हिंदू धर्म पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनका कहना है कि मुगलों और अंग्रेजों के आक्रमण और लाख धर्मांतरण की कोशिशों के बावजूद आज देश में 1 अरब से अधिक हिंदू हैं। जब हिटलर 1 करोड़ से अधिक यहूदियों को खत्म नहीं कर सका तो हम कैसे खत्म हो सकते है? लेकिन यह ब्रिगेड यह भूल जाती है कि मुगलों के प्रवेश से पहले भारत में कोई मुस्लिम नहीं था , लेकिन आज देश में 20 करोड़  से भी अधिक मुस्लिम हैं। ऐसा आखिर ये ब्रिगेड क्यों मानती है कि धर्म को खत्म नहीं किया जा सकता? इन लोगों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान पर नजर डालने की आवश्यकता है। यहां पर हिंदूओं की संख्या कितनी रह गई हैं? जिस पाकिस्तान में 1947 से पहले 40 प्रतिशत हिंदू थे, अब वहां हिंदूओं की संख्या लगभग 1 या 2 प्रतिशत रह गई है। भारत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसलिये जिहादियों द्वारा फैलाये जा रहे इस्लामिक जिहाद के विषय में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब इस ग्लोबल जिहाद के चलते हमारा लोकतंत्र, सेकुलरिज्म और सहिष्णुता खत्म हो जायेगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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